मेरे सांगीतिक जीवन के आधार स्तम्भ मेरे पिता

कमला शंकर(प्रसिद्ध गिटार वादिका)

सिर से पिता की छांव चली गई। 85 वर्ष की अवस्था में पिताजी 12 जून को अंतिम यात्रा को प्रस्थान कर गए। वे मेरे सांगीतिक जीवन के आधार स्तम्भ,मेरी हर सोच हर कार्य मे अविचल चट्टान की भांति खड़े रहते थे। आज मैं जो कुछ भी हूं उन्हीं के आशीर्वाद फलस्वरूप हूं।  पिता जी और माता जी  की पारिवारिक पृष्ठभूमि में संगीत से जुड़ाव रहा है और इसी के चलते पिता जी हारमोनियम,,बांसुरी के साथ साथ नाक से शहनाई भी बजाते थे और अपने लोगों के मध्य लोकप्रिय भी थे।

17 दिसंबर 1934 को वाराणसी में  एक साधारण दक्षिण भारतीय परिवार में डॉ. रंगस्वामी अय्यर के पुत्र के रूप में जन्मे मेरे पिताजी डॉ .आर.शंकर परम सौभाग्यशाली थे कि काशी में ही गंगा महल घाट पर उनका जन्म हुआ  कांची कामकोटी पीठाधीश्वर स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी ने गंगा-महल  में उनका शंकर नामकरण किया और वे  काशी में भगवान शंकर के चरणों  में ही विलीन हो गए। सरल, सहज और स्नेही स्वभाव के यशस्वी चिकित्सक थे वे और सबसे बड़ी बात अपनी वय के 80वे साल तक  चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े रहे। लोग उन्हें गरीबों के मसीहा के रूप में जानते थे।उनकी सादगी अपने आप मे बेमिसाल थी।अनेक भाषाओं के ज्ञाता विशेष कर ठेठ बनारसी भाषा मे लोगों से बात करना उनकी विशिष्टता थी।उनकी भाषा और व्यक्तित्व से ये पता लगाना कठिन था कि वे दक्षिण भारतीय थे।उन्होंने अपने जीवन में असंख्य लोगों की मदद की थी।स्नेही स्वभाव के कारण राह चलते लोगों का भी हालचाल लेना उनकी खासियत थी।इसी के चलते उनको अनेक बार विधानसभा चुनाव लडऩे के लिए निमंत्रित भी किया गया मगर वह कभी  तैयार नहीं हुए।                   

 एक चिकित्सक का जीवन हर पल सेवा के लिए समर्पित रहता है, मैं और मेरी छोटी बहन रूपा ने बचपन से ही उन्हें निःस्वार्थ भाव से  मरीजों की सेवा में लीन देखा। इन सबके बीच उन्होंने  हम दोनों बहनों को बहुत ही लाड़ -प्यार से पाला और कभी भी संकीर्ण सामाजिक सोच का समर्थन नही किया और वंश के लिए  पुत्र प्राप्ति की धारणा को भी कभी स्वीकार नहीं किया। हम दो बहनें पुत्रियों के साथ साथ पुत्रों की भूमिका भी निभाते रहे।अनुशासन के साथ उनकी सीख ने हम बहनों को प्रतिदिन संस्कारित किया। घर में सभी विषयों पर हमें अपनी राय रखने की स्वतंत्रता थी। हर दुःख सुख में विराट पर्वत की भांति आश्रय देते हुए विशेषकर मेरे व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन मे आये दुःख को भी उन्होने अपने विराट बरगद समान छाया में भींच लिया था ,समेट लिया था,पापा की बिटिया जो ठहरी।  पिछले चार सालों से हृदय के मरीज़  थे और अचानक बृहस्पतिवार को तबियत बिगड़ने लगी और शुक्रवार को अस्पताल ले जाते समय  उनका निधन हो गया।उनकी सरलता,छोटे, बड़े, युवा,बच्चे सबसे प्रेम से बात करना आदि विशेषताओं के कारण उनका व्यापक प्रशंसक वर्ग था जिसका पता बहुत सारे लोगों के संदेश और उनसे जुड़ी व्यक्तिगत संस्मरण के माध्यम से प्राप्त हो रही है। कहते हैं ना शरीर मर जाता है मगर आत्मा अजर अमर है,भौतिक रूप से भले ही नही है मेरे पापा पर मैं उन्हें अंतर से महसूस कर रही हूं लगातार।  

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