कहे में जो है अनकहा

नादरंग-4 (संपादकीय) शब्दों की अपनी सीमाएं हैं। कई अनुभूतियां ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्त करते हुए लगता है कि शब्द कम पड़ रहे हैं या उनके अर्थों में इतनी सामर्थ्य नहीं है जो सटीक वर्णन कर सकें। एक अधूरेपन का बोध होता है, लगता है जैसे ये अनुभूतियां शब्दों के कोश की पकड़ से परे हैं। मराठी कवि मंगेश पाडगांवकर ने ‘शब्दावाचुन कड़ले सारे शब्दांच्या पलिकडले..’ में शब्दों से परे की बात क्या इसीलिए की थी या हिन्दी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने अपनी बेटी की हंसी का वर्णन…

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