सरकार का काम है धमकाना, रंगमंच का लड़ना

प्रतुल जोशी से रंगकर्मी रतन थियम

( नादरंग 4 )

(स्थानः कोरस रेपेटरी थिएटर-इम्फाल) 

0 थिएटर के बारे में आपने कहीं कहा था कि मैं अभी भी थिएटर को समझने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ हूं, तो सबसे पहले तो यह बताइए कि थिएटर का आपके लिए क्या अर्थ है?
– मैंने इसलिए कहा था कि मुझे लगता है थिएटर जो है वह एक जगह कभी नहीं रहता है और हमेशा बदलता रहता है और इसकी प्रक्रिया जो है ये हुआ एक सिचुएशन का। लेकिन प्रक्रिया जो है वह ये है कि वह बगैर लैबोरट्री प्रोसेस का या एक्सपेरिमेंटशन का थिएटर हो नहीं सकता। तो थिएटर में फ्रेशनेस लाना बहुत जरूरी होता है। और एक ऐसी कला है थिएटर यह  जो कि कई कला इसमें जुड़े हुए हैं और सिर्फ यही नहीं, ये एक वह माध्यम है जो कि हमेशा खराब चीजों के खिलाफ और खराब सिस्टम के खिलाफ जूझता रहता है और उसके खिलाफ बोलता रहता है। उसके खिलाफ अटैक करता रहता है। ऐसी एक चीज है यह। मिसाल के तौर पर आपने देखा होगा कि ये दो तीन हजार साल की इस यात्रा में थिएटर की-चाहे वह संस्कृत नाटक क्यों न हो, चाहे भास ने लिखा हो या कालिदास ने, हर्ष ने या शूद्रक ने लिखा हो, या ग्रीक्स थिएटर में कहा जाए तो सोफोक्लीज या स्टायलस सारे जो लेखक हैं, प्ले राइटर्स हैं, उन्होंने जो भी लिखा है वह ऐसा लिखा है कि जब जब सिस्टम गलत तरीके से होता है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरूरी है। और आपने देखा होगा आज तक कोई भी ऐसा नाटक नहीं लिखा गया जो खराब सिस्टम के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं। और इसलिए नाटक जो है बहुत ही अलग एक कला का माध्यम हैं और इससे जुड़ीं जितनी भी और कलाएं हैं उसमें बहुत माहिर होना पड़ता है। और अगर एक्सप्रेशन जो हैं उनको सही तौर से परफेक्शन में लाना है तो इस प्रक्रिया में जो लबोरेट्री प्रोसेस भी जरूरी है वह बहुत लम्बा चौड़ा सफर है जिससे मैं गुजर रहा हूं और हमेशा गुजरता हूं और हमेशा सोचता हूं मैं नजदीक आ गया हूं लेकिन मैं उसको छू नहीं सकता और उसको पहचानना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल बात है। इसलिए जब तक मैं नहीं पहचानता तब तक मैं उसको ढूंढता रहता हूं और उसी ढूंढने में लगे हुए हैं। कई साल हमने लगा दिए हैं और ढूंढ़ता रहता हूं। लेकिनअगर एक बार मिल गया तो शायद मेरा नाटक करना ही बन्द हो जाए।
0 रतन जी आपका नाम ‘थिएटर ऑफ द रूट्स’ यानी ‘जड़ो का नाट्यशास्त्र’ से जुड़ा हुआ है। 1976 में जब आपने कोरस रेपेटरी थिएटर की स्थापना की थी तो ये वह दौर था कि उससे पहले हबीब तनवीर साहब ने ‘नया थिएटर’ की स्थापना छत्तीसगढ़ में की थी। 1969 में मणिपुर में इम्फाल के पास कन्हाईलाल जी ने अपना जो कला क्षेत्र थिएटर ग्रुप बनाया, वह दौर जिसमें कि थिएटर एक नए तरीके से रिवाइव हुआ, खासकर देश की जो सांस्कृतिक परम्पराएं हैं उनको जानने समझने की रंगकर्मियों की कोशिश थी, थोडा सा उस दौर के बारे में हमें बताइए।
