इन्हीं पत्तों में कहीं ढूंढ़ना मत, पंख हूं, आकाश है…

स्मृति/ मुकुंद लाठ  

आलोक पराड़कर (राष्ट्रीय सहारा, 9 अगस्त 2020)

सिखाने-समझाने की कई प्रक्रियाएं होती है। इब्राहिम अलकाजी के लिए यह उनका प्रशिक्षण था तो मुकुन्द लाठ के लिए उनकी पुस्तकें, आलेख और व्याख्यान  । लाठ के शोध और चिन्तन ने देश-दुनिया को कला-संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का जिस प्रकार अध्ययन कराया, उनकी नई व्याख्याएं कीं, उन पर सवाल किए-वह उनकी दुर्लभ प्रतिभा और विद्वता से ही संभव था। इस सप्ताह हमने इन बड़ी सांस्कृतिक शख्सियतों को खो दिया है।लाठ ने हालांकि सांस्कृतिक इतिहास और संगीत पर गंभीर किया लेकिन उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। वे प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंड़ित जसराज के शिष्य थे और लंबे समय तक उनके साथ मंच पर तानपुरा लेकर बैठा करते थे। उन्होंने नामदेव जैसे भक्ति कवि पर भी शोधपूर्ण कार्य किया और इन सबके बीच कविताएं भी लिखा करते, जिनका संग्रह उनके जीवन के उत्तरार्ध में प्रकाशित हुआ। वे कला संग्राहक भी थे और जयपुर का उनका आवास कलाप्रेमियों को किसी कला संग्रहालय से कम नहीं लगता था। 

 लाठ का जन्म कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था, 1937 में लेकिन विदेश के अतिरिक्त उनका ज्यादातर जीवन राजस्थान में, जयपुर में व्यतीत हुआ। हालांकि पंड़ित जसराज से उनकी भेंट कोलकाता में ही हो गई थी। वे और उनके भाई पंडित मणिराम उनके घर आया करते थे। मुकुंद लाठ के मामाजी उनके शिष्य थे। लाठ ने पहले पंडित मणिराम से बांसुरी सीखी। पंडित जसराज से उनकी दोस्ती थी जो बाद में गुरु और शिष्य के रिश्ते में बदल गई। संगीत से लगाव तो आरंभ से ही था ही, इस रिश्ते ने उन्हें संगीत में गहरे तक उतार दिया जो पूरे जीवन उनके काम आता रहा। लाठ के संगीत पर शोधपूर्ण कार्यों का आरंभ ‘दत्तिलम’ से माना जा सकता है जो उन्होंने बर्लिन में शुरू किया था। बर्लिन की एक संस्था वैश्विक संगीत पर कार्य कर रही थी और अपने परिचितों के जरिए लाठ का इस संस्था से जुड़ाव हुआ जिससे वे वहां पहुंच गए। यह प्राचीन ग्रंथ दत्तील द्वारा रचित है और इसमें उस संगीत का विवेचन है जो साम और राग संगीत के बीच का माना गया है। यह संगीत इन दोनो प्रकार के संगीत के बीच न सिर्फ एक सेतु बनाता है बल्कि यहीं पर पहली बार छंदबद्ध संगीत से आगे बढ़ते हुए संगीत ताल के संपर्क में आता है। इसे गांधर्व संगीत का नाम दिया गया है और संगीत की यात्रा में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लाठ ने इस ग्रंथ का अनुवाद और विश्लेषण किया तथा बाद में इसी को अपने शोध का विषय बनाया। हालांकि नाट्यशास्त्र सहित कई प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख है लेकिन लाठ को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने गांधर्व संगीत के महत्व के बारे में संगीतकारों, विद्यार्थियों और तमाम संगीतप्रेमियों को विस्तार से बताया। और यह संभवतः पहले-पहल ही था।

