विरासत के विनाश की बेचैनी में काम्बोज की कला


मंजुला चतुर्वेदी

 

पर्यावरण विमर्श के सन्दर्भ में कलाजगत में भगवती प्रकाश काम्बोज एक सशक्त और प्रासंगिक हस्ताक्षर हैं। उनकी कृतियों में पर्यावरण, जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों के सुन्दर समन्वय, उसकी आवश्यकता और निरन्तरता को रूपायित करने का प्रयास स्पष्ट है। काम्बोज अपने चित्रों के माध्यम से जनमानस को सचेत करने का प्रयास करते हैं कि यदि प्रकृति संपुष्ट नहीं है तो जीवन का अस्तित्व भी गहन संकट से घिर जाएगा। कहीं मानव जीवन विकास की दौड़ में कागजी दस्तावेज बनकर न रह जाए, ये एक चेतावनी भी उनके चित्र देते हैं। काम्बोज के चित्रफलक का क्षेत्र मध्यम आकार के कैनवास हैं लेकिन थीमेटिक स्पेस पर्यावरण और सामाजिक चुनौतियों को विशद परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। हम आज पर्यावरण संकट से ग्रस्त हैं। अतः ऐसे समय में काम्बोज के चित्र अत्यधिक प्रासंगिक लगते हैं जो मानस को सौंदर्य बोध के साथ समस्या के प्रति संवेदी बनाते हैं।    
     काम्बोज के प्रसिद्ध चित्रों में नाइट ड्राइव, पोट्रेट्स, डाउन ट्रोडिन एण्ड वी, कृष्णा लुकिंग फाॅर यमुना तथा विशेषरूप से नेचर स्केप्स की श्रृंखलाएं हैं। उनका प्रकृति से जुड़ाव तथा आत्मीयता सभी चित्रों से स्पष्ट है। गढ़वाल क्षेत्र से सम्बद्ध होनें के कारण उनके चित्रों में पहाड़ो, नदियों, वृक्षों का चित्रण बहुत नैसर्गिक रूप में दृष्टव्य है जो हमें अनंत विस्तार में ले जाता है और हम निश्चित तौर पर एक सुखद अनुभूति करते हैं। रंग वैविध्य उन्हें पहाड़ों से मिले जिसकी प्रतिध्वनि उनके चित्रों में देखी जा सकती है। चित्रों में रंगों की आभा भयावह स्थिति को अंकित करते हुए भी अपने मृदुल और सौम्य वर्ण को तिरोहित नहीं होने देती। रंगो की चमक और लय दर्शक को बांधे रखती है। वे समकालीन चिन्ताओं और चुनौतियों को भारतीय मिथकों एवं रूपकों के द्वारा प्रस्तुत करते हैं जो सांस्कृतिक परिवेश में जनजीवन के अधिक निकट होते हैं। यही सूत्र कला को सामाजिक जीवन के सरोकारों से जोड़ता है और कलाकार के अस्तित्व को विराटता प्रदान करता है। कला की सार्थकता भी इसी में निहित है जहां व्यक्ति का व्यक्तित्व व्यष्टि के लिए न होकर समष्टि की चिन्ता करे और अपने क्षुद्र स्वार्थो की बाती जलाकर विराट दीए की भांति जले।
       काम्बोज के चित्रों में परम्परागत और अकादमिक दक्षता के साथ-साथ आधुनिकता का समावेश परिलक्षित होता है। एक ओर राजस्थानी तथा पहाड़ी लघुचित्र शैलियों का प्रभाव, अभिकल्पन वैविध्य, अलंकारिकता तथा दूसरी ओर आधुनिक संयोेजन दृष्टि तथा समकालीन विषय वस्तु एवं प्रत्यय बोध उनके चिंतन के क्रमिक विकास तथा समावेशी उदात्त व्यक्तित्व को प्रस्तुत करते हैं। यहां चित्रों में नदियों के सूखने व उनके दूर होने की चिन्ता दृष्टव्य है। ‘कृष्णा लुकिंग फाॅर यमुना’ चित्र इसका प्रमुख उदाहरण है जहां मध्यभूमि में कृष्ण पीली-भूरी सपाट भूमि में एकटक यमुना को देख रहे हैं और यमुना अग्रभूमि में कैनवास के कोने में  दूर जाती हुई अंकित है। कृष्ण की व्याकुलता मनोवेगों का संस्पर्श करती है। पार्श्व में शुष्क वृक्ष है, जो जीवनवृक्ष का प्रतीक है, पहाड़ियां भी एकाकी निर्जन सी। इसी श्रृंखला के एक अन्य चित्र में कृष्ण बांसुरी बजाते हुए यमुना का आह्वान कर रहे हैं और दूर से आती यमुना की नारी आकृति अल्प जल धाराओं और प्रस्तरों के मध्य अंकित है जो भविष्य के प्रति आगाह करती है। यहां दूर-दूर तक हरियाली नहीं हैं। हरियाली जो जीवन का सावन है, गीत है, मल्हार है और सर्वोपरि एक समृद्ध जीवन दृष्टि है। ये चित्र विरासत की समाप्ति से होने वाली बेचैनी की ओर संकेत करते हैं और प्रश्नाकुलता देते हैं।
       नेचर स्केप श्रृंखला के माध्यम से भौतिक सुविधाओं हेतु वनों के कटने और हरियाली के समाप्त होने से उत्पन्न समस्या की ओर कलाकार संकेत करता है। इन चित्रों में पहाड़ों में व्याप्त सन्नाटे को दर्शाते हुए वृक्षों के कटे हुए तनों को कहीं अग्रभूमि में, कहीं केन्द्र में संयोजित किया है। कटे हुए तनों पर विशेष दृष्टिपात के लिए उनके चारो ओर लाल नीली रेखाओं से वर्ग निर्मित कर चित्रित किया गया है। टेक्सचर का प्रयोग उत्कृष्ट है। कुछ चित्रों में तनों को जड़ से पृथक चित्रित किया है जहां मूल से कटने की करूण रागिनी की गूंज व्याप्त है। उनके चित्र वृक्षों के कटने से धसकती हुई जमीन तथा जल संकट को दर्शाते हुए उसके संरक्षण की आवाज उठाते हैं। प्रकृति प्रेमी काम्बोज ने प्राकृतिक नैसर्गिकता का चित्रण पूर्ण मनोयोग से किया है और कल्पना के वैविध्य से पहाड़ों में मोजाइक की भांति रंग जड़े हैं। इनके दृश्य चित्र जो संयोजनों का हिस्सा हैं, प्रकृति की विराटता, वैविध्य, नैसर्गिकता तथा कलाकार का प्रकृति से जुड़ाव, सूक्ष्म दृष्टि तथा मन की उदात्तता को रेखांकित करते हैं।