-देखिए एक दौर ऐसा था, जहां ये जो हम इंडियन इंडिपेंडेन्स के बारे में कहते हैं जो कि हमारी इंडियन इनडिपेंडेन्स के बाद कितने हम इंडिपेंडेंट हुए, खुद को कितना हम फ्रीडम दे पाए मतलब जो मूवमेन्ट है, उस के साथ जुड़ा हुआ है। कितना अपने आपको पाया है, क्या पाया है उसकी जो जिज्ञासा है, एक प्रश्न जो हमेशा रहता है। उसमें सब लोगों ने देखा कि उसकी स्मृति तो रहती है। कोलोनियल पॉवर जो इतने साल हमारे साथ रहे है, तो वेस्टर्न थिएटर जो है वे भी जुड़ गए हैं, उसमें कोलोनियल में। लेकिन हमारी जो परम्परा है, उसको मतलब हम भूल रहे थे और ज्यादातर बाहर के जो भी हमें मिला है उसमे ज्यादा ध्यान देने लगे थे। लेकिन जब हबीब भाई आए, बी0वी0 कारंत आए और बादल सरकार आए। कोई भी मतलब गिरीश कर्नाड से लेकर शम्भू मित्र तक। शम्भू दा से अजितेश बनर्जी से लेकर विजय तेंदुलकर से लेकर आद्या रंगाचार्य से लेकर, सारे जब आए। तो सबने उस कोलोनियल बन्धन से मुक्त होने की कोशिश की। मुक्त होना बहुत जरूरी था और इसलिए पूरा जोर लगाया। मिसाल के तौर पर आप देखिए कि मोहन राकेश ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ लिखा। ये एक ऐसा नाटक है जो देखने में थ्री एक्ट प्ले, जो कि वेस्टर्न ढांचे में लिखा गया। लेकिन उस वेस्टर्न ढांचे में पहली बार दुनिया ने देखा कि इसमें इंडियननेस जो है भरपूर है। अब देखिए एक तो इंडियन नेस की बात है और एक वेस्टर्नाइज स्ट्रक्चर की बात है। तो वेस्टर्नाइज स्ट्रक्चर में इंडियन नेस कैसे आ गई। उसका फल बहुत अच्छी तरह से इंडियन थिएटर को मिला, इंडियन ऑथर्स को मिला और एक ऐसा दौर आया कि सबको पता चल रहा था कि हां अब जो है एक नया दौर है। उसमें हम लोगों ने क्या किया। हम लोगों ने पूरे ट्रेडिशन को फिर से उभार के लाने की कोशिश की और ट्रेडिशन के माध्यम से सबसे कंटम्परेरी आस्पेक्ट है, हमारे लाइफ के हमारे जीवन के। जो भी कंटेम्पररी आस्पेक्ट है उसको अपने ट्रेडिशन के साथ जोड़कर एक सफर, नया सफर, एक नया दौर, एक नया यात्रा शुरू किया और यही मतलब बहुत ही अहम तरीके से लिया जा सकता है।

0 मुझे लगता है काफी मेहनत आपको उस दौर में करनी पड़ी होगी। एक तो पौराणिक जो कथाएं हैं उनका गहन अध्ययन, उसके बाद उनको समकालीन जो जीवन है उसके साथ जोड़ना। आपका एक नाटक ‘उत्तर प्रियदर्शी’ मैंने देखा है। आपके नाटक में जो सिम्बोलिज्म है, वह बड़े स्तर का होता है। जो बात आप कह रहे हैं उसको समझने के लिए भी एक खास दर्शक समूह की जरूरत पड़ती है। तो ये जो सारी जो मेहनत थी और उसके साथ आपने 1976 में इम्फाल के बाहरी क्षेत्र में जो जमीन खरीदी, वह जमीन आपको समतल करनी पड़ी। ये जंगल था और जहाँ तक मेरी जानकारी है यहां पर आपने पपीते के पेड़ उगाए। फिर जो पपीते की फसल हुई उसको मार्केट में बेचा। उससे जो पैसा आया उसको फिर रि इन्वेस्ट करके कोरस रेपर्टरी थिएटर की स्थापना की। एक साथ कई काम आपको करने पड़े।
