योगेश-कैसी है पहेली

आलोक पराड़कर

(राष्ट्रीय सहारा,31 मई 2020)
‘मैं अपने बारे में शैलेंद्र की लाइन कह सकता हूं-सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी, सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी..।’ प्रसिद्ध गीतकार योगेश ने एक साक्षात्कार (इंडिया टुडे, साहित्य वार्षिकी 2017-18 ) में तीन वर्ष पूर्व यह बात कही थी। मुंबई के अपने फ्लैट में गुमनामी की जिन्दगी जी रहे योगेश किस होशियारी के ना होने की बात कह रहे थे? एक गीतकार की होशियारी तो उनमें खूब थी। अगर ना होती तो उनके ऐसे बेमिसाल गीत हमारे बीच कैसे होते,  तीन पीढ़ियों तक गुनगुनाए जाने वाले गीत, जो कभी मौसम या पहर के बयान में, कभी प्रेम में, कभी उदासी में तो कभी जिन्दगी का फलसफा बताने के लिए हमारे होठों पर ऐसे थिरक आते हैं जैसे ये विरासत में मिले मुहावरे हों। 

अगर कहें कि शाम होती है तो हम अक्सर कह उठते हैं ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और बारिश होती है तो’ रिमझिम गिरे सावन’, जिंदगी के उतार चढ़ाव को ‘जिन्दगी कैसी है पहेली हाय’ और ‘कई बार यूं ही देखा है’ से परिभाषित करते हैं, किसी के मिलने पर ‘जानेमन जानेमन तेरे दो नयन’, किसी की याद में  ‘ना जाने क्यूं होता है ये जिंदगी के साथ’, ‘बड़ी सूनी सूनी है’ या फूलों के बीच आकर ‘मैंने कहा फूलों से’ या ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे’ जैसे गीतों को याद करते हैं।योगेश ने खुद इसी साक्षात्कार में कहा था कि प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने कहा था कि खूबसूरती पर तुम्हारे ‘सौ बार बना के…’से अच्छा कोई गीत नहीं हो सकता है और इसी गीत पर सिम्मी ग्रेवाल ने उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की थी।

तो एक गीतकार जिसने इतने बेमिसाल गीत दिए, बाद में गुमनामी में क्यों चला गया?क्यों उसे उसका अपेक्षित सम्मान नहीं मिल सका? क्या एक गीतकार के चर्चा में रहने और सम्मान पाने के लिए केवल अच्छा गीत लिखने की होशियारी नहीं चाहिए, इसके लिए कुछ दूसरे तरह की होशियारी की भी जरूरत होती है?योगेश को साहित्यकार  कहे जाने की कोई अपेक्षा नहीं थी और वे ये भी कहते रहे कि वर्षों तक मैंने रोजी-रोटी को प्राथमिकता दी लेकिन उनकी इस स्वीकार्यता या संकोच से हटकर अगर देखें तो वे हर तरह की कसौटी पर कसे गए और उस पर खरे उतरते रहे। अपने समय की मशहूर फिल्म ‘आनंद’ में दो गीतकार हैं। इस फिल्म में जहां गुलजार ने  ‘ना जिया लागे ना’ और ‘मैंने तेरे ही ‘गीत लिखे हैं तो योगेश ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए ‘और ‘जिंदगी कैसी है पहेली हाय’। अगर कभी कोई योगेश से अन्य गीतकारों की तुलना करना चाहे तो वह इस  फिल्म के बहाने भी निष्कर्ष निकाल सकता है।

योगेश को बहुत उम्मीद थी कि उन्हें’ जिंदगी कैसी है पहेली’ पर अवार्ड मिलेगा। उन्हें नहीं मिला। वे निराश हुए। योगेश को उनका अपेक्षित सम्मान भी नहीं मिला। 

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