अक्ल से आगे है कला की मंजिल

रेखा के.राणा से चित्रकार सैय्यद हैदर रजा भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व व पश्चात के दशकों में आधुनिकता के नाम पर कला में अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे थे। तत्कालीन समय के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी कलाकारों में सैय्यद हैदर रजा का नाम आता है। रजा का जन्म 1922 में मध्य प्रदेश के बावरिया में हुआ था। रजा के चित्रों पर उनके जन्म स्थान की संस्कृति एवं कला अपने गहरे रूपों में विराजमान थी। रजा ने कई दशकों तक कला जगत में कार्यशील होकर अपनी उपस्थिति दर्शाई । 1947 में भारत…

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कभी मुड़कर कल के मकबूल को देखा है ?

नवीन जोशी सन् 2003 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘एम एफ हुसेन की कहानी, अपनी जुबानी’ को रिलीज करने हुसेन कई शहरों में गए थे। उसी क्रम में वे पटना भी आए। मैं उन दिनों पटना में था। हुसेन के साथ एक कप कॉफी पीने का मौका ‘हिन्दुस्तान’ के स्थानीय संपादक की हैसियत से मुझे भी मिला। हुसेन प्रशंसकों से घिरे थे, अलग से कुछ बातें करने का अवसर नहीं था। फिर भी हुसेन से मिलना रोमांचक अनुभव रहा। उन्होंने मुझे भी अपनी आत्मकथा की एक प्रति दी और हमारे एक…

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गायक अनूप जलोटा को बेगम अख्तर अवार्ड

हिंदी उर्दू हिंदी साहित्य अवार्ड कमेटी के तत्वाधान में आगामी 21 से  23 मार्च तक लखनऊ के कला मंडपम प्रेक्षागृह- कैसरबाग में 28 वां साहित्य महोत्सव का आयोजन किया जाएगा जिसमें प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नायक को साहित्य शिरोमणि और अनूप जलोटा को बेगम अख्तर अवार्ड प्रदान किया जाएगा। यह जानकारी हिंदी उर्दू साहित्य व साहित्य अवार्ड कमेटी के प्रमुख अतहर नबी   ने बताया कि 21 मार्च को 28 वां अंतर्राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का उद्घाटन मुख्य अतिथि हृदय नारायण दीक्षित विधान विधान सभा अध्यक्ष करेंगे इस अवसर पर प्रदेश…

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जड़ों से जुड़ी रहे कलाएं

अवध आर्ट फेस्टिवल का दूसरा दिन लखनऊ। कलाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। जड़ों से जुड़कर ही उनकी पहचान बनती है। कला, संगीत या रंगमंच में जड़ों से जुड़े रहना महत्वपूर्ण है। ये विचार वक्ताओं ने ललित कला अकादमी के अलीगंज स्थित परिसर में चल रहे अवध आर्ट फेस्टिवल के दूसरे दिन बृहस्पतिवार को व्यक्त किए। दूसरे दिन ‘सृजनात्मकता एक देशी जुबान है’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। तीन मार्च तक चलने वाले इस फेस्टिवल में 40 से अधिक कलाकारों की 150 कलाकृतियां प्रदर्शित की गई…

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विजय सिंह- सादगी और रहस्य की तलाश

मंजुला चतुर्वेदी बनारस के समकालीन कला परिदृश्य में विजय सिंह एक प्रमुख नाम है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में व्यावहारिक कला के शिक्षक होने के बावजूद वे चित्रकला के एक प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। उन्होंने प्रचुर चित्रों का निर्माण किया एवं कर रहे हैं तथा कई सुन्दर मूर्तिशिल्प उकेरे हैं। श्वेत श्याम रेखांकन-चित्रों के लिए उन्हें विशेष ख्याति प्राप्त हुई। श्वेत श्याम छवियों में उन्होंने पैन एवं इंक की सहायता से विभिन्न प्राकृतिक दृश्य एवं अन्य संयोजन निर्मित किए है जो अपने त्रिआयामी प्रभाव और रूपाकारों की विशेषता के कारण ध्यान…

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इस रंगमंच पर भी तुम अनूठे हो पापा!