– कई चीजें की। मतलब जब हम बात करते हैं तो इंडियन थिएटर में पारसी थिएटर का जरूरी एक दौर था क्योंकि वो पारसी थिएटर ने हमे प्रोफेशनल होना सिखाया। प्रोफेशनल कैसे होना है और जिस वजह से ये जो हैं पारसी  थिएटर के जितने भी एक्टर्स थे वो हिंदी फिल्म में बहुत मशहूर हो गए और अच्छे अच्छे कलाकार थे। लिखने वाले भी अच्छे थे। राधेश्याम कथावाचक,  आगा हश्र कश्मीरी और एक्टर में कहा जाए तो पृथ्वी राज कपूर जैसे एक्टर। बहुत सारे एक्टर हैं। तो उसमें क्या हुआ कि हम हमेशा ये चाहते थे कि अमैच्यौर थिएटर जो इंडिया में काम कर रहे थे, उसने बहुत काम किया है। लेकिन प्रोफेशनल कम्पनी बहुत कम हैं। तो हम कैसे प्रोफेशनल कम्पनी स्टैब्लिश कर सकते हैं, इस मामले में मैंने काफी सोचा। फिर मैंने सोचा ठीक है बड़े पैमाने से अगर न हो तो बहुत छोटे पैमाने से हम कर सकते हैं। और इसलिए हमने कई वर्कशॉप किए, कई जगह यहां मणिपुर में गए। मैंने लोगों को कहा, यंगर जेनरेशन को कहा कि मैं ऐसी एक चीज करना चाहता हूं, क्या आप लोग सपोर्ट दे सकते हैं? आप लोग हमे जरा सपोर्ट दीजिए तो इन लोगों ने कहा कि ठीक है, हम लोग आएंगे तो इन्हीं लोगों को लेकर हमने शुरुआत की थी और अच्छा सफर रहा क्योंकि एक डेढ़ साल के अंदर जबसे स्टैब्लिश हुई, हम नेशनल लेवल पर प्ले करने लगे। अमूमन एक ग्रुप को नेशनल लेवल पर आने के लिए बहुत लम्बा सफर करना पड़ता है लेकिन हमें उतना वक्त नहीं लगा, हम कर पाए। लेकिन थिएटर की जो स्थिति है, नाटक की जो स्थिति है और थिएटर की इकोनॉमिक्स जिसको कहते हैं आज तक उसमें बदलाव नहीं आया है । यही एक बहुत बड़ी दिक्कत सामने आती हैं और आ रही है। और आज भी इसी दिक्कत को लेकर हम जी रहे हैं। और इसका सामना करना बहुत ही मुश्किल बात है। नाटक करते हुए अपना जीवन जी लेना। एक यह हो सकता है कि एक ऑफिस में काम करते हुए चाहे बैंक में हो, रेलवे में हो, प्रोफेसरी करते हुए काम करते हुए एक छोटा सा ग्रुप है। अमैच्यौर ग्रुप बना कर उसी में काम करके अपना प्रदर्शन करना वह अलग बात है । लेकिन एक प्रोफेशनल कम्पनी जहां सैलरी इनवॉल्व होता है, जहां के लोगों का देखभाल करना पड़ता है, उनकी फैमिली की देखभाल करना पड़ता है और इसके मेटेनेंस, ऑफिस का मेटेनेंस, काम्प्लेक्स का मेंटेनेंस इन सारी चीजों को लेकर बहुत ही दिक्कत का सामना करना पड़ता है।
खैर फिर भी चला रहे हैं क्योंकि किसी ने ये नहीं कहा था कि रतन थियम तुम थिएटर करो। मैंने ही चुना था इसको तो इसको कैसे छोड़ूं?
