मुख्यधारा के रंगमंच का असली चेहरा

राजेश कुमार

रंगमंच के विभिन्न प्रकारों की चर्चा होती है तो संस्कृत रंगमंच, ग्रीक रंगमंच, पाश्चात्य रंगमंच, पारसी रंगमंच, मनोशारीरिक रंगमंच, यथार्थवादी रंगमंच, तीसरा रंगमंच जैसे  नाम तत्काल स्मरण में आते हैं। लेकिन इनदिनों रंगमंच के गलियारों से एक नया नाम दबे – फुसफुसे रूप में सुनने को मिल रहा है जो न रंगमंच के किसी ग्रंथों, किताबों के पन्नों में दिखाई देता है, न रंग आलोचना – समालोचना के किसी कोने या सरकारी नाट्य संस्थानों के किसी गलियारे – चबूतरों के इर्द – गिर्द। संभव है कि आप इस रंगमंच से इतेफाक न रखे। लेकिन यह जो रंगमंच है, उसका अपना एक तर्क, आधार है। और वह टिका है मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक धरातल पर।

इस रंगमंच का नाम ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ है। राजनीतिक हलकों में यह नया शब्द नहीं है। न अचानक कहीं से टपक पड़ा है। साहित्य के क्षेत्र में तो कई वर्षों से प्रचलन में है। अलबत्ता नाटक के लोगों के लिए नया, ताजा शब्द जरूर  है। रंगजगत में अभी ज्यादा इस्तेमाल नहीं हुआ है इसलिए हो सकता है कि किसी – किसी को यह शब्द चावल में कंकड़ की तरह किरकिरा भी लगे। ऐसा ही कुछ सीन तब  क्रिएट हुआ था जब रंगमंच में दलित नाटक की अवधारणा ने प्रवेश किया था। किसी ने प्रेम से गले नहीं लगाया। अपवाद को छोड़ दे तो महानगरों, बड़े शहरों, यहां तक कि छोटे शहरों के रंगमंच से कोई पॉजिटिव रिएक्शन नहीं आया। ब्राह्मणवादी रंगमंच दलित रंगमंच का विपरीतार्थक शब्द नहीं है। लेकिन अनुमान है कि इस शब्द के प्रति भी उतनी ही आपत्ति उठेगी जितना पूर्व में दलित रंगमंच के लिए उठी थी। विरोध करने वाले कतई सहमत नहीं होंगे कि उनके रंगमंच को कोई ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ का नाम दे। हो सकता है किसी को ये आपत्ति हो कि इस तरह के शब्द का प्रयोग एक खास जाति को बदनाम करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। रंगमंच को अगर इस तरह जाति के स्तर पर विभाजन किया जाने लगा तो रंगमंच की स्थिति तो राजनीति से भी बदतर हो जाएगी। राजनीति की तरह रंगमंच भी साम्प्रदायिक दंगे कराने लगेगी और किसी पर राष्ट्रवाद का जरा सा भी भूत सवार हुआ तो इस शब्द का उच्चारण करने वाले पर राष्ट्रद्रोही का आरोप लगाने में देर नहीं लगाएगी। कुछ वर्ष पहले जब दलित रंगमंच का नाम उभरा था तो मजाक में रंगकर्मियों का एक बड़ा दायरा जुमले फेंका करता था कि आज दलित रंगमंच आ गया है तो कल सवर्ण रंगमंच आ जाएगा। फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ रंगमंच इत्यादि – इत्यादि। इन  जातियों का रंगमंच तो नहीं आया, अलबत्ता ब्राह्मणवादी रंगमंच जरूर आ गया। आना क्या था, वह तो पहले से ही मौजूद था। केवल उसकी पहचान करनी थी। ब्राह्मणवादी रंगमंच आज से ही नहीं, बहुत पहले से हमारे भारतीय रंगमंच पर कंबल ओढ़कर बैठा हुआ था। पहले उसकी शिनाख्त नहीं हुई थी, अब प्वाइंट आउट कर लिया गया है। पहले तो कुछ दबी – छिपी आवाज में बोला भी जाता था, अब तो डंके की आवाज पर कहा जा रहा है।

अस्मिता थिएटर ग्रुप के निर्देशक अरविंद गौड़ ने तो ‘समकालीन रंगमंच’ के जनवरी – जून 2016 अंक में ‘ब्राह्मणवाद शब्द’ का इस्तेमाल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के खिलाफ जमकर किया। जवाब में अभी तक किसी का लिखित प्रतिरोध देखने को नहीं मिला, न आधिकारिक रूप से एनएसडी की कोई प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली। पर मंडी हाउस से लेकर भारत भवन और पृथ्वी थिएटर तक चाय – कॉफी की चुस्की के साथ कुछ भभका जरूर उठा कि कुछ लोग भारतीय रंगमंच का सत्यानाश करने पर तुले हैं। उनका दिमाग ठिकाने पर नहीं है, इसलिए इस तरह की ऊलजलूल सांस्कृतिक हरकत करते रहते हैं। इनकी मानसिकता भारतीय रंगमंच को जातियों  में विभाजित करने की है। दरअसल ये लोग दुश्मनों की  ‘बांटों और राज करो’ की नीति का हिस्सा हैं।उक्त लेख में अरविंद गौड़ कहते हैं, ‘जैसे एक जमाने में कहा जाता था कि आप आर्यन रक्त हैं, शुद्ध रक्त वाले हैं और बाकी यहूदी और आप राज करने के लिए निकल पड़ते हैं। इसी तरह की विशिष्टता अब नाट्य संस्थानों और सरकारी अकादमियों से जुड़े रंगकर्मियों के अंदर घर कर गई है। उनको लगता है कि हम जो कर रहे हैं वहीं श्रेष्ठ है, वही मानक है। हम जो बोल रहे हैं वही सच है। ब्राह्मणवाद के इसी गढ़ को बचाए रखने के लिए विगत 60 सालों में हिदुस्तान में और प्रशिक्षण संस्थान खुलने नहीं दिए गए। वे आज तक नहीं खुल पाए क्योंकि आप रेसिस्ट हैं। जैसे शूद्रों को गीत नहीं सुनना चाहिए, इसलिए उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल देते थे, बिल्कुल इसी प्रकार आप जो प्रशिक्षण दे रहे हैं वही अंतिम है और बाकी लोगों को को उसे नहीं सुनना – सीखना चाहिए, इसके लिए आप जिनको प्रशिक्षण देते हैं, उनके अंदर एक ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताबोध उत्पन्न करते हैं। यह बहुत ही नकारात्मक दृष्टिकोण है, यह सामंती दृष्टिकोण है कि हमारे पास जो है वह दूसरों के पास नहीं होना चाहिए। इसकी वजह से डिसेंट्रलाइजेशन हुआ होता तो ये किले टूटते , किलेबंदी टूटती, वह आर्यवादी – सवर्णवादी व्यूह टूट जाता जो आज तक कायम है।’

