पुरानी लकीर पीटते हैं सरकारी कला मेले

‘नादरंग’ से शैलेन्द्र भट्ट

कला से जुड़े कई आयोजनों का अपना एक विशिष्ट महत्व है जहां एक मंच पर कई कलाकारों, कला समीक्षकों, कलाप्रेमियों को संवाद और कलाकृतियों के प्रदर्शन अवसर मिल पाता है। कला के प्रोत्साहन में ऐसे कई समारोह राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हैं जिनमें जयपुर आर्ट समिट ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। समिट की सफलता को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि इसने  2017 में आयोजन के अपने पांचवे वर्ष में 50 देशों के कलाकारों को जोड़ लिया। हालांकि समिट में इधर कुछ व्यवधान भी दिखा है। जयपुर आर्ट समिट के आयोजन के पीछे इसके संस्थापक निदेशक शैलेन्द्र भट्ट की प्रतिभा और मेहनत रही है। भट्ट नेअच्छी भली विदेश की नौकरी और चकाचोंध भरी ज़िन्दगी को ठुकराकर कला सेवा के लिए जयपुर आर्ट समिट की स्थापना की। शायद इसकी वजह उनके संस्कारों में कहीं हो जो उन्हें वृन्दावन के मंदिरों की परम्परा से जुड़े ऐसे परिवार में जन्म के कारण मिली ,जहां पिछले 350 वर्षों से कला, साहित्य और संगीत ही आराधना का मूलमंत्र माना जाता है। देश और फिर विदेश में 25 वर्षों तक नौकरी करते हुए इनका मन कभी भी इनमें नहीं लगा और एक दिन वह अपनी नौकरी छोड़कर अपने पारिवारिक मूल्यों को सही ठहराने के लिए’ भारत लौट आए। जयपुर आर्ट समिट के संस्थापक निदेशक शैलेन्द्र भट्ट से ‘नादरंग’ प्रतिनिधि की लंबी बातचीत के अंशः

0 जयपुर आर्ट समिट की यात्रा के बारे में बताएं, किस तरह की चुनौतियां और दिक्कतें रहीं?

-सन् 2013 में जब पहला जयपुर आर्ट समिट हुआ, तब राजस्थान में समकालीन कला का कोई कार्यक्रम नहीं होता था और दृश्य कला को देखने के लिए लोग बड़े शहरों की और भागते थे। 2017 में पांचवें वर्ष तक आते आते समिट में 50 से अधिक देशों की कला और कलाकारों की भागीदारी के साथ लगभग 50 हज़ार आगंतुक रहे।कहा जा सकता है कि यह एक ऐसा मंच है जिससे पूरे वर्ष में कला और कलाकारों को न केवल प्रोत्साहन मिलता है अपितु अन्य देशों के साथ कला और कलाकारों के सम्बन्ध कार्यक्रमों में भी सीधी मदद मिलती है। कह सकता हूं कि आज राजस्थान में जयपुर आर्ट समिट ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कलाकारों को कला को देखने और समझने के लिए प्रोत्साहित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। 

वरिष्ठ चित्रकार गोगी सरोजपाल के साथ, जिनकी जयपुर आर्ट समिट में नियमित उपस्थिति रहती है

0 आपके मित्र बताते हैं कि आपने कला को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी जमा पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसमें लगा दिया है ? समिट की सफलता से अब आप कितने सन्तुष्ट हैं?

-जी ये सच है। जहां तक सन्तुष्टि की बात है, सन्तुष्टि व्यक्ति के अन्तर्मन से ही आती है। मेरे लिए जिन्दगी में मन का हो तो अच्छा और न हो तो और भी अच्छा, क्योंकि मेरा मानना है अगर हमारे मन का नहीं हो रहा है तो ईश्वर के मन का हो रहा है और यदि ऐसा है तो हमारे लिए अच्छा ही होगा। प्रतिकूलताएं प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आती हैं, कोई भी व्यक्ति अपने साथ सदा अनुकूलताएं बनी रहने का वरदान लेकर नहीं आया है। मेरे लिए कला हमारे अन्तर्मन में जीवन की जीवंतता का प्रतिबिम्ब है। एक नकली सोच के साथ जीकर आप कला को कभी प्रोत्साहित नहीं कर सकते हैं।

0 आपने वित्तीय सलाहकार, प्रशासक और कारपोरेट निदेशक का कार्य छोड़कर अपना समय और श्रम समिट को समर्पित कर दिया, यह निर्णय काफी मुश्किल रहा होगा?

