श्याम शर्मा-मगध में मथुरा के उत्सवी रंग

कुमार दिनेश

लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की भूमि मथुरा (यूपी) के गोवर्धन कस्बा में जन्में छापा-कलाकार श्याम शर्मा ने 1966 में प्राचीन मगध की भूमि पाटलिपुत्र को अपनी कला साधना का केंद्र बनाया और आधी सदी से भी अधिक लंबी कला यात्रा के बाद आज 77 साल की उम्र में वे देश के शीर्षस्थ कलाकारों की पंक्ति में खड़े हैं। लखनऊ कला महाविद्यालय से डिप्लोमा करने के बाद वे पटना आए और यहां पटना कला महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। उन दिनों पूरे देश में शिक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता डिप्लोमा ही थी। 1980 के दशक में शिक्षक की अर्हता बढ़ा कर स्नातक और फिर परास्नातक की डिग्री तक की गई। श्याम शर्मा ने छापाकला को न केवल विशेष विषय के रूप में पढ़ा-पढ़ाया, बल्कि स्वयं को इस विधा के अग्रणी कलाकार के रूप में विकसित करने की साध पूरी करने में लगा दिया।

वे बताते हैं कि उन्हें शिक्षक के साथ-साथ कलाकार बनना था, इसलिए 1970 के दशक से ही वे बताते हैं कि उन्हें शिक्षक के साथ-साथ कलाकार बनना था, इसलिए 1970 के दशक से ही शांति निकेतन, भोपाल और दिल्ली की नियमित यात्राएं शुरू कर दी थीं। शांति निकेतन में अपने समय के श्रेष्ठ छापा कलाकार सोमनाथ होर, प्रोफेसर दिनकर कौशिक और पद्मश्री से सम्मानित कलाकार सुधीर खास्तगीर के सान्निध्य ने श्याम शर्मा की कला को नए पंख दिए। कौशिक और खास्तगीर लखनऊ कला महाविद्यालय के प्राचार्य रह चुके थे, इसलिए भी श्याम शर्मा को उनका स्नेह मिलता रहा। वे प्रसिद्ध चित्रकार जे. स्वामीनाथन से सीखने की अतृप्त ललक के साथ अक्सर भोपाल जाते रहे। स्वामीनाथन के चित्रों में जो स्वप्नवाद झलकता है, उसने शर्मा की छापाकला पर गहरा प्रभाव डाला। स्वामीनाथन जिस तरह से प्रकृति के चटख रंगों का प्रयोग कर स्वप्न को खूबसूरत अभिव्यक्ति देते हैं, वैसा शर्मा की छापाकला में भी दिखता है। उड़ता हुआ पत्थर और हवा में पेड जैसी पेंटिंग से स्वामीनाथन मनुष्य के स्वप्न-लोक को रंग-रेखाओं में व्यक्त करते हैं। उनकी छाया में निरंतर स्वयं को परिमार्जित क श्याम शर्मा ने छापाकला में अलग पहचान बनाई। भारत भवन (भोपाल) के समृद्ध छापाकला विभाग ने श्याम शर्मा को बार-बार आकर्षित किया और हर यात्रा के बाद उन्हें लगा कि वहां की कलाकृतियां उनके काम को निखारने वाली ऊर्जा संप्रेषित करती हैं। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनी में शामिल कलाकारों का काम देखने और उनसे भाव-संवाद के लिए वे हमेशा ललित कला अकादमी (दिल्ली) की कला दीर्घा में समय बिताते रहे। इन यात्राओं ने श्याम शर्मा के भीतर के कलाकार को उनके शिक्षक-रूप से ज्यादा बड़ा बना दियाउन्होंने छापाकला के लिए केवल काष्ठ ( वुड-कट) को ही नहीं, बल्कि दूसरे माध्यमों को भी अपनाया।

श्याम शर्मा की कलाकृतियां राष्ट्रीय आधुनिक कला दीर्घा (दिल्ली), उत्तर प्रदेश ललित कला अकादमी (लखनऊ), एयर इंडिया टाटा संग्रहालय (जमशेदपुर), राज्य संग्रहालय (चंडीगढ़) और ओएनजीसी, देहरादून सहित देश-विदेश की अनेक कलादीर्घाओं में देखी जा सकती हैंउन्हें अब तक देश-विदेश के 50 से अधिक कला शिविरों में आमंत्रित किया जा चुका है। छापाकला के लिए जो आवेश, समर्पण और सक्रियता उनमें एक धीमी आंच की तरह सुलगती रही, उसका रचनात्मक ताप कई संस्थाओंने महसूस किया। वे वर्षों तक बिहार ललित कला अकादमी और शिल्पकला परिषद की कार्यकारिणी के सदस्य रहे। उन्हें लगातार पांच बार राष्ट्रीय ललित कला अकादमी, दिल्ली की सामान्य परिषद का सदस्य चुना गया। गोवर्धन पर्वत की भूमि पर 1941 में जन्मे श्याम शर्मा ने छापाकला को अपनी निरंतर साधना की अंगुली पर उठाकर पर्वत की ऊंचाई तो दे दी, लेकिन उनके व्यवहार में अहंकार के पहाड़ कभी नहीं उभरे। बिहार सरकार ने 2008 में उन्हें कला शिक्षा शिखर सम्मान और 2017 में लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया। 2017 में ही उन्हें दूसरा लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार मुंबई के प्रफल धानुकर भाई फाउंडेशन की ओर से प्राप्त हुआ। 1991 में आयोजित हेलेसिंकी महोत्सव (फिनलैंड) में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले इस मूर्धन्य छापा कलाकार की झोली में राष्ट्रीय स्तर के 10 पुरस्कार आ चुके हैं। प्रोफेसर शर्मा ने कई सामूहिक कला प्रदर्शनियों में देश का प्रतिनिधित्व किया।

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अपनी कलाकृतियों के बारे में श्याम शर्मा कहते हैं कि ये छापाचित्र जीवन के उत्सव को रूपायित करते हैं। गोवर्धन क्षेत्र में सुबह की पूजा में अमूर्तन की प्रधानता होती है, पर्वत की पूजा की जाती है और शाम को लोग आकृतियां बनाकर आराधना करते हैं। मेरी जन्मभूमि की ये सुबहें (अमूर्तन) और शामें (आकृति) मेरी कला को सम्पूर्णता के आनंद से भरती हैं। कलाकार श्याम शर्मा की एक कविता याद आती है-बड़ी-सी सफेद चादर पर/काली चींटी खोज रही है/सफेद चीनी का दाना/बना रही है रेखाएं और कलाकृतियां-/न जिनका कोई अर्थ है/न अस्तित्व/बस, वह सुख ले रही है/सफेद में सफेद को खोजने का। (कविता संग्रह ‘सफेद सांप’ से)

हालांकि श्याम शर्मा की कला और प्रतिबद्धता में कृष्ण की भूमि मथुरा, हिंदुत्व जीवन दर्शन और राष्ट्रप्रेम के रंग गहरे हैं, लेकिन विचार के दूसरे रंगों के लिए भी उनके कैनवास पर स्पेस की कमी नहीं पड़ती। संस्कार भारती (बिहार) के अध्यक्ष श्याम शर्मा की सामाजिक सक्रियता से अवगत होने के बावजूद उनके कविता संग्रह की भूमिका लिखते हैं प्रगतिशील कवि अरुण कमल। श्याम शर्मा की कला सभी रंगों को आत्मसात करती है और राजनीति की संकीर्ण रेखाओं को अमूर्त कर देती है।

(विस्तृत लेख नादरंग-2 में)

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