‘समकालीन रंगमंच’ के संपादक और नया रंगविमर्श व्हाट्सएप्प ग्रुप के एडमिन राजेश चंद्र ने भी जब अपने लेखों और पोस्टों से तार्किक रूप से तर्क  पुष्टि कर दी तो लग गया कि भारतीय रंगमंच का असली चेहरा यही है। इस संबंध में उनका भी यही मानना है, ‘रंगमंच का ब्राह्मणवाद भी वही है जो जीवन के दूसरे क्षेत्रों में परिलक्षित होता है। मैं सबसे खास और विशिष्ट हूं तथा बाकी सब मुझसे हीन या कमतर है – यह बोध ही ब्राह्मणवाद है। उसे केवल जाति में सीमित करने से हम उसे संपूर्णता में नहीं समझ सकते। थिएटर में ब्राह्मणवाद की पहचान जिन लक्षणों के आधार पर की जा सकती है, वे कोई अभी नही उपजे। यह मानदंड साहित्य से लेकर तमाम कला विधाओं पर लागू है। आप खुद इन लक्षणों पर विचार कीजिए और सोचिए कि ब्राह्मणवाद ने आज रंगमंच पर कैसा प्रभुत्व स्थापित किया हुआ है। ये कैसी धारणा है कि जिन्हें हम चुन लेते हैं, प्रशिक्षण देते हैं, वही रंगकर्मी हैं, वही थिएटर को समझ सकता है। बाकी सब अमैच्चोर और अप्रिशिक्षित हैं। जिन्हें हम भारत रंग महोत्सव में शामिल कर लेते हैं, वे प्रस्तुतियां कलात्मक मानदंडों पर श्रेष्ठ होती है। वे ही निर्देशक, अभिनेता या डिजाइनर श्रेष्ठ हैं, जिन्हें भारत रंग महोत्सव में शामिल होने का मौका मिला है। या जो किसी रूप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े हुए हैं। वे ही समीक्षक श्रेष्ठ हैं जो रानिवि कि महानतम प्रस्तुतियों की समीक्षा करते हैं। वे ही वास्तव में नाटककार माने जाते हैं जिनके नाटक रानिवि में मंचित हुए हैं या होते हैं। रानिवि चहारदीवारी से बाहर के रंग समूहों को, रंगकर्मियों को अछूत और हीन मानता है, इसलिए वह उनसे कोई संबंध नहीं रखता, किसी आयोजन में नहीं बुलाता। यही विशिष्टता बोध दम्भ और छुआछूत तो ब्राह्मणवाद है।’

इसे आप स्वीकारे या ना स्वीकारे, लेकिन एक बार सोच कर तो देखिए। हो सकता हो, इसे कबूलने के लिए बहुत साहस की जरूरत पड़े। वैसे ये भी हकीकत है कि ब्राह्मणवादी रंगमंच शब्द सुनने मात्र से ही खूंटा से  उखड़ने वाले अधिकतर सवर्ण लोग हैं। ये अभिजात्य वर्ग के ऐसे रंगकर्मी हैं जिनके लोग अगर सत्ता के पक्ष में हैं तो प्रतिपक्ष में भी हैं । कार्यपालिका, न्यायपालिका और नौकरशाही पर पुरजोर ढंग से काबिज हैं। किसी न किसी रूप में प्रतिनिधित्व भी करते हैं। लेकिन वहां वे अपने वास्तविक, पारंपरिक रूप में नहीं होते हैं। अपने वास्तविक रूप में तभी आते हैं जब उन्हें अपने वजूद पर कोई खतरा दिखाई देता है। अब तक यह रंग विमर्श बहसों के दायरे में ही रहा है, लिखित रूप में आने पर लोगों को चुप नहीं बैठने देगा। बहुत बड़ा तबका असंतुष्ट होगा। हो सकता है राजनीति की तरह  रंगकर्म से जुड़े कुछ लोग इस शब्द को नया रूप देते हुए रिएक्ट करें, ‘हम तो भारत के नए यहूदी हैं, हमें इस सच के साथ जीना सीखना चाहिए।’संभव है कोई उत्तेजित होकर इस शब्द के प्रयोग के लिए अपराध का भी आरोप लगा दे, रंगकर्म को विकृत, क्षत – विक्षत करने का इल्जाम लगा कर मुकदमा दर्ज करने का फतवा भी जारी कर दे। कुछ भी हो सकता है, क्योंकि आज हमारे देश में जो हो रहा है…इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।’

आखिर ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ है क्या बला जिसका नाम आते कुछ लोग गुस्से से अपना विवेक खो दे रहे हैं तो कुछ  अपने तर्कों के साथ डटे हुए हैं? इस प्रश्न का जवाब ढूंढने के लिए पहले ब्राह्मणवाद पर एक नजर डाल लेना जरूरी है। कुछ लोग अक्सर ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ को लेकर कन्फ्यूज़न पैदा कर देते हैं। ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ दो अलग – अलग शब्द हैं। अक्सर दोनों शब्दों को एक मान लेते है जिसके कारण भरम उत्पन्न करते हैं। वर्ण व्यवस्था के चार वर्णों में एक वर्ण है ब्राह्मण। जैसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अन्य वर्ण हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ब्राह्मण से ही ब्राह्मणवाद शब्द निकलकर आया है। वर्ण – जाति आधारित वह व्यवस्था जिसमें वर्ण – जाति के आधार पर ऊंच – नीच का एक पिरामिड है, जिसके शीर्ष पर ब्राह्मण है तो नीचे अतिशूद्र या ‘अछूत’, जिन्हें आज दलित कहते हैं। जो वर्णव्यवस्था आज वजूद में है, वर्षों पहले जब बनाई गई थी, उसमें ब्राह्मणों की केंद्रीय भूमिका थी। भले सत्ता के केंद्र में प्रत्यक्ष रूप में नहीं थे, लेकिन यह भी सत्य है कि सत्ता और धर्म के बीच गहरा, अटूट संबंध रहा है। बल्कि धर्म के द्वारा ही सत्ता संचालित होता रहा है। उस काल में ऐसे कई ग्रंथों की रचना की गई जिसमें विभिन्न वर्णो के कर्तव्य और सीमाएं रेखांकित और निर्देशित हैं। ‘मनुस्मृति’ में वर्ण और जाति व्यवस्था के नियमों और अधिकारों एवं कर्तव्यों को सबसे व्यापक, व्यवस्थित और आक्रामक तरीके से प्रस्तुत किया गया है जिसके चलते इसे ‘मनुवादी व्यवस्था’ भी कहा जाता है।

और इस मनुवादी या कहिए ब्राह्मणवादी संस्कृति की बुनियादी विशेषता ये है कि श्रम, विशेषकर शारारिक श्रम करनेवालों से घृणा करना। कौन – कौन कितना और किस प्रकार का शारारिक श्रम करता है, उसी से तय होता है कि वह कितना नीच है। इस विशेषता का दूसरा पहलू यह है कि जो व्यक्ति शारारिक श्रम से जितना दूर है अर्थात जितना परजीवी है, वह उतना ही महान और श्रेष्ठ है। इसके साथ मनुवादी – ब्राह्मणवादी संस्कृति की एक और विशेषता है कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के समान नहीं हो सकता अर्थात समानता की अवधारणा का पूर्ण निषेध। चार वर्णों में सभी एक दूसरे से ऊंच – नीच हैं। चारों वर्णों में शामिल हजारों जातियां एक दूसरे से ऊंच – नीच हैं। परिवार में ऊंच – नीच का श्रेणीक्रम बना हुआ है। सबसे निचली कही जानेवाली जातियों में भी ये मानसिकता बनी रहती है, ब्राह्मणवाद की यह मूल व्याख्या है। और ये जितना धर्म में लागू होता है, रंगमंच में भी उतना ही।चूंकि आजकल राजनीति और धर्म में काफी घालमेल हो गया है, इस संदर्भ में ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द का प्रचलन भी काफी बढ़ा है। कुछ लोग जो इस शब्द को एक वर्ण से जोड़ लेते हैं, निजी स्तर पर आहत दिखते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि इस शब्द के बहाने सीधे उनके वर्ण – जाति पर अटैक किया जा रहा है। इसलिए जहां ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द की चर्चा होती है, उन्हें अनर्गल, अलगाव जैसा लगता है। इस संदर्भ में 1927 के उस महत्वपूर्ण तथ्य को उद्धृत करने की जरूरत है जब दलित आंदोलन के युवा नेता दिनकर राव जावलकर तथा केशवराव जेधे ने यह मांग रख दी कि आगामी सत्याग्रह में किसी भी ब्राह्मण को भाग लेने की अनुमति न दी जाय। इस पर अम्बेडकर ने अपनी प्रतिक्रिया करते हुए कहा, ”आंदोलन ब्राह्मणों के खिलाफ न होकर ‘ब्राह्मणवादी धर्म’ के खिलाफ है। हम ब्राह्मणों के नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध हैं।” अपने विचार को उन्होंने और स्पष्ट करते हुए कहा, ‘हमारी लड़ाई ब्राह्मण से हरगिज नहीं है, ब्राह्मणवाद से है, जो समाज का सबसे बड़ा दुश्मन है। अपने भारत देश में बहुतायत ब्राह्मण जन हैं जो ब्राह्मणवाद से खुद नफरत करते हैं। हां, लेकिन कटु सत्य है कि पूरा भारत ब्राह्मणवाद से ग्रसित है।’