-मेरा मानना है, कला का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन और उसके अन्तर्मन से होता है। हमें जीवन में जब कुछ चुनना हो तो जरूरी और गैर जरूरी के बीच चुनना बहुत आसान है लेकिन जब दो समान रूप से जरूरी के बीच एक को चुनना हो तो बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में अक्सर लोग अपने शौक या पारम्परिक कार्यों की तिलांजलि दे देते हैं। मेरे विचारों से उनको ऐसा नहीं करना चाहिए, बल्कि ऐसी कोशिश करनी चाहिए जिससे आपकी मुख्य जिम्मेदारियां और पारिवारिक कार्य या शौक साथ-साथ आपको आगे बढाने में आपकी मदद करे। 

0 कला के वर्तमान परिदृश्य के बारे में आप क्या सोचते हैं?

मेरी राय में, कला का परिदृश्य तो काफी अच्छा है। यदि ख्याति पाने के लिए अंधी दौड़ को छोड़ कर बात करें तो समसामयिक कला में आज से दो दशक पूर्व में हुए प्रयोगों के कारण ऐसा परिवेश बना है कि आज के समय में कलाकार बनना और बने रहना आसान है। मेरे पिताश्री कहा करते थे कि कला का परिदृश्य तीन तत्वों से बनता है, कलाकार, कला समीक्षक और कला को प्रोत्साहन देने वाला।

0 कुछ लोगों का मानना है कि कला आपके भीतर होती है। समकालीन कला में लोककला की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। ऐसे में कला की शिक्षा या डिग्री को आप कितना आवश्यक मानते हैं?

बहुत अच्छा सवाल हैे। आज के परिवेश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो यह विश्वास रखते हैं कि किसी अच्छी डिग्री के बिना आप सफल होने की नहीं सोच सकते। लेकिन यह बात पूर्णतः सच नहीं है। कुछ करने के लिए, आपको मेहनत और खुली आंखों के सपने देखने की हिम्मत होनी चाहिए। सफलता के लिए, केवल अक्षर ज्ञान होना ही काफी नहीं है। सफलता के लिए, इंसान के अंदर जुनून और आगे बढ़ने की भूख होनी चाहिए, फिर दुनिया का कोई लक्ष्य असंभव प्रतीत नहीं होता है क्योंकि जिन्दगी में सफल होने की सीख केवल स्कूलों और कॉलेजों में पढाई जाने वाली किताबों में ही नहीं मिलती, ऐसा मेरा मानना है। आपको आपका शौक, आपकी लगन और आपका अपने उस शौक के लिए किया गया समर्पण स्वशिक्षित कलाकार ही नहीं, अपितु सर्वकालिक भी बना सकता है।

0 आपका परिवार वृंदावन के मंदिरों की परंपरा से जु़ड़ा है।  आज मंदिरों की पारम्परिक सांझी कला लगभग विलुप्त सी होती जा रही है और नई पीढ़ी के कलाकार इसमें अपना भविष्य नहीं देखते हैं, आप क्या कहना चाहेंगे?

-ये सच है, आज पारम्परिक सांझी का निर्माण अत्यधिक श्रमसाध्य होने के फलस्वरूप वर्तमान में ये कला देश में केवल कुछ मंदिरों तक ही सीमित रह गयी है। वृन्दावन में हमारे मंदिर की सांझी कला को आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की बेहतरीन कला भी माना जाता है जो कि ठाकुरजी की अष्टयाम वार्षिक सेवा का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसे हमारे परिवार की सोलहवीं पीढ़ी न केवल पारंपरिक सांझी के सिद्धांतों के अनुसार कर रही है बल्कि इसकी प्रस्तुति में कला की समसामयिकता का समावेश भी अनुपम है जिसके कारण देश विदेश से आए शोधकर्ता एवं कलामर्मज्ञ इसको देखे, समझे और लिखे बिना अपनी कला यात्रा को पूर्ण नहीं मानते।

0क्या जयपुर आर्ट समिट का स्वरूप बदल गया है क्योंकि समिट में कुछ व्यवधान दिखाई दे रहा है?

