समकालीन कला की अवधारणा

रेखा के. राणा किसी भी रचना में समय अनिवार्य तत्व है। रचना के विषय प्रथमतः समय के झरोखे से होकर आते हैं। वस्तुतः विषय तो हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, उन्हें ग्रहण करने में रचनाकार की संवेदनशीलता विशेष रूप से माध्यम के रूप में काम करती है। कला के सभी रूप अपने परिवेश के साथ लगातार टकराव से उपजते हैं किन्तु भारतीय संदर्भ में शाश्वत और चिरंतन मूल्यों की अजस्र धारा संवेदना की अभिव्यक्तियों को इस प्रकार प्रभावित करती रही कि कला के यथार्थ रूप या तो सामने आए ही…

Read More

श्याम शर्मा-मगध में मथुरा के उत्सवी रंग

कुमार दिनेश लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की भूमि मथुरा (यूपी) के गोवर्धन कस्बा में जन्में छापा-कलाकार श्याम शर्मा ने 1966 में प्राचीन मगध की भूमि पाटलिपुत्र को अपनी कला साधना का केंद्र बनाया और आधी सदी से भी अधिक लंबी कला यात्रा के बाद आज 77 साल की उम्र में वे देश के शीर्षस्थ कलाकारों की पंक्ति में खड़े हैं। लखनऊ कला महाविद्यालय से डिप्लोमा करने के बाद वे पटना आए और यहां पटना कला महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। उन दिनों पूरे देश में शिक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता डिप्लोमा…

Read More

स्मृतियों के कई रंग

जयकृष्ण अग्रवाल कभी कभी बड़े अहम लोग हाशिए पर चले जाते है। ऐसे ही थे लखनऊ कला महाविद्यालय के लीथो प्रोसेस फोटो मेकैनिल विभाग के प्रवक्ता हीरा सिंह बिष्ट। फोटोग्राफिक डार्करूम आदि की सुविधा भी इसी विभाग में उपलब्ध थी। फोटो फिल्म का जमाना था और कैमरे के बाद सारा काम तो डार्करूम में ही होता था। हीरा सिंह जी को सारे कैमिकल्स और उनके प्रयोग के बारे में विस्तृत जानकारी थी। किन्तु वह समय था जब फोटोग्राफी से अधिक लोगों की रुचि कैमरों तक ही सीमित थी। आमतौर से…

Read More