शरद पांडेय-नारी संवेदनाओं का चितेरा

■ भूपेंद्र कुमार अस्थाना
नारी भावों को अत्यंत खूबसूरती से अपने चित्रों में शरद पांडेय ने बखूबी उतारा है। वे अपने चित्रों में नारी को केंद्रीय पात्र बनाकर मार्मिक दृश्य सूत्र प्रस्तुत करने की कोशिश करते थे। चित्रों में आशा भरी नज़रें, इंतज़ार करती महिलाओं के भावों को मुख्य रूप से अपने चित्रों में स्थान देते थे। इनकी भूरे रंग की प्रधानता लिए चित्र मुख्य रूप से एक अलग प्रभाव छोड़ते हैं। इसके साथ ही लाल तथा हरे रंग का प्रयोग भी कहीं पीछे नहीं है। उनका भी अपना एक अलग प्रभाव है जो मुद्राओं में चार चांद लगाती नज़र आती हैं।
सौम्यता उनके चित्रों की मुख्य विशेषता है।कुछ चित्रों में सामान्य सी बातें नज़र आती हैं जैसे लालटेन।काव्यगत सौंदर्य को प्रस्तुत करने में चित्र मुख्य रूप से सफल हैं। लालटेन की रोशनी में इंतज़ार करती महिलाओं के भावों से एक अलग संदेश भी दृष्टिगोचर होता है। लेकिन शरद पांडेय के चित्रों के मुख्य पात्र कौन है, उन्होने कभी बताया नहीं। रंगों में काफी हद तक समानता होने के बावजूद हर चित्रों में अलग अलग भावों को प्रस्तुत करने में शरद सफल रहे। महिला के माध्यम से जीवंत संस्कृति को दर्शाने का भी बखूबी प्रयास किया गया है।
   दो वर्ष पहले पांच जुलाई 2016 की  सुबह शरद पांडेय का देहांत हो गया था। वह काफी समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। मृत्यु के लगभग तीन महीने पहले ही उन्हें इस खतरनाक बीमारी के बारे में पता चल पाया था। इसके बाद से लखनऊ कैंसर संस्थान से उनका इलाज चल रहा था। उनकी मृत्यु की खबर से कला के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ पड़ी थी।
 शरद राजधानी लखनऊ की न्यू हैदराबाद कॉलोनी में रहते थे। उन्होंने मशहूर पेंटर एमएफ हुसैन के संपर्क में भी काम किया था। उन्हें ललित कला अकादमी की ओर से इसके लिए चुना गया था। शरद पांडेय ने सिनेमा के सौ साल पूरे होने पर प्रदर्शनी भी की थी। इस प्रदर्शनी में उन्होंने हिंदी फिल्मों के मशहूर संवाद और लाउडस्पीकर से फिल्मों के प्रचार को भी चित्रों में उकेरा था। चाहे वह ‘पाकीजा‘ में राजकुमार द्वारा मीना कुमारी को देखकर बोला गया डायलॉग, ‘आपके पैर बहुत हसीन है, इन्हें जमीन पर न रखे, मैले हो जाएंगे‘ हो या फिर फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ का ‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता‘ ।
 शरद पांडेय का जन्म 20 अक्टूबर 1958 में लखनऊ में हुआ था।उन्होंने कला की शिक्षा लखनऊ कला महाविद्यालय से ली थी। उनके चित्रों की प्रदर्शनी लखनऊ ,दिल्ली, भोपाल, नैनीताल, कोलकाता, अल्मोड़ा ,राजस्थान में मुख्य रूप से लगाई गई है। उन्हें राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था।
   नारी संवेदना का मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी पांडेय के चित्रों से परिलक्षित होता है। चित्रों में आंखों से नारी भावों को स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सकता है।उनकी वेदना और आक्रोश भी इन आँखों के माध्यम से सामने आ जाता है। उनके चित्रों में एक सार्थक पक्ष और दिखाई देता है कि महिला पात्र जिस खिड़की या दरवाजे के पास खड़ी होकर इंतज़ार करती है, उसकी कलात्मकता भी कम नहीं है। बांसुरी बजाती महिला के भी भावों को इनके चित्रों में देख सकते हैं।

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4 Thoughts to “शरद पांडेय-नारी संवेदनाओं का चितेरा”

  1. Kejal limbasiya

    Sharad pande vo khud hi rangome milege ajbhi

  2. Jaikrit Singh Rawat

    Sharad ke Janamdin 20 October per ‘Naad Rang’ kuch Vishesh shradhanjali dene per vichar kare!

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