ग्रूशा कपूर सिंह प्रसिद्ध रंगकर्मी रंजीत कपूर को हिन्दी रंगमंच का राजकपूर कहा जाता रहा है। उनके प्रशंसकों का दायरा कई पीढ़ियों तक फैला है। अगर ऐसा न होता तो उनसे उनके 1977 के नाटक ‘बेगम का तकिया’ को तीन दशकों से अधिक समय बाद पुनर्जीवित करने का अनुरोध आखिर क्यों होता है? रंगमंच का उनका अपना मुहावरा है लेकिन कम ही लोग जाते हैं कि उनका जीवन कितना संघर्षों भरा, उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरा है। ये संघर्ष उनके पेशे के भी रहे हैं और पारिवारिक भी। उन्हें आज…

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समकालीन कला की अवधारणा

रेखा के. राणा किसी भी रचना में समय अनिवार्य तत्व है। रचना के विषय प्रथमतः समय के झरोखे से होकर आते हैं। वस्तुतः विषय तो हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, उन्हें ग्रहण करने में रचनाकार की संवेदनशीलता विशेष रूप से माध्यम के रूप में काम करती है। कला के सभी रूप अपने परिवेश के साथ लगातार टकराव से उपजते हैं किन्तु भारतीय संदर्भ में शाश्वत और चिरंतन मूल्यों की अजस्र धारा संवेदना की अभिव्यक्तियों को इस प्रकार प्रभावित करती रही कि कला के यथार्थ रूप या तो सामने आए ही…

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श्याम शर्मा-मगध में मथुरा के उत्सवी रंग

कुमार दिनेश लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की भूमि मथुरा (यूपी) के गोवर्धन कस्बा में जन्में छापा-कलाकार श्याम शर्मा ने 1966 में प्राचीन मगध की भूमि पाटलिपुत्र को अपनी कला साधना का केंद्र बनाया और आधी सदी से भी अधिक लंबी कला यात्रा के बाद आज 77 साल की उम्र में वे देश के शीर्षस्थ कलाकारों की पंक्ति में खड़े हैं। लखनऊ कला महाविद्यालय से डिप्लोमा करने के बाद वे पटना आए और यहां पटना कला महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। उन दिनों पूरे देश में शिक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता डिप्लोमा…

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स्मृतियों के कई रंग

जयकृष्ण अग्रवाल कभी कभी बड़े अहम लोग हाशिए पर चले जाते है। ऐसे ही थे लखनऊ कला महाविद्यालय के लीथो प्रोसेस फोटो मेकैनिल विभाग के प्रवक्ता हीरा सिंह बिष्ट। फोटोग्राफिक डार्करूम आदि की सुविधा भी इसी विभाग में उपलब्ध थी। फोटो फिल्म का जमाना था और कैमरे के बाद सारा काम तो डार्करूम में ही होता था। हीरा सिंह जी को सारे कैमिकल्स और उनके प्रयोग के बारे में विस्तृत जानकारी थी। किन्तु वह समय था जब फोटोग्राफी से अधिक लोगों की रुचि कैमरों तक ही सीमित थी। आमतौर से…

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बनारस को देखने के लिए तीसरे नेत्र की जरूरत

शाम के लिए मशहूर शहर में,  सुबह के प्रसिद्ध नगर की छटा लखनऊ में साल की आखिरी कला प्रदर्शनी ‘काशी रंग’ सोमवार से अलीगंज स्थित ललित कला अकादमी की कला दीर्घा में शुरू हुई। प्रदर्शनी के बहाने शाम के लिए मशहूर अपने नगर में सुबह के लिए प्रसिद्ध प्राचीन नगर वाराणसी के विविध रंग चित्रों के जरिए प्रदर्शित किए गए हैं। 30 दिसंबर तक चलने वाली यह कला प्रदर्शनी वाराणसी के चित्रकार एवं कला शिक्षक अजय उपासनी के छोटे-बड़े चित्र और रेखांकनों पर आधारित है।  प्रदर्शनी के सोमवार को सायंकाल उद्घाटन…

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छबीला रंगबाज का शहर

‘छबीला रंगबाज का शहर‘ केवल आरा या बिहार की कहानी नहीं है अपितु इसमें हमारे समय की जीती जागती तस्वीरें हैं  जिनमें हम यथार्थ को नजदीक से पहचान सकते हैं। राज्यसभा सांसद और समाजविज्ञानी मनोज झा ने हिन्दू कालेज में छबीला रंगबाज का शहर के मंचन में कहा कि पढ़ाई के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भी हिन्दू कालेज की गतिविधियां प्रेरणास्पद रही हैं। झा यहाँ हिंदी नाट्य संस्था अभिरंग के सहयोग से ‘आहंग’ द्वारा मंचित नाटक में बोल रहे थे। युवा लेखक प्रवीण कुमार द्वारा लिखित इस कहानी को रंगकर्मी…