-जहां तक परिवर्तन की बात है तो प्रकृति हो या कला दोनों में ही ये सृष्टि का शाश्वत सत्य है। परिवर्तनों को जीवन की दृष्टि से स्वीकार करने की प्रक्रिया ही समसामयिकता और आधुनिकता कहलाती है, कला इससे कैसे भी अछूती नहीं है क्योंकि कला सृजन और कलाकार का उद्देश्य कहीं न कहीं विकास और प्रगति को प्रकट करना है। ऐसे में कला को विश्वस्तर पर प्रोत्साहित करने वाला मंच अतीत की लकीर पर चलती हुई कोई रेखा नहीं बन सकता। कला और कलाकार की अनगिनत असीम संभावनाओं और जीवंत भावनाओं से भरी महत्वाकांक्षाओं को और गति देने के लिए ही जयपुर आर्ट समिट ने अपनी मेट्रो संस्करण और बिनाले की योजना बनाई है।समिट के मेट्रो संस्करण का उद्देश्य भारतीय और विदेशी कलाकारों की बेहतरीन चुनिंदा कलाकृतियों को प्रस्तुत करके उस शहर के कलाकारों, कला प्रेमियों और उत्साही लोगों के लिए एक तटस्थ मंच तैयार करना है, जो सीमाओं से परे कला को बढ़ावा देने के लिए कलाकारों, इतिहासकारों, कला आलोचकों, संस्थानों और प्रमोटरों को कला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक मंच पर जोड़कर चलता है।  जयपुर आर्ट समिट के प्री-बिनाले संस्करण में हम लोककला, जनजातीय और अन्य कई प्राचीन कलाओं एवं परंपराओं के कलाकारों और उनके तत्काल प्रशिक्षुओं के प्रदर्शन को सम्मिलित कर रहे हैं। ताकि इन परंपराओं के धीरे-धीरे समाप्त से हो रहे अस्तित्व को बचाया और पुनर्जीवित किया जा सके। बिनाले का मुख्य उद्देश्य ऐसी ही कलाओं का प्रदर्शन, चर्चा-संवाद, विचारों के आदान-प्रदान और कार्यशालाओं की प्रक्रिया के माध्यम से देश के युवाओं में कला के रचनात्मक सांस्कृतिक संचार को प्रोत्साहित करना है। वर्तमान में सरकारी कला मेलों में वही पुरानी लकीर पीटते हुए आयोजनों के दिन-प्रतिदिन गिरते स्तर के दौर में जयपुर आर्ट समिट की अपनी खास विशिष्टता और कला के नए मानदंडों की अभिव्यक्ति वाले मंच के कारण ही आज देश हो या विदेश, कलाकार का चाहे कोई भी माध्यम क्यों न हो, वह अपने सृजन और प्रयोगधर्मी रचनात्मकता के साथ अपने भविष्य के सपने को साकार करने के लिए समिट से जुड़ने के लिए जागरूक दिखाई देता है।

0 अपने अनुभव के आधार पर आप कला के क्षेत्र की नई पीढ़ी को क्या सन्देश देना चाहेंगे ?

-आजकल हम एक भेड़ चाल में चल रहे हैं। अगर हम अपने आसपास नज़र डालें तो सोसाइटी में हर दूसरे व्यक्ति का एक तकिया कलाम है – एक अच्छी डिग्री पर नौकरी को ही सलाम है। यह बात मैं अपने ऊपर भी लेता हूँ क्योंकि मैंने भी 25 वर्षो तक नौकरी की है। कला के क्षेत्र में जो युवा कार्य कर रहे हैं अथवा अपना भविष्य देखते हैं, मैं उनसे यही कहना चाहूंगा कि वे सबसे पहले अपने अन्तर्मन से बात करें कि आपको कला का कौन-सा आसमान चाहिए। यहां मेरा मानना है कि आप जितना अपनी भावनाओ की क़द्र कर पाएंगे, उतनी ही अच्छी कला का सृजन करने में सक्षम होंगे क्योंकि व्यक्तित्व के विकास से ही हम कला और संस्कृति को नए आयाम दे पाएंगे।

(नादरंग-4 से)

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