0 रतन जी आपकी जो यात्रा है कहा जाए तो बहुत सी सफलताओं से भरी हुई है, बहुत से अचीवमेंट्स हैं आपके नाम पर। मैं एक दुसरे क्षेत्र में जाना चाहूंगा। आपके नाटक में मणिपुर की जो परम्पराएं हैं, यहां का जो नृत्य है, यहां का जो संगीत है, यहां का जो मार्शल आर्ट है यह बहुत बड़े पैमाने पर दिखता है। और कई बार आपने अपने विभिन्न साक्षात्कारों में यह कहा भी है कि हमे अपनी परम्परा पर गर्व करना चाहिए, उसे सीखना चाहिए और उसको सामने लाना चाहिए। मणिपुर की जो सांस्कृतिक परम्पराएं हैं, उनके बारे में कुछ बताइए। 

– देखिए, बगैर परम्परा एक कलाकार की जो अवस्था है,वह शून्य है। जैसे कि मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) से जब हम लौटे यहां तो हमें तो बहुत सारी चीजे वहां से मिलीं और मैं लेकर आया हूं अपने दिमाग में। कई चीजों को मैं जानता हूं और टेक्नीक जानता हूँ जितनी भी नाटक की हैं। और उन दिनों इतने अच्छे प्रोफेसर्स के साथ हम रहे हैं। उन्होंने पढ़ाया है तो जाहिर है बहुत ही क्वालिफाइड आदमी के हिसाब से मैंने अपने आप को पाया। और मैं लौटा। लेकिन यहां पहुंचते ही मुझे लगने लगा कि मैं अपने परम्परा को तो नहीं जानता अच्छी तरह से। और मैं कैसे मतलब किसके लिए मैं काम कर रहा हूं ? अगर अपने परम्परा को नहीं जानते हुए काम करें तो मेरे नाटक जो हैं उसको लेने वाले कोई नहीं होगा। इसीलिए हमने बहुत कोशिश की और जब चार पांच साल कई गुरुओं के चरणों में रह कर काम किया। उनके साथ दिन रात काम किया, परम्परा को जानने के लिए। वैसे मणिपुर बहुत ही जबरदस्त कला के लिए जगह है। क्योंकि यहां कम से कम चालीस से ज्यादा हमारे कम्युनिटीज हैं। ट्राइबल कम्युनिटीज भी हैं। और हमारी मैतेयी कम्युनिटी हैं। तो बहुत सारी चीजें, इतनी सारी धर्म की इतनी परम्पराएं। हमारे मैतेय धर्म जो हैं उसका मतलब कितना ज्ञान, कितने फिलोसॉफी, कितने एस्थेटिक्स, उस धर्म के कितने परफार्मिंग आर्ट ट्रेडिशन है। और दूसरी चीज जब यहां वैष्णव आए तो वैष्णव धर्म को कितनी तरह से उसको लिया गया है। और उसकी परम्परा कैसे हैं। मणिपुरी कैसे बन गए वैष्णव। इतनी जो परम्परा यहां आ गए हैं एकदम से। और बहुत पुराने परम्परा से जुड़ गए हैं।  जिन्दगी में हम एक ही चीज चाहते थे कि हम कलाकार हैं तो ट्रेडिशन के साथ हम रहे। परम्परा के साथ रहें, जुड़ते रहें । और इंडियन थिएटर को अगर एनरिच करना है, ज्यादा इसको रईस बनाना है और भी ज्यादा इसको डेवलप अगर करना है तो रीजनल थिएटर बेस्ड होना चाहिए। मतलब यहां इंडियन थिएटर का कोई नेशनल थिएटर बन नहीं सकता, इतने लैंग्वेज को लेकर। तो रीजनल थिएटर जब जब जहां जहां सशक्त हआ, बहुत ही ज्यादा अच्छा हुआ तो वह नेशनल थिएटर बन गया। चाहे वह कर्नाटक से आए हों, केरल से आए हों, चाहे मध्य प्रदेश से आए हों, चाहे राजस्थान से आए हों, चाहे यूपी से आए हों। कहीं से भी अगर आते हैं , अगर कोई स्ट्रांग क्वालिटी लेकर आते हैं तो वह मेनस्ट्रीम का, नेशनल थिएटर का एक झण्डा वहां फहराते हैं। तो हमने भी यही सोचा कि रीजनल थिएटर को मोर स्ट्रांग करो, और भी सशक्त करो। तो मैं उसमें एक छोटा सा हिस्सा लूंगा। मेरे जैसा एक आदमी कितना कर सकता है। जो भी सोच है हमारी किस तरह से उसको उजागर करना चाहिए। यह सोचते सोचते परम्परा के बारे में स्टडी करनी पड़ी, अपने थिएटर के साथ। लेकिन हां ये परम्परा को जोड़ने में बहुत रिसर्च वर्क की जरूरत थी। क्योंकि परम्परा जो है वह मेरे नाटक के लिए तो नहीं बना है न। तो वह क्या डिमांड है उस थिमेटिक कांटेंट का, प्ले की क्या डिमांड है? उसके मुताबिक हम क्या ढूंढे़ंगे। उसका बहुत बड़ा रिसर्च ट्रेडिशन के साथ करना पड़ा और बहुत साल लग गए। मैं करता रहा हूं, अभी भी उसके साथ जुड़ा हुआ हूं।

