चले गए रंगकर्मियों के ‘चचा’!

स्मृति शेष/ इब्राहिम अलकाजी

आलोक पराड़कर (अमर उजाला, 9 अगस्त 2020)

‘सुनते हैं इश्क नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग, हम सब के सब फकीर उसी सिलसिले से हैं-‘ फिराक गोरखपुरी के शेर को थोड़ी फेरबदल के साथ रंजीत कपूर ने भारतीय रंगमंच के शलाका पुरुष इब्राहिम अलकाजी के निधन पर अपनी श्रद्धांजलि स्वरूप व्यक्त किया था। कहना ग़लत नहीं, सशक्त रंगकर्मियों का एक बड़ा समूह जिसने अपने कार्यों से रंगमंच, टेलीविजन और फिल्मों में महत्वपूर्ण पहचान बनाई, इसी ‘बुजुर्ग’ के कारण रंगकर्म का ‘फकीर’ बना था। अलकाजी उन ढेर सारी प्रतिभाओं के गुरु और मार्गदर्शक थे, जिन्होंने अपनी खुद की एक बड़ी पहचान बनाई और एक व्यापक प्रशंसक वर्ग तैयार किया। बीवी कारंत,  बीएम शाह, ओम शिवपुरी,  सई परांजपे, मोहन महर्षि, रामगोपाल बजाज,  उत्तरा बावकर, सुरेखा सीकरी, एमके रैना,  नादिरा बब्बर,  मनोहर सिंह, देवेन्द्रराज अंकुर, कीर्ति जैन, राजेन्द्र गुप्त,  नसीरुद्दीन शाह,  ओमपुरी, भानु भारती,  बंसी कौल, रतन थियम, रोहिणी हतंगड़ी, प्रसन्ना, राज बब्बर, रंजीत कपूर, पंकज कपूर, के.के.रैना, रघुवीर यादव (क्रम प्रशिक्षण प्राप्त करने के वर्ष के अनुसार )जैसे अभिनय की दुनिया के कई बड़े नाम उन्हें अपना शिक्षक स्वीकार करते हैं और यह सूची काफी लंबी है। अलकाजी का अपना एक अनुशासन था और वे प्रशिक्षण को लेकर काफी सख्त थे। उन दिनों को याद करते हुए नसीरुद्दीन शाह बताते थे-‘हम उन्हें चचा कहा करते थे। चचा सुबह-सुबह हास्टल में आकर हमें बिस्तर से खदेड़ते थे क्लास में जाने के लिए, उनके असंभव स्तर के मानक हुआ करते थे, वे हमें हमारी क्षमता तक पहुंचने के लिए उकसाते रहते थे, हमारी मदद किया करते थे-कभी लात मारकर तो कभी पुचकार कर, कभी मोहब्बत से तो कभी सख्ती से। अलका जी खुद एक मिसाल थे जहां तक पहुंचना हमें नामुमकिन लगता था।’

अलका जी ने खुद भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अपने कार्यकाल को अपने जीवन का सबसे सुनहरा समय माना है। वे 1962 से 1977 तक, करीब 15 साल, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे और इस दौरान यहां से ऐसे स्नातक निकले, जिन्होंने न सिर्फ रंगमंच बल्कि फिल्म और टेलीविजन को भी अपने-अपने ढंग से समृद्ध किया। जब उनसे कहा जाता कि उनके प्रशिक्षित स्नातक फिल्मों में चले जाते हैं, अलका जी कहते, ‘जो फिल्मों में गए उन्होंने रंगमंच छोड़ा नहीं और रंगमंच से फिल्मों में जाना आसान है लेकिन फिल्मों से रंगमंच में आना मुश्किल है।’ 

अलकाजी ने हालांकि रंगमंच में प्रशिक्षण के महत्व को स्थापित किया लेकिन उनका स्मरण करते हुए उन्हें मात्र गुरु, प्रशिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में याद किया जाना, उनके योगदान को सीमित करके देखना होगा। अलकाजी ने रंगमंच को एक नई पहचान दी और उसे नए प्रयोगों से लगातार समृद्ध किया। वे नाटकों को बंद प्रेक्षागृहों से निकालकर किलों के अवशेषों जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी ले गए जहां ‘अंधायुग’ और ‘तुगलक’ जैसे नाटकों की प्नस्तुतियों ने एक नई भव्यता और पहचान पाई। हालांकि अलकाजी ने शेक्सपीयर, मौलियर, लोर्का जैसे विदेशी नाटककारों के साथ ही मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और गिरीश कर्नाड के नाटकों को भी मंचित किया लेकिन उनके रंगमंच पर पश्चिमी प्रभावों का असर महसूस किया जाता रहा और उन्हें पाश्चात्यवादी कहा गया। यह सबकुछ तब था जब हिन्दी को लेकर उनका विशेष आग्रह भी था। 

यह भी गौरतलब है कि उसी रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स से प्रशिक्षित, जहां अलकाजी ने प्रशिक्षण प्राप्त किया था, हबीब तनवीर नया थिएटर की स्थापना (1959) कर चुके थे और छत्तीसगढ़ी कलाकारों के साथ रंगमंच के देसी मुहावरे को विकसित कर रहे थे, अलकाजी को भारतीय रंगमंच को आधुनिक और अन्तरराष्ट्रीय पहचान देने के लिए पश्चिमी शैली की निकटता पसंद आती रही। यहां यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि उनके द्वारा प्रशिक्षित कई स्नातकों को अपनी पहचान विकसित करने के लिए इन प्रभावों से निकलकर भारतीय परंपराओं और लोक-आंचलिक शैलियों से जुड़ना अधिक उपयुक्त लगा। 

अलकाजी का परिवार अरब का था और बंटवारे के बाद उनके पारिवारिक सदस्यों ने पाकिस्तान जाना पसंद किया। अलकाजी का जन्म पुणे में 18 अक्तूबर 1925 को हुआ था। रंगमंच की गतिविधियां मुंबई (तत्कालीन बंबई) में शुरू हुई और फिर वे नेहरु जी के बुलावे पर दिल्ली आकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े। वे कला संग्राहक भी थे और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से हटने के बाद उन्होंने छायाचित्रों के दुर्लभ संग्रह में समय लगाया। उन्होंने 94 वर्षों का भरा-पूरा, सक्रिय जीवन जिया। उनका न होना, हिन्दी रंगमंच के घर का अपने सबसे बुजुर्ग सदस्य से वंचित हो जाना है, जो अब इसकी नींव में, दीवारों में हमेशा उपस्थित रहेगा। 

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