तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा-राज बिसारिया

तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा राज बिसारिया से बातचीत 0 आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो कैसे लगता है? जिन ख्वाबों को लेकर चले थे, क्या वे पूरे हो गए? -ख्वाब तो वह होता है जो पूरा नहीं होता है। कुछ बातें जरूर किसी कारण से मन में ठानी थी। जब विश्वविद्यालय में पढ़ता था 1953 की बात है। उस समय नाटकों के कितने निर्देशक थे जो बताते थे कि ये करो, ये न करो। उस जमाने के लड़के-लड़कियां जो काम कर…

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