0 ‘मैकबेथ’ के बारे में कुछ बताएं हमें।
– मैकबेथ मेरे लिए एक आदमी का नाम नहीं है, इंसान का नाम नहीं है। मैकबेथ मेरे लिए एक रोग, एक बीमारी का नाम है। इस तरह से मैंने इन्टरप्रेट किया है । क्योंकि नया जमाना जिसे आप ‘द सो कॉल्ड कंप्यूटर एज’ कहते हैं, नए जमाने में जिस तरह से लोगों की सोच अब उभर के आ रही है, उसको देखते हुए हमें यह लगता है कि इंसान इस तरह से बनेगा यह हमने कभी नहीं सोचा था। क्योंकि हमारी परम्परा, हमारे इतिहास, हमारी सभ्यता, हमारा जो दर्शन है जितने भी हैं जो भी हैं, धर्म से लेकर, हमारी संस्कृति इसका बहुत बड़ा देन है हमारे मुल्क में। लेकिन यह इतना बदल गया है कि हमारे सामने बहुत धुंधला धुंधला  सा दिखाई देता है। कई चीजे जो कि बिछड़ गए हैं और अब जो आगे हम देखते है,उसमें एक चीज सामने आता है वह है अनलिमिटेड ह्यूमन डिजायर। मतलब अब खुश नहीं हैं। और चाहते हैं।  ये चाहना जो है इतना बढ़ गया, इतना बढ़ गया है कि आपके पास एक कार है तो आपको एक कार और चाहिए। एक फ्रिज है तो एक और चाहिए। पूरी दुनिया आपने उलट पुलट के रख दिया है। और दिमाग में यही सोचते रहते हैं कि हम सिर्फ कम्फर्ट के लिए जी रहे हैं, बहुत कम्फर्ट चाहिए आपको। इतना कम्फर्ट चाहिए  एयर कंडिशंड रूम, एयर कंडिशंड कार, एयर कंडिशंड यह – एयर कंडिशंड वह। और बैठे रहेंगे कंप्यूटर में आप और सौ आदमी का काम आप अकेला कर लेंगे । लेकिन ये हमें सोचना पड़ेगा कि एक एक चीज को जिन्दगी में लाने के लिए हमें बहुत मेहनत करना पड़ता है। और वह चीज अगर हम विदाउट करप्शन हम लाना चाहते हैं तो ये तो गालिब साहब ने भी लिखा है ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी कम निकले’। लेकिन यह जो अनलिमिटेड डिजायर है, यह रोग जैसा है इसने डिजीजनुमा हमारे मन को पॉल्यूट कर दिया है और यह मैं कह रहा था लोगों से कि भई आपने क्या लाया ह्यूमन रिलेशन। एक इंसान से एक इंसान के जो सम्बन्ध हमने बना रखे थे वह सम्बन्ध कहीं न कहीं लड़खड़ा गए और टूटने लगे। और वह सम्बन्ध नहीं के बराबर अगर हो तो क्या इंसान अकेला जीना पसन्द करता। आज इंसान इतना अकेला जीना पसन्द करता है कि इतने ओल्ड एज होम बना दिए और अगर विकास का मुद्दा उठाते हैं पॉलिटिकल पार्टीज तो विकास हमने ओल्ड एज होम बनाने में किया है। कि आपके पेरेंट्स को वहां डाल दो। सिर्फ अपनी सम्पत्ति, सिर्फ अपने पैसे, सिर्फ अपने स्टेट्स सिम्बल में  आप रह गए हैं। क्या आप सबसे मुक्त होना चाहते हैं । थोडा सी भी मानवता के लिए नहीं करना चाहते। प्यार मोहब्बत सब बदलते नजर आते हैं तो ‘बदले बदले मेरे सरकार नजर आते हैं’। 

0 रतन जी, मेरा अंतिम प्रश्न, जो मुझे परेशान करता रहा है क्योंकि साढ़े छह साल उत्तर पूर्वी भारत में रहा हूं। वह यह है कि नाटक की जो विधा है, उसमें मणिपुर का काफी नाम है कला के क्षेत्र में। इसी तरह असम में नाटक तो गांव गांव में पहुंचा हुआ है। लेकिन इसी के बरअक्स जो दूसरे प्रदेश हैं जैसे – मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश यहां तक कि मेघालय जहां सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और जहां पर एक जमाने में इंग्लिश थिएटर काफी समृद्ध था, वहां भी अब नाटक यदा कदा ही होते हैं। तो क्या लगता है आपको कि उत्तर पूर्व के यह जो पांच राज्य हैं एक्सेप्ट मणिपुर, असम और कुछ हद तक त्रिपुरा भी, तो यहां नाटक का विकास क्यों हुआ नहीं? एक ही क्षेत्र में एक जगह नाटक एकदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच जाता है और दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश का तो मुझको मालूम है कि वहां नाटक जैसी कोई चीज ही नहीं है। आपके अनुसार यहां पर क्या सम्भावनाएं हैं?
