भारत मेरा दूसरा घर

अमित कल्ला से इनसंग सांग दक्षिण कोरिया के क्यूरेटर इनसंग सांग से मिलना हमेशा ही मन को एक अलग अहसास देता रहा है, दृश्य कलाओं के प्रति उनकी दीवानगी को विभिन्न कला उत्सवों में उनके जयपुर आने के दौरान अक्सर करीब से देखता रहा हूं | दो वर्ष पहले उनके साथ लम्बी यात्राओं के भी अवसर आए, तब कला की संजीदगी के अलावा जीवन के प्रति उनके विनम्र स्वभाव और मन की धीरता को देखकर मैं उनका कायल हो गया | सांग अपने आप में जिन्दगी से दो-दो हाथ करते…

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संगीत का संकटमोचन

आलोक पराड़कर (राष्ट्रीय सहारा, 26 अप्रैल 2020) इन पंक्तियों को लिखने में तो अब कोई नई बात नहीं है कि कोरोना संकट से पूरे विश्व में जिस प्रकार उथल-पुथल मच गई है, उसमें हम बहुत सारे नए परिवर्तनों को देख ही रहे हैं। बहुत कुछ बदल रहा है, बदल चुका है। लोग घरों में हैं, रोजगार-व्यापार बंद हैं, सड़कें वीरान पड़ी हैं और उन सारे अवसरों, आयोजनों का निषेध किया जा रहा है, जहां लोगों का जमावड़ा होता रहा है या हो सकता है। लेकिन यह जरूर हुआ है कि…

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पुरानी लकीर पीटते हैं सरकारी कला मेले

‘नादरंग’ से शैलेन्द्र भट्ट कला से जुड़े कई आयोजनों का अपना एक विशिष्ट महत्व है जहां एक मंच पर कई कलाकारों, कला समीक्षकों, कलाप्रेमियों को संवाद और कलाकृतियों के प्रदर्शन अवसर मिल पाता है। कला के प्रोत्साहन में ऐसे कई समारोह राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हैं जिनमें जयपुर आर्ट समिट ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। समिट की सफलता को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि इसने  2017 में आयोजन के अपने पांचवे वर्ष में 50 देशों के कलाकारों को जोड़ लिया। हालांकि समिट में इधर कुछ…

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आशाएं जीवन की जद्दोजहद में खो गईं

रवीन्द्र दास से पाण्डेय सुरेन्द भारत विभाजन के कुछ दिनों बाद ही मुंबई के कलाकारों द्वारा 1948 में प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप की स्थापना हो गई थी l भारतीय कला में बंगाल स्कूल द्वारा स्थापित राष्ट्रीयता के विरोध में और अंतरराष्ट्रीय कला आंदोलनों को भारतीय कला से जोड़ने के उद्देश्य से प्रोग्रेसिव ग्रूप की स्थापना हुई थी l उन दिनों पुरे देश के कलाकारों के बीच बंगाल ग्रूप और प्रोग्रेसिव ग्रूप इन्हीं दोनों की चर्चा होती थी lबिहार के कला इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो 70 के दशक तक बिहार…

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जैसे स्थिर पानी में मारा गया हो कंकड़

‘नादरंग-4’ के सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे आलेखों, साक्षात्कारों पर हमें व्यापक प्रतिक्रिया मिल रही है। इनमें से चुनिंदा टिप्पणियां हम यहां साझा कर रहे हैं- ईमानदारी से नहीं लिखा गया संगीत का इतिहास (विजय शंकर मिश्र से प्रख्यात शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायक राजन-साजन मिश्र की बातचीत)  काशी, वाराणसी, अविमुक्त, आनन्द कानन एवं महाश्मशान- आधुनिक बनारस के ये 5 प्राचीन नाम- इसकी 5 भिन्न विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। डा. काणे ने हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में लिखा है कि काशी रोम, येरुशेलम और मक्का से भी प्राचीन तथा पवित्र है।…

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मुख्यधारा के रंगमंच का असली चेहरा