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कैनवास पर भी चौंकाता है असगर वजाहत का रचना संसार

दिल्ली में लगी चित्र प्रदर्शनी ये चित्र एक लेखक के बनाए हैं ऐसा नहीं लगता क्योंकि इनमे निहित विशेष ताज़गी बताती हैं कि इन्हें किसी सिद्धहस्त चित्रकार ने बनाया है। विख्यात कला समीक्षक और लेखक प्रयाग शुक्ल ने उक्त विचार सुप्रसिद्ध कथाकार – नाटककार असग़र वजाहत के चित्रों की प्रदर्शनी में व्यक्त किए। शुक्ल ने कहा कि असग़र विनम्रता से कहते हैं कि मैं चित्रकार नहीं लेखक हूँ लेकिन उन्होंने रंगों के प्रयोग और प्रस्तुतिकरण की विविधता से चौंका दिया है। ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसायटी की कला…

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उपेक्षा का शिकार एक महान कलाकार की कलाकृति

 कला संस्कृति, संरक्षण,स्वच्छता के नाम पर लगातार बजट पास होते जा रहे है। लेकिन उसका असर उसका परिणाम हम सभी को ज्ञात है। तमाम कला कृतियाँ उपेक्षा का शिकार हुए जा रही हैं। रवींद्रालय चारबाग लखनऊ उत्तर प्रदेश के भवन पर बने इस महान कलाकार की कृति को देखिए।किस प्रकार स्थिति है। घास फूस उग रहे हैं। काई जैसी चीजें पनप रही हैं। इस स्थिति को देखकर यही लगता है कि कुछ दिनों में हम इस कृति को खो देंगे यदि जल्दी ही ध्यान नही दिया गया तो। यह बहुत…

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……फिर छलकी मधुशाला

 पूनम किशोर की चित्रों की प्रदर्शनी जहाँगीर आर्ट गैलरी मुम्बई में शुरू —- -भूपेंद्र कुमार अस्थाना —- “चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला, जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला, मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते, चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।” -(मधुशाला / भाग ३ / हरिवंशराय बच्चन)     कलाकार वही जो अपनी कल्पनाओं को अपनी कला के माध्यम से साकार रूप प्रदान करता है। प्रत्येक कल्पनाशील व्यक्ति कलाकार नही हुआ करता।  कलाकार किसी चीज को बनाने के पहले उसे अपने…

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सिरेमिक त्रिनाले में यूपी

उत्तर प्रदेश के दो सिरेमिक कलाकार सितांशु जी मौर्य लखनऊ तथा त्रिवेनी तिवारी भदोही की कलाकृति कंटेम्पररी क्ले फाउंडेशन द्वारा आयोजित दिनांक 31 जुलाई से 18 नवंबर 2018 तक   चलने वाले जवाहर कला केंद्र जयपुर में “इंडिया सिरेमिक त्रिनाले– ब्रेकिंग ग्राउंड ” में प्रदर्शित किया गया है। वर्तमान में शितांशु ललित कला अकादमी के क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता में सिरामिक सुपरवाइजर के रूप में कार्यरत हैं। और लगातार सेरेमिक विधा में कार्य भी कर रहे हैं। तथा त्रिवेनी सेरेमिक विधा में दिल्ली में स्वतंत्र कलाकार के रूप में कार्य कर रहे…

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शरद पांडेय-नारी संवेदनाओं का चितेरा

■ भूपेंद्र कुमार अस्थाना नारी भावों को अत्यंत खूबसूरती से अपने चित्रों में शरद पांडेय ने बखूबी उतारा है। वे अपने चित्रों में नारी को केंद्रीय पात्र बनाकर मार्मिक दृश्य सूत्र प्रस्तुत करने की कोशिश करते थे। चित्रों में आशा भरी नज़रें, इंतज़ार करती महिलाओं के भावों को मुख्य रूप से अपने चित्रों में स्थान देते थे। इनकी भूरे रंग की प्रधानता लिए चित्र मुख्य रूप से एक अलग प्रभाव छोड़ते हैं। इसके साथ ही लाल तथा हरे रंग का प्रयोग भी कहीं पीछे नहीं है। उनका भी अपना एक…

