स्मृतियों के कई रंग

जयकृष्ण अग्रवाल

कभी कभी बड़े अहम लोग हाशिए पर चले जाते है। ऐसे ही थे लखनऊ कला महाविद्यालय के लीथो प्रोसेस फोटो मेकैनिल विभाग के प्रवक्ता हीरा सिंह बिष्ट। फोटोग्राफिक डार्करूम आदि की सुविधा भी इसी विभाग में उपलब्ध थी। फोटो फिल्म का जमाना था और कैमरे के बाद सारा काम तो डार्करूम में ही होता था। हीरा सिंह जी को सारे कैमिकल्स और उनके प्रयोग के बारे में विस्तृत जानकारी थी। किन्तु वह समय था जब फोटोग्राफी से अधिक लोगों की रुचि कैमरों तक ही सीमित थी। आमतौर से चर्चा का विषय कैमरा आपरेशन से सीधे फिनिस्ड प्रिंट ही का होता था। इस सबके बीच जो सबसे महत्वपूर्ण डार्करूम आपरेशन था उसकी चर्चा करना आवश्यक नहीं समझा जाता था और शायद इसीलिए हीरा सिह बिष्ट हाशिए पर रहे। वास्तव में देखा जाय तो फोटोग्राफी की केमिस्ट्री, जो फिल्म फोटोग्राफी में सबसे अहम थी, वह हीरा सिह बिष्ट ही सिखाते थे। हाल ही में एक शोधकर्ता से बात करते समय लगा कि कितना कुछ हैजो समय के साथ धूमिल पड़ता जा रहा हैआम अवधारणा यह है लखनऊ की फोटोग्राफी का सारा इतिहास एक सीमित काल में सिमटकर रह गया है, किन्तु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है ।

ललित मोहन सेन यू.पी. अमेच्योर फोटोग्राफिक एसोसिएशन के प्रमुख संस्थापक थे। 1932 में स्थापित इस संगठन से लखनऊ फोटोग्राफी में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। सेन लखनऊ के कला महाविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे थे, जो स्थानीय कला गतिविधियों का एक मात्र केन्द्र था और स्वाभाविक रूप से इस एसोसिएशन की गतिविधियों का केन्द्र भी बन गया। स्थानीय फोटोग्राफर्स को कलाकारों के सीधे सम्पर्क में आने से उन्हें फोटोग्राफी के सृजनात्मक पक्ष का परिचय प्राप्त हुआ। देखते-देखते लखनऊ फोटोग्राफी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी। यद्यपि उन दिनों फोटोग्राफी कला महाविद्यालय के पाठ्यक्रम का विषय नहीं थी, फिर भी सेन के प्रयास से सुव्यवस्थित डार्करूम और स्टूडियो की स्थापना की गई, जिससे आकर्षित हो अनेक छात्रों को भी इस विधा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। मैने स्वयं 1957 में आर्किटेक्चर का छात्र होकर लखनऊ के कला महाविद्यालय में प्रवेश लिया। हमारे अध्यापक प्रो.एस.बी.दत्ता, जो स्वयं एक अच्छे फोटोग्राफर थे, उन्होंने हमें भी फोटोग्राफी सीखने के लिए प्रेरित किया। मेरे पास उन दिनों जाइस कॉन्टिना कैमरा थामुझे तुरन्त कालेज की फोटोग्राफिक सोसाइटी की सदस्यता मिल गई। उन्हीं दिनों पी.सी. लिटिल भी कमर्शियल आर्ट के छात्र थे। लिटिल का मकैनिकल माइंड होने के कारण उनकी तकनीकी पकड़ सभी को प्रभावित करती थी। उन्हीं दिनों कालेज में पिलार्डबोलेक्स 16 एम.एम. मूवी कैमरा आया था जो योगी जी के चार्ज में था। एक दिन उसमें कुछ तकनीकी समस्या आ गई जिसे लिटिल ने हाथ लगाते ही दूर कर दिया था। योगी जी फोटो सोसाइटी के अध्यक्ष थे और डी.एन.जोशी छात्र सेक्रेटरी। जोशी एक प्रयोगवादी छायाकार थेउन दिनो बी.जे. एलमिनक आता था जिससे विस्तृत तकनीकी जानकारी तो मिल जाती थी किन्तु संसाधन जुटाने के साथ उनके प्रयोग में अनुभव का बड़ा महत्व होता था।

जोशी जी ने सतत प्रयास से उस समय बड़ी उपलब्धि समझी जाने वाली तकनीकों में चमत्कृत करने वाले प्रयोग किए। उन्होंने टोनल सैपरेशन, बास रिलीफ, सोलराईजेशन, लो की, हाई की आदि के अलावा सीपिया टोन, गोल्ड क्लोराइड टोन और आयरन टोन आदि में निपुणता प्राप्त कर ली थी और सबसे जानकारी साझा भी करते थे। एक तरह से देखा जाय तो लीथो प्रोसेस फोटो मैकेनिकल कोर्स फोटोग्राफी का भी प्रशिक्षण देता था। जोशी जी स्वयं इसी विभाग में छात्र थे। उनके अलावा अनेक छात्रों ने छपाई उद्योग में न जाकर फोटोग्राफी को अपना व्यवसाय बनाया। बड़ा दुख होता है जब देखते हैं कि कितनी आसानी से लखनऊ में ललित मोहन सेन, शिव गोपाल, जे.एन.सिंह, के.सी.सौनरेक्सा, एस.एम.माथुर, के.पी.गुप्ता, चन्दर कुमार, कृष्ण कुमार जैसे अनेक महारथी फोटोग्राफर्स को भुला दिया गया है और हीरा सिंह बिष्ट, जिन्होंने अनगिनत छात्रों को प्रशिक्षित किया, क्या वह कभी डार्करूम के अंधेरे से बाहर आ सकेंगे, क्या उनके योगदान को एक अध्यापक के रूप में कभी याद नहीं किया जा सकेगा?

(विस्तृत आलेख नादरंग-2 में)

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