पं. जसराज के साथ मुकुन्द लाठ

 ऐसे ही एक और दुर्लभ ग्रंथ को भी प्रकाश में लाने का श्रेय उन्हें मिला जो हिन्दी में लिखा 17 वीं सदी का ‘अर्धकथानक’ है। इसे पहली आत्मकथा कहा जा सकता है जो बनारसीदास नामक जैन व्यापारी की है जो जौनपुर और आगरा जैसे शहरों में रहे। अंग्रेजी में ‘हाफ ए टेल’ शीर्षक से अनुवाद करते हुए मुकुंद लाठ ने माना कि जिस प्रकार बनारसीदास ने अपने बारे में लिखा है, उसकी परंपरा पहले नहीं रही। इसलिए यह अपने ढंग का पहला ग्रंथ माना जाना चाहिए। नाट्यशास्त्र की कई व्याख्याएं होती रही हैं लेकिन मुकुंद लाठ ने अपने लेखों और व्याख्यानों से जिस प्रकार लोक परंपराओं और समकालीन कला प्रवृत्तियों को उससे जोड़ा है, वह उनके शोध और चिंतन से ही संभव हो सका। उन्होंने तमाम प्रचलित लोक शैलियों की जड़ें वहां तलाशी हैं और अपने तर्कों से उन्हें सिद्ध किया है।इसी प्रकार उनका एक महत्वपूर्ण कार्य निर्गुण संत नामदेव पर है। उन्होंने नामदेव पर शोधपूर्ण कार्य करते हुए ‘द हिन्दी पदावली ऑफ नामदेव’ ग्रंथ तैयार किया। यह कार्य उन्होंने बेल्जियम में रहते हुए प्रोफेसर विनंड कालावर्त के सहयोग से किया। संस्कृति, नाट्य, संगीत पर उनके अन्य ग्रंथों में ‘संगीत एवं चिंतन’, ‘संगीत और संस्कृति’, ‘ट्रांसफार्मेशन एज क्रिएशन’, ‘गीत-वाद्य-शास्त्र संग्रह’ (प्रेमलता शर्मा के साथ), ‘संवाद’ (दयाकृष्ण के साथ) उल्लेखनीय हैं। लाठ मानते थे, ‘हम अपनी परंपरा में विचार करते हुए भी पाते हैं कि हमारे विचार के अपने अलग प्रश्न, अपनी जिज्ञासा, अपने सरोकार होते हैं, जिनमें रहते हुए ही हम परंपरा में रहते हैं। मैंने परंपरा के भीतर से विचार किया है-पर विचार की प्रक्रिया -स्वरूप से ही आत्मालोचन की भी प्रक्रिया होती है-प्रश्न उठाती है, विवाद करती है, अपना अलग पंथ भी अपनाती है- यह विचार का स्वरूप ही है। परंपरा में रहना केवल पीछे देखना ही नहीं होता, आगे चलते हुए पीछे की सुध लेना होता है, यों पीछे का खंडन, विरोध, ये बढ़त और उपज के ही अंग होते हैं।’ (‘संगीत और संस्कृति’ की भूमिका से) लाठ लंबे समय तक (सन् 1973 से 1997 तक) जयपुर के राजस्थान विश्वविद्यालय में रहे। उन्हें पद्मश्री, शंकर पुरस्कार, नरेश मेहता वांगमय पुरस्कार, संगीत नाट्य अकादेमी के फेलो होने का सम्मान मिला। कवि के रूप में वे संकोची थे और अपनी कविता संग्रह छपवाने से बचते रहे। उनका कविता संग्रह ‘अनरहनी रहने दो’ और ‘अंधेरे के रंग’ बहुत बाद के वर्षों में प्रकाशित हो सके। उनके न रहने पर उनकी कविता की एक पंक्ति याद आ रही है-‘इन्हीं पत्तों में कहीं ढूंढ़ना मत, पंख हूं, आकाश है…’। 

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One Thought to “इन्हीं पत्तों में कहीं ढूंढ़ना मत, पंख हूं, आकाश है…”

  1. राकेश कुमार

    लाठ जैसे विद्वान दुर्लभ हैं

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