जो लोग ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण जाति से जोड़कर देखते हैं, उस संदर्भ में अंबेडकर का कहना है, ‘ब्राह्मणवाद से मेरा मतलब स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना से वंचित रखना है…( ऐसी भावना केवल ब्राह्मणों में ही नहीं बल्कि सभी वर्गों में व्याप्त है हालांकि ब्राह्मणों ने इसकी शुरुआत की थी। )’ अर्थात अम्बेडकर साफ शब्दों में कहते हैं कि ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के निशाने पर कोई जाति विशेष या व्यक्ति नहीं है बल्कि पूरी ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जिसके जहर का शिकार पूरा भारतीय समाज है और इसने हिंदुओं को विशेष तौर पर मानसिक रूप में बीमार बना दिया है।अम्बेडकर ने सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त ब्राह्मणवाद को जिस तरह चिह्नित किया, उसी के परिपेक्ष्य में भारतीय रंगमंच को भी मौजूदा हालात में विश्लेषण करने की जरूरत है। रंगमंच के किसी कोने से अगर ‘ब्राह्मणवादी रंगमंच’ के अस्तित्व की चर्चा हो रही है तो केवल फतवे से उसे खारिज करने के बजाय जमीनी स्तर पर जांच – पड़ताल करने की जरूरत है कि ये ब्राह्मणवादी रंगमंच है क्या? ये कोई अलग रंगमंच है या मौजूदा रंगमंच को ही इस नाम से संबोधित किया जा रहा है? जो लोग रंगमंच में वर्ण को सिरे से खारिज कर देते हैं, उनके संज्ञान में लाने की जरूरत है कि जब पहले से चार वेद मौजूद थे फिर पांचवें वेद को लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? नाट्यशास्त्र तो यही कहता है कि इंद्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से कहा, ”हम मनोविनोद का ऐसा साधन चाहते हैं जो दृश्य भी हो और श्रव्य भी। जो वेद अभी उपलब्ध है, वह व्यावहारिक और सामाजिक रूप से इतना जटिल है कि वर्ण व्यवस्था में जो सबसे निचले पायदान पर जो शूद्र वर्ण है, उन्हें न सुनाया जा सकता है – न समझाया जा सकता है। इसलिए आप एक अन्य पांचवां वेद रचिए जो सभी वर्णो के लिए हो।’ ब्रह्मा ने ‘ऋग्वेद’ से पाठ्य, ‘सामवेद’ से गीत, ‘यजुर्वेद’ से अभिनय और ‘अथर्ववेद’ से रसों को लेकर जो पांचवां ‘नाट्यवेद’ की जो रचना की, देखा जाय तो केंद्र में मुख्य रूप से ‘शूद्र’ वर्ण ही है क्योंकि पाठ्य, गीत, अभिनय और रस जैसे नाटक के मूल तत्व तो पहले से ही विद्यमान थे। जिस वेद की ध्वनि भी शूद्र के लिए निषेध थी, ब्रह्मा ने विशेषकर उनके लिए इस वेद को रचा। ब्रह्मा के रचने पर उस वर्ग, वर्ण की क्या प्रतिक्रिया हुई जो शूद्र के पढ़ने – लिखने पर निषेधात्मक रुख रखते थे, इसकी चर्चा तो कहीं पढ़ने को नहीं मिलती है लेकिन नाट्यशास्त्र के छत्तीसवें अध्याय में जो वर्णित है, विचारणीय है। लिखा है कि भरतमुनि के सौ पुत्र नाट्यवेद सीखकर जब अपने प्रहसनों में ऋषियों के आचार – व्यवहार पर सामूहिक रूप से कुछ व्यंग्य किया तो भयंकर रोष से कांपते हुए आग की भांति जलते हुए मुनियों ने क्रोधित होकर कहा – ‘हे द्विजों, तुमलोगों ने हमारी यह हास्यास्पद नकल करके ठीक नहीं किया। यह अपमान हमें स्वीकार नहीं है। चूंकि तुमलोग ज्ञान के मद से मतवाले होकर ढीठ हो गए हो अतः तुमलोगों का यह कुज्ञान नष्ट हो जाएगा। ऋषियों और ब्राह्मणों के समवाय में तुमलोगों के लिए आहुति नहीं दी जाएगी तथा तुमलोग शूद्रों के समान आचार वाले हो जाओगे।”

कर्म के अनुसार अगर वर्ण का निर्धारण किया जाता और सब वर्णों में बराबरी, समानता का भाव होता तो ऋषियों द्वारा भरतमुनि के पुत्रों को ‘शूद्र’ के लिए क्यों शापित किया जाता? या भरत मुनि के पुत्रों को शूद्र होने पर क्यों ग्लानि का अहसास होता? कहीं न कहीं उन दिनों शूद्र को उपेक्षा भाव से देखा जाता होगा इसलिए भरतमुनि के समस्त पुत्र नाट्यदोष के कारण जो शूद्र के समान आचार वाले हो गए थे, मुक्त होना चाह रहे थे। नहुष नामक राजा का जब स्वर्ग पर कब्जा हुआ तो ब्रह्मा ने भरतमुनि के पुत्रों को नाट्य प्रयोग के लिए धरती पर इस आश्वासन के साथ भेजा कि ऐसा करने से ऋषियों का शाप का अंत हो जाएगा और ब्राह्मणों तथा राजाओं की निंदा के पात्र न रहेंगे।इस प्रकार भरतपुत्रों ने राजा नहुष के माध्यम से पृथ्वी पर इस नाट्य को उतारा और इसके भविष्य को बचाया।नाट्य के भविष्य को बचाने के दावे पर तो एक क्षण के लिए विश्वास किया जा सकता है लेकिन ब्राह्मणों के दिए गए शाप से वे मुक्त हो सके कि नहीं, इसमें संदेह है। ब्रह्मा ने भले उन्हें शाप से मुक्त कर दिया लेकिन क्या ऋषियों, मुनियों के शाप से मुक्त हो पाए?