– आपके सवाल बिलकुल जायज हैं और आप जो भी कह रहे हैं सच है। वह इसलिए है क्योंकि ज्यादातर नाटक जहां सक्रिय हैं वह इसलिए सक्रिय हैं कुछ हद तक, कुछ टाउनशिप में कि वहां आइडिया,  विकास पहुंचा है।  सक्रिय नहीं हैं जहां आइडिया ऑफ विकास नहीं पहुचा है। और एक पहलू जो है, वह है प्रोफेशनल ओरिएंटेशन  नाटक करके क्या मिलेगा? नाटक क्या एक प्रोफेशन है? आपने अगर देखा होगा तो बहुत कम लोग नाटक के बारे में अच्छे से सोचते हैं मतलब एज अ प्रोफेशन । एज अ प्रोफेशन नाटक में तो कुछ नहीं है तो उनका लाइफस्टाइल में, जो भी आर्थिक अनुभव और आर्थिक विकास हो रहा है उसमें नाटक को जोड़ना मुश्किल हो जाता है। परंपराएं उनके पास भी हैं। असम, त्रिपुरा और मणिपुर में सरकार जागरुक है, उन्हें पता है कि हमारे पास परंपराएं हैं। अगर आपको थियेटर डवलप ही करना है तो सारे मुल्क के सिलेबस में लाना पड़ेगा । देखिए एक एजुकेशन जो है न उसमें कल्चर कभी आया नहीं हमारे मुल्क में। जब तक नहीं आएगा तब तक कुछ नहीं होने वाला है। क्योंकि हर माता-पिता यह चाहते हैं कि उनका बच्चा डॉक्टर बन जाए, इंजीनियर बन जाएं। अगर आईएएस ऑफिसर बन जाए तो बहुत अच्छा। नाटक वाला बन कर वह क्या करेगा। यही सोचते होंगे। और यह सही भी है। यह दुनिया जो है पैसे से चलती है। लेकिन जो भी कलाकार होता है वह तो अपनी पूरी जिन्दगी इसमें लगा देते हैं और हमेशा समाज के लिए कंट्रीब्यूट करते हैं । ये वाला हिस्सा आर्ट के लिए ही रह गया है, समाज में कॉन्ट्रिब्यूशन करो। पैसे कमाओ वाली बात जो है वह अलग है। यह जो कंट्रीब्यूट करना, ह्यूमन सोसाइटी के लिए इसमें आर्ट सबसे पहले आता है और उसके दिमाग को बढ़ाना। ब्यूटी, ट्रूथ्स क्या है, समझाने की कोशिश करना। ये सब जब एजुकेशन में लाएंगे, सिलेबस में स्कूल में पढ़ाएंगे, तभी लोग उसको लेंगे सीरियसली। लेकिन हमारी सरकार जो है, कोई भी सरकार हो, उसका बहुत बड़ा योगदान यही रहा है पूरे मुल्क में कि आर्ट और कल्चर का फेलियर। उसकी ऑटोनॉमी जो हैं उसको छीनना।  जितने भी नेशनल इंस्टिट्यूशन बने, उसकी ऑटोनॉमी को छीन लो। और इसको गवर्मेंट का अंग बनाओ। और इन लोगों को धमकाओे। ये कोई आर्टिस्ट वर्टिस्ट नहीं हैं।  
( लेखन सहयोग-पूजा श्रीवास्तव )


(पूरी बातचीत नादरंग-4 में)

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