राजेश कुमार रंगमंच के विभिन्न प्रकारों की चर्चा होती है तो संस्कृत रंगमंच, ग्रीक रंगमंच, पाश्चात्य रंगमंच, पारसी रंगमंच, मनोशारीरिक रंगमंच, यथार्थवादी रंगमंच, तीसरा रंगमंच जैसे  नाम तत्काल स्मरण में आते हैं। लेकिन इनदिनों रंगमंच के गलियारों से एक नया नाम दबे – फुसफुसे रूप में सुनने को मिल रहा है जो न रंगमंच के किसी ग्रंथों, किताबों के पन्नों में दिखाई देता है, न रंग आलोचना – समालोचना के किसी कोने या सरकारी नाट्य संस्थानों के किसी गलियारे – चबूतरों के इर्द – गिर्द। संभव है कि आप इस…

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सरकार का काम है धमकाना, रंगमंच का लड़ना

प्रतुल जोशी से रंगकर्मी रतन थियम ( नादरंग 4 ) (स्थानः कोरस रेपेटरी थिएटर-इम्फाल)  0 थिएटर के बारे में आपने कहीं कहा था कि मैं अभी भी थिएटर को समझने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ हूं, तो सबसे पहले तो यह बताइए कि थिएटर का आपके लिए क्या अर्थ है?– मैंने इसलिए कहा था कि मुझे लगता है थिएटर जो है वह एक जगह कभी नहीं रहता है और हमेशा बदलता रहता है और इसकी प्रक्रिया जो है ये हुआ एक सिचुएशन का। लेकिन प्रक्रिया जो है वह ये है…

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विरासत के विनाश की बेचैनी में काम्बोज की कला

मंजुला चतुर्वेदी   पर्यावरण विमर्श के सन्दर्भ में कलाजगत में भगवती प्रकाश काम्बोज एक सशक्त और प्रासंगिक हस्ताक्षर हैं। उनकी कृतियों में पर्यावरण, जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों के सुन्दर समन्वय, उसकी आवश्यकता और निरन्तरता को रूपायित करने का प्रयास स्पष्ट है। काम्बोज अपने चित्रों के माध्यम से जनमानस को सचेत करने का प्रयास करते हैं कि यदि प्रकृति संपुष्ट नहीं है तो जीवन का अस्तित्व भी गहन संकट से घिर जाएगा। कहीं मानव जीवन विकास की दौड़ में कागजी दस्तावेज बनकर न रह जाए, ये एक चेतावनी भी उनके चित्र…

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ईमानदारी से नहीं लिखा गया संगीत का इतिहास

विजयशंकर मिश्र से राजन एवं साजन मिश्र  काशी, वाराणसी, अविमुक्त, आनन्द कानन एवं महाश्मशान- आधुनिक बनारस के ये 5 प्राचीन नाम- इसकी 5 भिन्न विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। डा. काणे ने हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में लिखा है कि काशी रोम, येरुशेलम और मक्का से भी प्राचीन तथा पवित्र है। सिस्टर निवेदिता ने इसे वैटिकन सिटी से हजार गुना पवित्र लिखा है। संगीतेश्वर महादेव का क्रीड़ांगन होने के कारण यह स्वाभाविक भी है और अनिवार्य भी कि बनारस और संगीत का संबंध अनन्य, अभिन्न और अटूट है। तभी तो इसे…

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अक्ल से आगे है कला की मंजिल

रेखा के.राणा से चित्रकार सैय्यद हैदर रजा भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व व पश्चात के दशकों में आधुनिकता के नाम पर कला में अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे थे। तत्कालीन समय के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी कलाकारों में सैय्यद हैदर रजा का नाम आता है। रजा का जन्म 1922 में मध्य प्रदेश के बावरिया में हुआ था। रजा के चित्रों पर उनके जन्म स्थान की संस्कृति एवं कला अपने गहरे रूपों में विराजमान थी। रजा ने कई दशकों तक कला जगत में कार्यशील होकर अपनी उपस्थिति दर्शाई । 1947 में भारत…

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