डॉ. रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक ‘भारतीय साहित्य की भूमिका’ में लिखते हैं – ‘मनुस्मृति में हम गीत, वाद्य और नृत्य से आजीविका का निषेध देखते हैं तथा व्यवस्था पाते हैं कि सवर्णों को गीत, वाद्य और नृत्य से आजीविका उपार्जन नहीं करना चाहिए।’ ‘मनुस्मृति’ सूत, मागधों और नटों को वर्णसंकरता का परिणाम बताती है। सिर्फ मनु ही नहीं बल्कि और भी धर्मज्ञाताओं ने शूद्रों के लिए मनु शैली ही अपनाया। उन्होंने सुझाव दिया कि उन्हें रंगमंच के अभिनेताओं के भोजन नहीं करना चाहिए। विष्णु के ‘विष्णुस्मृति’ में अभिनेताओं की उत्पत्ति को शूद्रों और वैश्य कन्याओं से जोड़ा गया। ‘मनुस्मृति’ में मनु ने नटों और मल्लों के पेशे को सबसे नीच माना और ब्राह्मणों को अभिनेता बनने से वर्जित किया। इसी तर्ज पर ‘महाभाष्य’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता की माना गया और ब्राह्मणों को सलाह दी गयी कि ये उनसे दूर रहे। नाटक करने वालों की स्त्रियां एक प्राचीन संस्कृत श्लोक के अनुसार पराए पुरुषों के साथ इस प्रकार लगी हुई थी, जिस प्रकार वर्णों के साथ मात्राएं। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में नट – नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत किया है और नगरपालिकाओं तथा पंचायतों पर जोर डाला है कि वे नटों – बाजीगरों और तमाशा करने वालों को नगर के समीप न फटकने दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनाई जाए। अर्थशास्त्र में ही नाट्यशास्त्रों का विरोध करते हुए यह भी लिखा गया है कि ये गांवों में नहीं बनाई जानी चाहिए। क्योंकि इससे ग्रामीणों के काम में बाधा पहुंचती है।

इससे यह पता चलता है कि भले भरतपुत्र ब्रह्मा के शाप से मुक्त हो कर पृथ्वी पर आ तो गए लेकिन ब्राह्मणों के कोप को शांत कर पाने में सफल नहीं हो पाए। एक बार जो शूद्र बना दिया तो बना दिया। घर वापसी नहीं किया। आज भी नाटक को नौटंकी ही कहने का प्रचलन है। सामंती समाज में नाटक करना अच्छा काम नहीं माना जाता है। कौन काम श्रेष्ठ है और कौन निम्न, इसका निर्धारण कौन करता है? ब्राह्मणवादी पितृसत्ता में कभी भी श्रम से जुड़ा कार्य उत्तम नहीं माना गया है। एक ब्राह्मण, क्षत्रिय के लिए हल की मूठ पकड़ना पाप सदृश्य समझा जाता है। नाटक करना भी श्रम से जुड़ा हुआ कार्य है, सम्भवतः इसी सोच के कारण ब्राह्मण विद्वानों ने रंगकर्म को दोयम दर्जे का कर्म बताया है। बल्कि ब्राह्मणों को इससे दूर रहने का निर्देश दिया गया है। और जो अब तक इस अवधारणा पर अडिग हैं कि शूद्रों के कानों में वेद – शास्त्र का कोई स्वर तक न जाने पाए, उनके लिए ब्रह्मा का वह पंचम वेद भला स्वीकार्य कैसे होगा, जो सभी वर्णों के देखने – सुनने – पढ़ने के लिए सृजित की गई हो? समरसता, समानता का ब्राह्मण वर्ग ने कभी समर्थन नहीं किया है। मनुस्मृति के सैकड़ों श्लोक इसके साक्ष्य है। भले कहीं उल्लेखित नहीं है कि पंचम वेद से शूद्र वर्ण को जोड़े जाने से ब्राह्मण वर्ग पर क्या प्रतिक्रिया हुई, लेकिन उनके लिए यह इतना भी सहज – सरल नहीं होगा। जरूर कोई न कोई अंतर्विरोध उभर कर आया होगा।

जब से दलित रंगमंच सुर्खियों में आया है, इस आंदोलन से जुड़े रंगकर्मी पुरजोर ढंग से कहने लगे हैं कि नाटक तो  ब्रह्मा ने शूद्र लोगों के लिए ही रचा है। बल्कि दावा करने  लगे हैं कि यह विधा ही उनकी है। ब्रह्मा ने नाटक को एक वृहद समाज के लिए रचा था, इसलिए प्रारम्भ में जब नाटक होता था तो खुले दायरे में। एक गोल घेरे के चारों तरफ बैठे हुए विभिन्न तबकों के दर्शकों के बीच नाटक का मंचन हुआ करता था। दर्शकों में वर्ण के स्तर पर बैठने को लेकर कोई विभाजन नहीं था। भरतमुनि द्वारा पहली बार ‘देवासुर संग्राम’ की कथा पर आधारित नाटक ‘असुर पराजय’ का मंचन किया गया तो वह ‘खुले मैदान’ में हुआ ताकि व्यापक जनमानस की भागीदारी हो सके। नाट्यवेद की रचना का उद्देश्य भी तो यही था। इंद्र की असुरों और दानवों की पराजय के उपलक्ष्य में प्रस्तुत नाटक में दैत्यों और दानवों का नाश करने वाले इस प्रयोग के प्रारंभ होने पर एकत्र सारे दैत्य क्षुब्ध हो उठे। विरुपाक्ष और वहां उपस्थित उसके साथियों ने आपत्ति करते हुए व्यवधान डालने की कोशिश की। लेकिन रंगपीठ पर आए विघ्नों तथा असुरों को देवराज इंद्र ने जर्जर से जर्जरीकृत देह बना दिया। तब ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से शीघ्र नाट्यशाला के निर्माण का आदेश दिया। विश्वकर्मा द्वारा नाट्यगृह बनने के बाद ब्रह्मा ने सभी देवताओं से अपने – अपने अंशों से नाट्यमंडप की रक्षा करने का आह्वान किया। देखा जाए तो ब्रह्मा का ये निर्णय ही रंगमंच को आम से विशिष्ट बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत है। जिस नाट्यवेद की रचना समाज के सारे लोग चाहे वे देव हो या दानव के लिए किया गया था; नाट्यगृह के निर्माण होते ही अभिजात्य हो गया। देवों के लिए इस नाट्यगृह में तो अनुमति थी लेकिन दानवों के लिए प्रवेश निषेध था। असुर नाटक के जिन स्थापनाओं से असहमत थे, उसका विरोध करना उनके समाज में व्याप्त लोकतंत्र का एक हिस्सा था। लेकिन इंद्र और देवताओं ने अधिनायक के रूप में असुरों के विरोध का जिस तरह दमन किया, जैसा कि कहीं – कहीं उल्लेख मिलता है, कि विरोध करने वाले असुरों को मंच पर घसीटकर लाया गया और सबों के सम्मुख उनका वध किया गया ; कहीं से भी लोकतांत्रिक और न्यायोचित नजर नहीं आता है। ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से जिस तरह के नाट्यगृह के निर्माण का निर्देश दिया था, वह केवल मौसम, प्रकाश, ध्वनि को ध्यान में रखने के लिए नहीं था, उनकी विचारधारा से असहमत रहनेवालों को अलग – थलग करना भी था। देवताओं की संस्कृति, सभ्यता और विचारधारा को लेकर असुरों के बीच गहरा मतभेद था, और भविष्य में ये टकराहट और न बढ़े, संभवतः इसी के मद्देनजर रंगमंच को चहारदीवारियों के अंदर लाया गया ताकि असुर लोग वहां न पहुंच सके। उन्हें रोकने और उनके द्वारा संभावित किसी भी प्रकार के व्यवधान उत्पन्न करने के प्रयासों को छिन्न – भिन्न करने के लिए सुरक्षा की जितनी भी तैयारियां हो सकती है, सब किया। साथ ही उनका ये भी सोचना होगा कि शायद ऐसा करने से असुरों के बीच रंग चेतना का विकास न हो सके। लेकिन जिस उद्देश्य से नाट्यशास्त्र की रचना की गई थी, वह तो जन – जन के बीच जा चुकी थी। अब किसी के रोकने से रुकनेवाला थोड़े था। असुरों को नाट्यगृह में प्रवेश से निषेध किया तो उन्होंने खुले मैदान में नाटक करना शुरू कर दिया। इनके प्रदर्शनों में व्यापक जनमानस की भागीदारी होती थी। उनके यहां सामाजिक रूप से कोई विभाजन नहीं था। जो उनका समाज था, संस्कृति का जो स्वरूप अस्तित्व में था, वह किसी न किसी रूप या कहे शैली में अभिव्यक्त होता रहता था। श्रम, शिकार और युद्ध ही इनके प्रदर्शनों में प्रमुख होता था। देश के विभिन्न इलाकों में रहनेवाले असुरों की बोली, संस्कृति में कुछ – कुछ फर्क होने के कारण इनकी नाट्य शैलियों में ये फर्क दृष्टिगोचर होता है। लोकगीत और कहावतों की मात्रा पर्याप्त रूप से होती थी। कथ्य वाह्य जगत से नहीं आता था, उनके अंदर से ही निकल कर आता था। वर्तमान में आदिवासियों और दलितों के बीच जो लोक शैलियां देखने को मिलती है, वह गढ़ी हुई नहीं है…सदियों से चली आ रही परंपरा का अहम हिस्सा है। और नगरों – महानगरों का प्रोसिनियम थिएटर जिसे मुख्य धारा से जुड़े कुछ लोग यूरोपीय देशों का नाट्य रूप मानने के भरम में रहते हैं, दरअसल वो यूरोपीय अभिजात्य नाटक नहीं, हमारे देश का ही नाट्य रूप है जिसे देवताओं ने आम से विशिष्ट बनाया था। नाटक जो खुला था, इसे नाट्यगृह के अंदर सीमित किया था। असुरों को विलग तो किया ही, नाट्यगृह के दर्शकों को भी वर्ण व्यवस्था के आधार पर बांट दिया। श्रेष्ठता के अनुसार दर्शकों के बैठने का प्रावधान किया गया था। फिर तो जाहिर था, शूद्र दर्शक के लिए कहां जगह होगी? विश्वकर्मा निर्मित नाट्यगृह में शूद्र दर्शकों के लिए सबसे पीछे जगह थी। 