        चित्रों में प्रफुल्लता, ओज और प्रतीकात्मकता विन्यस्त हैं, जो दर्शक मन की सूक्ष्म तहों को स्पंदित करती है। नीले, भूरे, नारंगी, हरित तथा पीत वर्ण विषय वस्तु के अनुरूप प्रयुक्त हैं। संयोजन के अनुरूप कही सपाट सतह है, कहीं रेखाएं कलाकार की मानस गति प्रतिबिम्बित करती हैं। दृश्य चित्रों में अन्तराल का प्रयोग और विविध रंगों की तानें ध्यान आकृष्ट करती हैं। चित्रों में वेदना को कलात्मकता और लयात्मकता के साथ काव्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘डाउन ट्रोडिन एण्ड वी’ चित्र में गरीब बच्चों के चेहरों को कागजी छत के नीचे चित्रित कर भय एवं अदेखे भविष्य को चित्रित किया गया है। उन्होंने समकालीन कला के सामाजिक सरोकारों को विभिन्न आयामों में चित्रित करते हुए उत्कृष्ट रचनाएं की। कलाकार की संवेदी दृष्टि ने सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण के महत्व को महसूस करते हुए समष्टि हित में उसकी रक्षा का आह्वान किया।
  भगवती प्रकाश काम्बोज का जन्म 15 अगस्त 1928 को हुआ था। उनका देहावसान 11 अक्टूबर 2018 को 90 वर्ष पूर्ण करने के पश्चात देहरादून में हुआ और वे अन्तिम समय तक कलाजगत में सक्रिय रहे। वे आधुनिक कला वीथिका (नई दिल्ली) की सलाहकार समिति के सदस्य थे। उन्होंने राष्ट्रीय ललित कला अकादमी के सचिव के रूप में 1989 से 1994 तक अपनी विशिष्ट सेवाएं प्रदान की। 1964 से 1989 तक आगरा विश्वविद्यालय, आगरा कालेज में शिक्षक, विभागाध्यक्ष, संकायाध्यक्ष जैसे पदों के दायित्व का निर्वहन किया तथा एक चित्रकार, कला शिक्षक एवं प्रशासक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान अर्जित की। कला शिक्षा के क्षेत्र में कई पुस्तकों का लेखन भी किया। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय कला परिदृश्य को विभिन्न कलात्मक गतिविधियों के माध्यम से एक नई ऊर्जा प्रदान की। कहना गलत न होगा कि काम्बोज के चित्र कला जगत को अपने सौन्दर्यबोध तथा चिंतन से नवदृष्टि देते हुए परम्परा और पौराणिक मिथकों को भी रचते हैं तथा उनकी निरन्तरता का भी संदेश देते हैं। कलाकार की निजता उसकी बेचैनी में होती है और सृजन उसकी बेचैनी के विस्तार का कुल परिणाम है। कलाकार की चिंता प्रकृति के संरक्षण की है और जीवन की सम्पूर्णता प्रकृति के सहअस्तित्व में। काम्बोज के चित्र सांस्कृतिक विरासत के रूप में अविस्मरणीय रहेंगे।

(नादरंग-4)

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