कला देखने के दरमियान

अमित कल्ला सारे द्वार /खोलकर /बाहर निकल /आया हूं /यह /मेरे भीतर /प्रवेश का /पहला कदम है –जैन मुनिश्री क्षमासागर की यह सरल-सी कविता मुझे भी अपने भीतर प्रवेश करने का अनुनय करती दीखती है और मैं अपने मन के बहुतेरे द्वार खोलकर किन्हीं चित्रों को देखने कि कोशिश करता हूं, जहां बहुत सारी मूर्त-अमूर्त आकृतियां नई रोशनी लिए भीतर उतरने को उभर आयी हैं।गाहे-बगाहे हमारे द्वारा कुछ भी देखा जाना मौटे तौर पर किसी सहज वृति का ही नाम है, दरअसल जो एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे चाहे-अनचाहे हमें गुज़ारना…

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