ब्राह्मणों – ऋषियों के शापवश जब रंगकर्मी शूद्र घोषित कर पृथ्वी पर पलायन होने के लिए विवश कर दिए गए तो शाप से अपमान, ग्लानि बोध रखने वाले रंगकर्मियों का एक हिस्सा प्रतिरोध करने, जनता के बीच जाने के बजाय सत्ता का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया। लोक में रंगकर्म करने के अपेक्षा राजदरबारों – मंदिरों में नाटक करना श्रेयस्कर समझा। वर्तमान में मुख्यधारा के रंगमंच के यही रूप हमारे बीच मौजूद है। इस धारा में परोक्ष रूप से ब्राह्मणवादी विचारधारा किस हद तक अंतर्निहित है, इसकी जांच के लिए जरूरी है सत्ता से जुड़े रंगकर्म की नाड़ी को स्पर्श करके धमनियों में प्रवाहित रक्त का विश्लेषण करना। जिसके लिए नाट्यवेद की रचना की गई थी, पहले उसे ही बाहर का रास्ता दिखाया गया। जातिगत श्रेष्ठता की अवधारणा के आधार पर सत्ता पोषित रंगकर्म में ब्राह्मणवाद का भली – भांति पालन किया गया। नाटक में नायकत्व हमेशा ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण को प्राप्त होता रहा। नाटक में अभिनय करते समय ब्राह्मण, शूद्र तथा नारी पात्रों में समानता नहीं बरती जाती थी। ब्राह्मण पात्र यदि अभिनय करते थे तो वे संवाद के रूप में संस्कृत का प्रयोग करते थे जबकि शूद्रों और नारियों के लिए वर्जित था। उनके संवाद प्राकृत में होते थे। अर्थात वर्ण के आधार पर भाषा का भी नाटक में स्पष्ट विभाजन था। समाज में वर्ण के अनुसार गैरबराबरी तो थी ही, नाटक भी इससे अछूता नहीं था। इसलिए वर्णवादी व्यवस्था में जो सर्वोपरि था, उसे ही नाटकों में नायक के लिए उपर्युक्त समझा जाता था। अगर शास्त्रीय, सत्ता पोषित संस्कृत नाटकों को देखे तो उसमें ऐसे लक्षण साफ दिखते हैं। ऐसे नाटकों का उद्देश्य सामान्य जन को चेतना के स्तर को बढ़ाना नहीं था, अपितु कुछ खास लोगों को आनंद प्रदान करना था। सोचने की बात ये है कि रंगकर्म की इस धारा पर विद्वान लोगों का आलोचनात्मक रुख उतना नहीं रहा जितना इससे इतर लोक धारा पर। मनु, याज्ञवल्क्य से लेकर कौटिल्य तक न जाने कितने ऋषियों – ब्राह्मणों ने आदिवासियों – दलितों के लोक रंगमंच के बारे जो – जो कहा है, लिखा है; वह आपत्तिजनक ही नहीं, सर्वथा निंदनीय है। उनके अभिनेताओं और उनके आचरणों के संबंध में जो टिपण्णी की गई है वह साफ तौर पर ब्राह्मणवादी मानसिकता के आधार पर की गई है। संस्कृत नाटकों में अभिनय करनेवाले सवर्ण आभिनेताओं के बारे में मनु और याज्ञवल्क्य कुछ नही बोलते हैं पर लोक रंगमंच पर कार्य करनेवाले शूद्र अभिनेताओं को लेकर ब्राह्मणों को सुझाव देते हैं कि उन्हें इनका भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए। ‘मनुस्मृति’ में मनु ने नटों और मल्लों के पेशे को सबसे नीच माना है। ‘महाभाष्य’ में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाने वाले आभिनेताओं की पत्नियों को गिरी नैतिकता की माना गया और ब्राह्मणों को उनसे दूर रहने की सलाह दी है। कौटिल्य का ब्राह्मणवाद तो ‘अर्थशास्त्र’ में खुलकर आ जाता है। वे नट – नटियों की आचारहीनता की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि इन्हें नगर के समीप फटकने न दें। इनके लिए नगर के बाहर ही बस्ती बनायी जाए। सत्ता के संरक्षण में जो नाटक होते थे, वे या तो मंदिरों के प्रांगण में होते थे या राजा के दरबार में। जाहिर है, कौटिल्य का रंगमंच के बारे में दिया गया अभिमत उन नाटकों के बारे में नहीं था जो अभिजन के मनोरंजन का साधन था, उनके निशाने पर वह रंगमंच था जो व्यापक लोगों के बीच था।उस रंगमंच के प्रति उपेक्षा, तिरस्कार का भाव रखते थे  जो  दलित – आदिवासी और वंचित लोगों द्वारा संचालित था, जिसमें लोक जीवन व्याप्त था, जो अंधविश्वास – कुरीति – धार्मिक कट्टरता पर चोट करता था। अश्लीलता, फूहड़ता तो बहाना था, वास्तविकता ये थी कि उन्हें डर था कि ये नाटक कहीं वर्णवादी व्यवस्था को चुनौती न देने लगे? चार्वाक जैसे लोग जिस तरह अपने दर्शन से वैदिक परंपरा पर सवाल खड़े करने लगे थे, कहीं संस्कृति के क्षेत्र में भी इस तरह की कोई बहस न छिड़ जाये ; इसलिए एक तरफ दरबारी नाटकों को जितना ब्राह्मणवादी ढांचे में कसा गया उतना ही पुरजोर प्रयास किया गया कि लोक रंगमंच को विकृत – सौन्दर्य विहीन करार कर दिया जाए।

