इरफान को कई बार देखना..

आलोक पराड़कर

(राष्ट्रीय सहारा,  30 अप्रैल 2020)

फिल्म अभिनेता इरफान खान की अभिनय यात्रा पर गौर करें तो हम उनकी इमेज को किस दायरे में रख पाएंगे- नशीली आंखों वाला नायक या आंखों से खौफ पैदा कर देने वाला खलनायक, बीहड़ का बागी जो हमारे ग्रामीण परिवेश के करीब है या एक पढ़ा-लिखा बौद्धिक शहरी, अपनी उधेड़बुन में खोए रहने वाला कोई स्वप्नजीवी या कई रातों तक सो न पाने वाला मनोरोगी, अंग्रेजी सही ढंग से न बोल पाने वाला हमारे मध्यमवर्गीय समाज का कोई प्रतिनिधि या हालीवुड में अपनी साख रखने वाला भारतीय अभिनेता। इरफान किसी दायरे में बंधने वाले अभिनेता नहीं थे। वे अभिनय की दुनिया में छवि अर्थात इमेज नामक उस धारणा को धता बताते हैं जिससे बाहर जाने का जोखिम कोई अभिनेता या अभिनेत्री उठाने से डरता है।   इरफान खान की सफलता इसी में थी कि उनके भीतर का कलाकार ऐसे किसी भी दायरे का अतिक्रमण करता है। उनका हर चरित्र उनके अभिनेता को एक नई पहचान देता है। आप उन्हें खलनायक के रूप में भी बेहतरीन अभिनय करते हुए देख सकते हैं तो नायक के रूप में भी। और यह सायास भी था। इरफान ने अपने एक टीवी साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि ‘हासिल’ में भूमिका के बाद उन्हें खलनायक के तौर पर कई सारी फिल्मों में अभिनय के प्रस्ताव मिले लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। इसकी वजह ये थी कि वे दूसरी तरह की भूमिकाएं चाहते थे। वे किसी भेड़चाल में बंधना नहीं चाहते थे, किसी इमेज के गुलाम नहीं होना चाहते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि मेरा जन्म शायद परम्पराओं को तोड़ने के लिए हुआ है और वे अभिनय की ऐसी परम्पराओं को भी लगातार तोड़ते रहे।लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। पूर्व में भी कुछ कलाकारों की नायक-खलनायक की छवियों को लोगों ने स्वीकार किया ही था। लोकप्रिय मुहावरे में देखें तो शाहरुख खान, आमिर खान या उनके पहले विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई कलाकारों की ऐसी दोनों ही तरह की भूमिकाओं को उनके प्रशंसकों ने पसंद किया। लेकिन इरफान के अभिनय ने इससे भी आगे का संसार रचा। उनकी अभिनय कला दोनों की संयुक्त उपस्थिति को भी अभिव्यक्त करती है। हममें से ज्यादातर लोगों का जीवन केवल नायक या केवल खलनायक का जीवन नहीं होता। हम कभी अपनी जमीर की सुनते हैं, कभी अपने स्वार्थ के अधीन होते हैं। कभी ईमानदारी को स्वीकार करते हैं तो कई बार लालच हम पर हावी हो उठता है। यह सहअस्तित्व और एक से दूसरे की ओर जाने को दिखा पाने की कला शायद इरफान ने जितने बेहतर ढंग से साधी थी, वह दूसरे अभिनेताओं में उस तरह नहीं मिलती है।यही वजह थी कि वे ‘पानसिंह तोमर’ जैसे डाकू को भी नायक की तरह दर्शकों के दिलों में बिठा पाए या ‘हिन्दी मीडियम’ में अंग्रेजी माध्यम के अच्छे विद्यालय में दाखिला दिलाने के लिए एक अभिभावक के गलत-सही प्रयासों को तर्कसंगत बना पाए। इसकी बेहतरीन अभिव्यक्ति ‘मकबूल’ में होती है जहां जहांगीर खान के प्रति अहसानों तले लेकिन उसकी पत्नी से प्यार करने और धोखा देने वाले मकबूल के किरदार को उन्होंने जिया है। ‘लंचबाक्स’ या ‘करीब करीब सिंगल’ में अधेड़ उम्र के प्रेम, उसकी द्वंद्वांत्मक, उसके असमंजस और हिचकिचाहट को भी उन्होंने इसी तरह संभव कर दिखाया है। इसमें उन्हें इस कारण भी सफलता मिली कि इरफान के व्यक्तित्व और अभिनय में एक किस्म की गंभीरता और रहस्यात्मकता रही। उन्हें कम संवाद बोलने वाला अभिनेता माना जाता रहा। वे आंखों और चेहरे से ही बहुत कुछ कह देते थे। लेकिन ऐसा करते हुए बहुत अधिक अनकहा रह जाता था। इस अनकहेपन में ही अभिनय की संभावनाएं छिपी होती थीं, चरित्र के विस्तार और उसके बदलाव की भी। किसी शायर ने कभी कहा था- ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिस को भी देखना हो कई बार देखना’। इरफान की अभिनय यात्रा न सिर्फ कई तरह के इंसानों को परदे पर उतारती है बल्कि वह एक इंसान के भीतर के अलग-अलग इंसानों को भी अभिव्यक्त करती है, कई बार अलग-अलग और कई बार एक साथ भी। 

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