समकालीन कला की अवधारणा

रेखा के. राणा

किसी भी रचना में समय अनिवार्य तत्व है। रचना के विषय प्रथमतः समय के झरोखे से होकर आते हैं। वस्तुतः विषय तो हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, उन्हें ग्रहण करने में रचनाकार की संवेदनशीलता विशेष रूप से माध्यम के रूप में काम करती है। कला के सभी रूप अपने परिवेश के साथ लगातार टकराव से उपजते हैं किन्तु भारतीय संदर्भ में शाश्वत और चिरंतन मूल्यों की अजस्र धारा संवेदना की अभिव्यक्तियों को इस प्रकार प्रभावित करती रही कि कला के यथार्थ रूप या तो सामने आए ही नहीं या आए भी तो विशेष रंग-रूप में ढलकर। ये बताने की आवश्यकता नहीं कि एशिया और विशेष रूप से चीन तथा भारत जैसे देशों की सृजन परम्परा में अध्यात्म का सबसे अधिक दखल रहा है। अध्यात्म यहां के जीवन-दर्शन और व्यावहारिक प्रणालियों में इस तरह बसा रहा कि कला के अन्य प्रयोजन कभी अभीष्ट रूप में आगे नहीं आ सके। इसे एक प्रकार से दृष्टि का संकोच या आत्मविडम्बना कह सकते हैं, जिन आंखों से देखने की बात की जाती है उन्हीं आंखों के कारण दृश्य अपने यथार्थ रूप में नहीं आ पाते। यह कहना असंगत हो सकता है कि वैज्ञानिक या भौतिकवादी अवधारणा का कला के क्षेत्र में प्रवेश अध्यात्मवाद की संकीर्णता की वजह से आया। पूरे विश्व पटल पर उभरे रहे सामाजिक, आर्थिक दबावों के फलस्वरूप वैज्ञानिक पद्धति का प्रवेश जीवन के हरक्षेत्र में लाजिमी था। ऐसा नहीं कि यथार्थवादी या वस्तुवादी दृष्टिकोण इसके पहले एशिया या यूरोप के देशों के कला रूपों में नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि बाहरी दुनिया में हो रही लगातार पराजयों के कारण मनुष्य का आत्ममुखी होना स्वाभाविक है और यह बहुत रूपों एक में रुढ़ि बनकर रह जाता है, जहां तर्क और बुद्धि का योगदान एक सीमित स्तर पर ही मिलता है। औद्योगिक प्रगति का सबसे बड़ा लाभ विचारों, उसकी प्रणालियों, रचना और उसके विविध रूपों में परिलक्षित हुआ। कलाकार अपनी रचना पर सवाल उठाने लगा और अभिव्यक्ति के क्षेत्र को बौद्धिक विचार-विमर्श के लिए स्वतंत्र कर दिया गया। सबसे पहली लड़ाई रूढ़ियों और परम्पराओं से होनी थी क्योंकि उसकी मान्यताएं एक लम्बे समय से समाज में स्वीकृति पा चुकी होती हैं। इस उखाड़-पछाड़ और संघर्ष में कितनी जिन्दगियों को तबाह होना पड़ा और राजसत्ता से लेकर धर्मगुरुओं का कोपभाजन बनना पड़ा, लेकिन इस ताजी हवा के झोंके ने कला के फेफड़ों में वह ऑक्सीजन दी जिसकी दरकार कला को कला बने रहने के लिए अज्ञात समय से थी। जीवन मूल्यों में परिवर्तन और वैज्ञानिक कसौटी पर प्रचलित धारणाओं के चढ़ने से अपने परिवेश के साथ ईमानदार अभिव्यक्ति-सृजन का स्पेस तैयार होने लगामोटे तौर पर साहित्य और कला में हम इसे आधुनिकता की व्यंजना से पहचानते हैं। यहीं पर कला को आत्मप्रक्षेप और वस्तुगत सृजन से अलगाना मुमकिन हो सका। ये कहना अनुचित होगा कि जो कलाकार अपने विगत से जुड़कर रचनाएं करते हैं उन्हें यथार्थपरकता की दृष्टि से ओछा आंका जाएगा। कोई भी सभ्यता अपने बीते हुए समय या अपनी जड़ों से अलग होकर अपनी पहचान नहीं बना सकती। ये भी कहना गलत होगा कि अतीत का सब कुछ कूड़ा है, जो वर्तमान के संदर्भ में अनुपयोगी हो चुका हैमनुष्य के मनुष्य होने का संघर्ष कुछ सौ वर्ष पुराना तो नहीं है। हर युग का कलाकार अपने समय की प्रवृत्तियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। संघर्ष के रास्ते में वह फिर-फिर नया बनकर उभरता रहा और इस ऐतिहासिक पूंजी को एक तरफ मानसिक स्तर पर तो दूसरी ओर काल अभिलेखों में संजोता गया। इसीलिए कोई भी दृश्य अथवा घटना कलाकार को एकल आयामी होकर ही खोजती नहीं बल्कि संश्लिष्ट रूप में सामने उपस्थित होती है। घटनाओं और परिस्थितियों के संपर्क सूत्रों को देखने के बाद ही निर्धारित किया जा सकता है कि कितना प्रभाव किसका रहा होगा। इसीलिए कोई भी रचना न तो शत-प्रतिशत यथार्थ हो सकती है और न ही शत-प्रतिशत आत्मगत या विषयनिष्ठ। लेकिन वैज्ञानिकता, दूसरे शब्दों में आधुनिकता का ऐसा दावा है कि वह अधिक वस्तुनिष्ठ होकर सोच सकती है। परन्तु चूंकि अतीत, वर्तमान, यथार्थ और स्वप्न, मनोविज्ञान और भौतिक विज्ञान का संघर्ष सदैव एक संभावना के रूप में प्रकट होता है, उत्तरोत्तर विकास की संभावना बनी रहती है। संभवतः इसीलिए कला कभी स्थिर बिन्दुओं के रूप में अभिव्यक्त नहीं की जा सकती उसे एक धारा के प्रतीक रूप में समझना अधिक प्रासंगिक है। किसी भी कला की सफलता के प्रतिमान मुक्ति के साथ जुड़े रहते हैं। अंततः समय पर वही रचना अपनी उपस्थिति को दर्ज करा पाती है जो अधिक मुक्तिकामी होती है तथा उसके संघर्ष की स्पष्ट गूंज सुनी जा सकती है।

(विस्तृत लेख नादरंग-2 में )

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