आजादी  के पहले बंगाल में साम्राज्यवादी सत्ता द्वारा जो कृत्रिम अकाल की भयावह स्थिति उत्पन्न की गई थी, उसके खिलाफ जब लोक खड़ा हुआ…किसानों – मजदूरों – आदिवासियों का आक्रोश इप्टा के सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़कर राष्ट्रीय स्तर का व्यापक रूप लिया तो संभावना थी कि आनेवाले वर्षों में भारतीय रंगमंच की मुख्यधारा की शक्ल अख्तियार कर लेगी। लेकिन हुआ कुछ और ही।  सत्ता में उथल – पुथल आने के कारण ब्राह्मणवादी रंगमंच भले एक लंबे काल के लिए नेपथ्य में चला गया था, लेकिन मुल्क के आजाद होने पर फिर से एंट्री हुई। नए अंदाज, नये दम – खम के साथ। बल्कि पश्चिमी रंगमंच से मिले अतिरिक्त आत्मबल के प्रभामण्डल से देदीप्यमान। लोकतंत्र के गलियारे से सामन्तवाद के जो नुमाइंदे सत्तासीन हुए थे, उन्होंने भी इसका रास्ता साफ कर दिया था। समाजवाद और प्रगतिशीलता के चमचमाते रैपर में सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा रंगमंच की जो अवधारणा सोसाइटी में पेश की गई, उसके अंदर लोक नाटकों का चेतना स्वर नहीं, सदियों पहले का वही ब्राह्मणवादी एसेंस था। जनता से जुड़ा लोकनाट्य आंदोलन सत्ता के बूटों के नीचे कुचल दिया गया। देश की छोटी – छोटी धाराएं जुड़कर जो एक बड़ी महानदी बन गयी थी, उसे बांधने, उसकी धारा को सुखाने और उसे  महानदी से नदी और नदी से नाले में बदलने के लिए जो – जो कुचक्र रचे जा सकते थे, बेहिचक – बेदर्दी से सम्पन्न किए गए। दुनिया भर में भारतीय रंगमंच की पहचान जिस रंगमंच से हो सकती थी, उसे अनगढ़, अशिष्ट और अश्लील कहकर हाशिये पर ढकेल दिया गया। और उसकी जगह उसे प्रतिस्थापित किया जो सामंती और साम्राज्यवादी हितों का पोषक था। इसका दायरा विस्तृत नहीं था, न इसकी कोई मंशा थी कि इसमें वृद्धि हो। अभिजन का होने के कारण, अभिजन के जो – जो संस्कार हो सकते थे, धारण किए हुए था। और इस बात का उसे गर्व भी था। आम जनों से जुड़ाव न होने का कोई मलाल  नहीं था।इसका वास लोक के संघर्षशील आवाम के बीच नहीं था। जंगल, खेत – खलिहानों के बीच इसकी जड़ नहीं थी। नगरों – महानगरों में ही इसकी धड़कन सुनी जा सकती थी। मंदिरों और दरबारों के बजाय अब इसका नया पता सरकारी अकादमियों, संस्थानों के इर्द – गिर्द हो गया था। अपने आप को या तो सदियों की शास्त्रीय परंपरा से जुड़ा मानता था या फिर पाश्चात्य परंपराओं के प्रभाव को आत्मसात करने में धन्य – धन्य महसूस करता था। समय के अनुरूप नया नाम भी गढ़ लिया था। ‘मेनस्ट्रीम का रंगमंच’ या हिंदी में कहिए तो ‘मुख्यधारा का रंगमंच’। 

बादल सरकार के थर्ड थिएटर की अवधारणा में ‘मुख्यधारा का रंगमंच’ नगरों -महानगरों में होनेवाला शहरी रंगमंच है जो जनता से कटा हुआ, बौद्धिक और सुसंगठित होने के बावजूद चेतना के स्तर पर कमजोर होता है।  उनका ये भी मानना था कि साम्राज्यवाद के विकसित होने पर आर्थिक लाभ के लिए जिन उपनिवेशों का निर्माण किया गया था, उनके मनोरंजन के लिए रंगमंच का जो ढांचा तैयार किया गया था, वर्तमान में मुख्य रंगमंच उसी की प्रतिछाया है। बादल सरकार जहां ग्रामीण इलाकों में होने वाले लोक शैली के नाटकों के स्तरहीन कथानकों ( जिन्हें बादल सरकार फर्स्ट थिएटर कहते हैं ) से चिंतित थे, वहीं सेकंड थिएटर यानी शहरी रंगमंच के जनमानस से अलगाव रखने को लेकर अत्यन्त क्रिटिकल थे। लेकिन शहरी रंगमंच जनता से क्यों कटा था, क्यों अपना अभिजन संस्कार छोड़ नहीं पा रहा था; इसका विश्लेषण बादल सरकार थर्ड थिएटर की अवधारणा में खोल कर नहीं रख पाते हैं।शहरी रंगमंच या शुद्ध भाषा में कहे तो ‘मुख्य धारा का रंगमंच’ की प्रकृति केवल अभिजन है या कुछ और भी है? शहरी – महानगरीय रंगमंच अगर मुख्यधारा का है तो क्या इसमें देश की व्यापक जनता की भागीदारी है? क्या इस रंगमंच में जनमानस की धड़कन सुनाई देती है? इस रंगमंच से समाज का कौन सा हिस्सा जुड़ा है? मुख्यधारा का रंगमंच है तो इसमें जरूर ज्यादा लोगों की भागीदारी होगी? कोई पूछे तो इसका क्या जवाब होगा? देश की वृहद आबादी तो गांवों में रहती है, शहरों में ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी लोग रहते हैं। तो क्या मेनस्ट्रीम का रंगमंच इन्हीं 15 फीसदी लोगों के लिए है? आखिर इतने कम लोगों वाला रंगमंच किस तर्क पर अपने को मुख्यधारा के कहलाने के मुगालते में है? हकीकत में ये तो अल्पसंख्यक का रंगमंच है। भले सरकारी कोष में अल्पसंख्यक की परिभाषा कुछ और है, लेकिन संख्या के तौर पर मेनस्ट्रीम का रंगमंच का अर्थ इसी के आसपास है। संख्या में कुछ ही लोगों का यह रंगमंच है पर प्रतिनिधित्व करता है सम्पूर्ण रंगमंच का। ऊपर से यह रंगमंच भले लोकतांत्रिक लगता हो, समानता – एकता – समरसता की बातें करता हो… अभिजात्य इसके संस्कार में है। विशिष्टता इसके व्यवहार में कूट – कूट कर दिखता है।इस तथ्य से कुछ लोग सहमत न हो, लेकिन वर्तमान में मुख्यधारा का जो रंगमंच हमारे बीच मौजूद है, वे घोर ब्राह्मणवादी, मर्दवादी, सवर्णवादी और जातिवादी है।