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जो नाटक नहीं लिख सकता वह कवि नहीं है – राजेश जोशी

दिल्ली। संवेदनशील मनुष्य के लिए जीवन जीना अत्यंत कठिन है। इसे जीने योग्य और सहनीय बनाने का काम साहित्य करता है। सुप्रसिद्ध कवि-नाटककार राजेश जोशी ने हिन्दू कालेज में हिंदी नाट्य संस्था ‘अभिरंग’ द्वारा आयोजित ‘लेखक की संगत’ कार्यक्रम में कहा कि नाटक सामूहिक विधा है जिसके कम से कम चार पाठ सम्भव हैं। ये पाठ क्रमशः नाटककार, निर्देशक, अभिनेता और दर्शक के हैं। हमें नाटक के सम्बन्ध में इन समझौतों को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि यह व्यक्तिगत नहीं समूह की विधा है। कार्यक्रम में युवा विद्यार्थियों के अनेक प्रश्नों के उत्तर देते हुए जोशी ने अपनी रचना प्रक्रिया, विचारधारा…

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जनता पागल हो गयी है

नई दिल्ली।  सत्ता की पूंजीवादी-भोगवादी संस्कृति के खिलाफ और रंगकर्मियो को सामाजिक आर्थिक-सुरक्षा के पक्ष में मजदूर दिवस पर प्रसिद्ध नाटक  ” जनता पागल हो गई है ” का मंचन हुआ।  “ विकल्प सांझा मंच ” नयी दिल्ली द्वारा सफदर हाशमी मार्ग, मंडी हाउस, पर हुी प्रस्तुति को  “सांझा सपना” संस्था के रंगकर्मियो द्वारा किया गया । शिवराम द्वारा लिखित यह नाटक हिन्दी का पहला नुक्कड़ नाटक माना जाता है। इसे सबसे ज्यादा खेले गए  नाटक का सम्मान भी प्राप्त है।  इस प्रस्तुति के निर्देशक युवा रंगकर्मी आशीष मोदी थे।  नाटक की मुख्य भूमिकाए क्रमश: नेता-अभिजीत, पागल-महफूज आलम, जनता– विक्रांत, पूंजीपति-रजत जोरया ,पुलिस अधिकारी– संदीप, सिपाही-हर्ष, शास्वत…

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अब भिलाई में प्रयोग

भारत के छः प्रदेशों के युवा कलाकारों की प्रदर्शित होगी कलाकृति १६  से १८ मई २०१८ तक भिलाई (छत्तीसगढ़) के नेहरू आर्ट गैलरी में शीर्षक ” प्रयोग – २ ” कला प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 16 मई को सायं 6 बजे श्री डी भार्गव (महाप्रबंधक प्रभारी खदान एवं रावघाट भिलाई इस्पात संयंत्र) करेंगे। इस कला प्रदर्शनी में छः प्रदेशों (झारखण्ड (जमशेदपुर) ,मध्य प्रदेश (जबलपुर,मलांजखण्ड ) ,छत्तीसगढ़ (खैरागढ़ ),उत्तर प्रदेश (आजमगढ़,इलाहबाद, लखनऊ,आगरा, ग़ाज़ियाबाद  ),दिल्ली ,राजस्थान(जयपुर) के ३८ युवा कलाकारों बैशालिका धारा,बिष्णु तिवारी ,भानु श्रीवास्तव…

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मुमताज़ अफसानानिगार असग़र वजाहत

अलीगढ ने मुझे बनाया है। इस संचयन का रस्मे इजरा अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में होना मेरे लिए बेहद ख़ास मौक़ा है। आज यहाँ मैं अनूठे शायर शहरयार, जावेद कमाल और कुंवरपाल सिंह को भी याद कर रहा हूँ। सुप्रसिध्द कथाकार-नाटककार असग़र वजाहत ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के केनेडी हॉल में आयोजित एक समारोह में कहा कि उर्दू के जो पाठक देवनागरी नहीं पढ़ पाते और हिंदी के वे पाठक जो उर्दू लिपि नहीं जानते -दोनों भारी नुकसान में हैं क्योंकि खड़ी बोली का साहित्य इन दोनों लिपियों में बिखरा हुआ है। वजाहत ने…

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