यह स्थापना शायद कुछ लोगों के गले के नीचे शायद न उतरे। अप्रत्याशित भी लगे। इसे खारिज करने के लिए चुन – चुन कर उदाहरण दिए जाएं। उन प्रगतिशील उदाहरणों के बहाने बताया जाएगा कि मुख्यधारा का रंगमंच समानता, मानवता का पक्षधर है। लेकिन असल में मेनस्ट्रीम का थिएटर जैसा दिखता है, अंदर से है नहीं। ऊपर से प्रगतिशील चेहरा दिखता है, अंदर कुछ और ही होता है। इनका हित जिससे जुड़ा होता है, वह संसार…वह जीवन दिखता है। अगर दलितों, अस्पृश्यों और आदिवासियों के सवाल और उसके जवाब अगर मुख्यधारा के रंगमंच में ढूंढना चाहे तो शायद निराश ही हाथ लगे। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, उदाहरण ढूंढने में बहुत मगज मारनी होगी और कुछ हाथ भी नहीं आनेवाला। मुख्यधारा के रंगमंच के जो प्रतिनिधि , प्रशंसित और बहुमंचित नाटक हैं, पाएंगे कि उनमें अधिकतर उच्च मध्यवर्गीय परिवार के इर्द – गिर्द घूमती हुई है। अभिजात्य लोगों की कुंठा, त्रास, तनाव पर फोकस है। इससे इतर एक बहुत बड़ी आबादी जिसने आजादी के बाद सोचा था कि उनके दिन फिरेंगे, श्रम का वाजिब दाम मिलेगा, शिक्षा – स्वास्थ्य – रोजगार उनके नसीब में होगा… ऐसे सवाल, जुझारू किरदार नाटकों से गायब हैं। अपने हक, अधिकारों के लिए जब किसान जमीन की लड़ाई लड़ता है, मजदूर हड़ताल करता है, आदिवासी अपने जंगल को बचाने के लिए धनुष उठाता है तो मुख्यधारा का रंगमंच इनके लिए कोई स्पेस नहीं देता है। जहां क्लास स्ट्रगल की बात आती है, वहां प्रगतिशील धारा से जुड़े लोग आगे तो जरूर आते हैं लेकिन कास्ट के मुद्दे पर मौन साध लेते हैं। शायद उनके लिए कास्ट कोई समस्या नहीं दिखती है। तभी तो उनके रंगमंच में इसके लिए कोई जगह नहीं।

नाटक की अपेक्षा साहित्य में किसान – मजदूर – आदिवासी – दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व प्रमुखता से है। उन पर हुए जुल्म, शोषण…उसके खिलाफ उनकी लड़ाई…संघर्ष का स्वर किसी न किसी रूप में सुनाई देता है। लेकिन जब भी मेनस्ट्रीम के रंगमंच में वंचित समाज को स्पेस देने की आवाज उठाता है तो एक बड़ा तबका आक्रामक हो उठता है। शोरगुल मचाने लगता है कि रंगमंच एक पवित्र जगह है, जाति के आधार पर बांटना रंगमंच के हित में नहीं है। फिर वह दुनिया जहां से रंगकर्मी आते हैं , उनके आचार – विचार – संस्कार जिस धर्म – जाति से संचालित होता है वह क्या समाज के हित में है? शादी – विवाह, जन्म – मरण के रीति – रिवाज जिस  धर्म , वर्ण, जाति के आधार पर होते हैं ,वह क्या है? जातियों के नाम पर समाज बंटा है। मुहल्ले बंटे हैं, राजनीतिक खांचें बंटे हैं, वह क्या है? ये हमारी एकता, भारतीय समाज को विखंडित नहीं कर रही हैं? जब हम सभी भारतीय हैं, तो ब्राह्मण – ठाकुर – दलित क्या है ? चलिए ये भी मान लेते हैं धार्मिक स्तर पर हिन्दू हैं, फिर ये कहां से आ जाता है कि इसका फलां वर्ण है, इसकी फलां जाति हैं? समाज जब बंट रहा है तो कोई फुसफुसाहट भी नहीं और नाटक में ब्राह्मण – दलित आ गया तो हाय – तौबा शुरू। एक साथ चारों तरफ विरोध में आवाजें उठने लगती हैं। ऐसा क्यों?

जब हमारे समाज , धर्म में ही हजारों वर्षों से वर्ण – जाति व्याप्त हैं, हमारी धार्मिक – सामाजिक व्यवस्था ही वर्णवादी व्यवस्था पर टिकी हुई है जिसको न कभी खारिज करने की कोशिश की गई, न विध्वंस करने का किसी व्यक्ति, समाज द्वारा प्रयास किया गया, वही सवाल जब रंगमंच में उठता है…रंगमंच को वर्णहीनता, जातिमुक्ततता का आवाहन करता है तो दो तरह के चेहरे देखने को मिलने लगते हैं।जब हमारा समाज और धर्म ही वर्णव्यस्था पर टिकी हुई है तो हमारा रंगमंच वर्ण – जाति से अप्रभावित कैसे रह सकता है? ब्राह्मण वर्ण को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए मनुस्मृति और उसी तरह की दर्जनों ब्राह्मणी साहित्य रची जा सकती है तो उसके उन्मूलन, विरोध में अगर दलित साहित्य, दलित रंगमंच वजूद में आता है तो ये कोई अस्वाभाविक प्रक्रिया है? देश में करोड़ों की संख्या में दलित हैं तो उनका साहित्य, नाटक अलग कैसे नहीं होगा? उनकी संस्कृति भिन्न क्यों नहीं होगी? अवश्य होगी, और हकीकत में है भी।किसी रंगकर्मी को आज के दिनों में शूद्र कह दे तो अन्यथा ले लेगा। नाराज हो जाएगा, सम्भवतः गुस्से से तिलमिला भी जाये। हरगिज अपने आप को शूद्र कहलाने के लिए तैयार नहीं होगा। आखिर शूद्र के संबोधन से तिलमिला क्यों जाते हैं? अगर आप वर्तमान वर्ण व्यवस्था को मान रहे हैं, आप को इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है, इसे बदलने के लिए न सैद्धान्तिक रूप से, न व्यावहारिक रूप से सक्रिय दिखते हैं, तो इस शब्द से आपत्ति क्यों हैं?

आज से नहीं, हजारों साल से यह देश वर्ण – जाति प्रधान है, जहां कुछ लोगों को अपने वर्ण या जाति का नाम लेने में कोई संकोच नहीं होता है। बल्कि गर्व, स्वाभिमान से उच्चारित करते हैं। वहां के जब साहित्य या रंगमंच में वर्ण या जाति का जब भी नाम लिया जाता है, कोई भूचाल सा खड़ा हो जाता है। बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो जाता है। वही जो अपने वर्ण – जाति की महिमामंडन करने से  अघाते नहीं हैं, यकायक इतने प्रगतिशील बन जाते हैं कि जाति की बात करना बैकवर्डनेस समझते हैं। कहते हैं, कहां है जाति? इक्कीसवीं सदी में जाति की बात करने की कोई प्रासंगिकता है? वर्ण – जाति अब बीते दिनों की बात हो गयी है। जो लोग साहित्य, रंगमंच में जाति का सवाल खड़ा कर रहे हैं, गड़े मुर्दे उखाड़ने के प्रयास में लगे हैं, वे नकारात्मक सोच वाले हैं। अब सब बराबर हैं। न कोई सवर्ण है, न कोई अवर्ण। आज दलित और ब्राह्मण सब बराबर हैं। जो लोग रंगमंच में दलित चेतना ढूंढ रहे हैं, भ्रमित हैं। या मुख्यधारा के रंगमंच में जबरन जो ब्राह्मणवादी तत्व ढूंढ रहे हैं, वे घनघोर जातिवादी मानसिकता वाले लोग हैं। वे सामाजिक समरसता के विरोधी है। वे नहीं चाहते हैं कि समाज में समानता स्थापित हो। अमेरिका जहां पूंजीवाद चरम अवस्था में है, नस्लवाद को कानूनी स्तर पर मान लिया गया है कि खत्म हो गया है लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होता है कि अभी भी साहित्य, सिनेमा और रंगमंच में भागीदारी नहीं हो सकी है जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। हॉलीवुड की फिल्मों में बतौर अभिनेता, निर्देशक, स्क्रिप्ट राइटर अभी भी अश्वेतों का प्रतिशत श्वेतों की अपेक्षा बहुत कम है। अपने यहां तो स्थिति ही और  है। जरूरत ही नहीं समझी जाती है। कोई अगर इस जरूरत पर जोर डालता है तो पहले इस ट्रेंड को ही खारिज करने का प्रयास किया जाता है। और इसमें दक्षिणपंथी क्या, वामपंथी भी स्वर में स्वर मिलाते नजर आ जायेंगे। दक्षिणपंथियों के विरोध का अंदाज जहां आक्रमक रूप में नजर आएगा, वहीं वामपंथी जरा बौद्धिकवादी मुद्रा में। हो सकता है अंदर से एक भय जन्म लेता हो कि अगर दलितों – आदिवासियों का मंच पर वर्चस्व हो गया तो उनके आधार का क्या होगा? जातिगत श्रेष्ठता, रंगमंचीय गुरुता के तार छिन्न – भिन्न नहीं हो जाएंगे? इसलिए उत्तम यही होगा कि अभिवंचितो के बीच से उठती आवाज को प्रारंभ में ही दबा दिया जाए। भटका दिया जाए। इस प्रयास में वे कहीं न कहीं  सफल भी रहे हैं। आज पारसी नाटक से हिदी समाज पूरी तरह से परिचित है, लेकिन उसी के समकालीन ज्योतिबाराव फुले के नाटकों के बारे में कितने लोग जानते हैं? फुले ने ‘तृतीय रत्न’ नाटक में समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुरीति, अस्पृश्यता को रेखांकित करते हुए ब्राह्मणवाद पर जिस तरह निर्मम प्रहार किया था, उस पर नाटक के आलोचकों ने कितना लिखा है? मुख्य रंगमंच के कितने रंगकर्मी आज अपने रंगकर्म को फुले की उस धारा से जुडने के प्रति उत्साहित नजर आते है? मराठी रंगमंच में शायद फुले की चर्चा हो भी लेकिन हिंदी रंगमंच में तो गहरी चुप्पी दिखाई देती है। अम्बेडकर के समकालीन अछूतानंद ‘हरिहर’ ने हिंदी प्रदेश में कानपुर की नौटंकी शैली में आधे दर्जन नाटकों का लेखन किया, देहातों में जा – जाकर दलित सवालों पर नाटक किया, इसको जिस तरह से नजरअंदाज किया गया है, उस पर विचार करने की जरूरत है। वर्णव्यवस्था से लड़नेवाले नायक रैदास, फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार जैसे दलित नायकों पर अगर नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं, आतंकवाद के नाम पर सींखचों के पीछे डाले जा रहे बेगुनाह मुसलमान युवकों, किसानों की आत्महत्या और जंगलों से विस्थापित आदिवासियों पर खामोशी है तो कुछ न कुछ तो कारण होगा ही? कारण वही है जो पहले था। उनका मानना है कि मुख्य रंगमंच जिसे आजकल कुछ लोग आधुनिक भारतीय रंगमंच भी कहने लगे हैं, उसे एक ‘पवित्र गाय’ बना दिया गया है। घोषित कर दिया गया है कि यहां जात – पात, छुआछूत, असमानता जैसी निकृष्ट, नकारात्मक तत्व है ही नहीं। थोड़ी – बहुत है भी तो इसे जगजाहिर करने में कोई बुद्धिमता नहीं है। भूख, गरीबी और भ्रष्टाचार को देखकर ऐसे ही लोगों को टेंशन होने लगता है। अगर जात – पात, अस्पृश्यता, निम्न जाति के लोगों के रहन – सहन, बोली को दिखाने – सुनाने लगे तो नाटक के प्रति लोगों की थोड़ी – बहुत जो रुचि बची हुई है; वह भी गर्त में  चली जायेगी। नाटक का जो सौंदर्यशास्त्र बचा हुआ है, स्वाहा हो जाएगा। सामाजिक जीवन में ये दलित – आदिवासी आरक्षण, दलित एक्ट, गौ हत्या के बहाने तो तबाही मचाए ही हुए है, अब मंच पर आकर फिर से दैत्यराज विरुपाक्ष की तरह उत्पात मचाना शुरू कर देंगे।

लेकिन उन्हें पता होना चाहिए अब जर्जर करने के लिए केवल इंद्र ही काफी नहीं हैं। तमाम देवता गण, ऋषि – मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को लामबंद होना होगा। और ब्रह्मा ने इस बार सरस्वती को फरमान जारी कर दिया है कि अब एक ऐसा ब्राह्मणवादी रंगमंच का सृजन करे जहां प्रतिरोध का एक परिंदा भी पर न मार सके।

 नादरंग-4 

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One Thought to “मुख्यधारा के रंगमंच का असली चेहरा”

  1. Paritosh Prasad Bhattacharya

    राजेश कुमार ने अपने लेख के माध्यम से भारतीय समाज के वर्ण व्यवस्था वाले चेहरे को दर्शाया है।उनके द्वारा चिन्हित अभिजात्य रंगकर्म पूरे लेख के दौरान जातिवादी और वर्णवादी हो जाता है हालांकि मैंने अब तक इस ब्राह्मणवादी रंगमंच की आंच महसूस नहीं की है।
    राजेश कुमार का उद्देश्य इस लेख के माध्यम से जातिवादी तथा वर्णवादी समाज और रंगकर्म की भर्त्सना मात्र नहीं हो सकता।उसका उद्देश्य उनकी इस आकांक्षा में निहित है कि एक समरस,समतामूलक समाज और रंगकर्म स्थापित हो।इस उद्देश्य की प्राप्ति ऐसे आलेख से हो पाना एक दुर्लभ उपलब्धि हो सकती है।रंग-राग के इसी अंक में रतन थियम का ये कथन इस संबंध में उल्लेखनीय है “ये एक वह माध्यम है जो हमेशा खराब चीज़ों के खिलाफ और खराब सिस्टम के खिलाफ जूझता रहता है और उसके खिलाफ बोलता रहता है”।(सरकार का काम है धमकाना , रंगमंच का लड़ना)
    सांस्कृतिक परिष्कार और सांस्कृतिक क्रांति का मार्ग “सुखिया मर गया भूख से”, “घर वापसी” ,”हवन-कुंड” के सांस्कृतिक , प्रबुद्ध ,रचनात्मक प्रतिकार से हो कर जाएगा तो लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होगा । सामाजिक , सांस्कृतिक दंश का विष रचनात्मक , सृजनात्मक प्रतिरोध की लम्बी , सतत एवं अधिकाधिक सघनता से युक्त जुझारू पीढ़ी की औषधि के उपचार से निष्क्रिय किया जा सकेगा जो तार्किक रूप से तीक्ष्ण हो कर भी सकारात्मक हस्तक्षेप का मार्ग अपनाए।
    यह एक कड़वा सच है कि उपलब्धि , सत्ता और ओहदा स्वयं में विभेदकारी होता है और व्यक्ति को अपने ही समाज तथा वर्ग से विलग करता है।आंदोलन की शुचिता ,मार्ग की शुद्धता ,समाहारिता तथा सृजनशीलता के गलियारों से हो कर ही एक समतामूलक सामाजिक प्रकटन के लक्ष्य की प्राप्ति होगी।इस आंदोलन में सभी वर्णों के खुली सोच वाले प्रतिनिधियों की अधिकाधिक भागीदारी होनी चाहिए अन्यथा यह एक संकीर्ण , प्रतिक्रियावादी ,कुंठित विरोध बन कर रह जाएगा।आंदोलन का प्रमुख औजार हृदय परिवर्तन होना चाहिए अन्यथा अलगाव की तीव्रता और बढ़ सकती है।

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