जैसे स्थिर पानी में मारा गया हो कंकड़

‘नादरंग-4’ के सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे आलेखों, साक्षात्कारों पर हमें व्यापक प्रतिक्रिया मिल रही है। इनमें से चुनिंदा टिप्पणियां हम यहां साझा कर रहे हैं-


ईमानदारी से नहीं लिखा गया संगीत का इतिहास

(विजय शंकर मिश्र से प्रख्यात शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायक राजन-साजन मिश्र की बातचीत) 

काशी, वाराणसी, अविमुक्त, आनन्द कानन एवं महाश्मशान- आधुनिक बनारस के ये 5 प्राचीन नाम- इसकी 5 भिन्न विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। डा. काणे ने हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में लिखा है कि काशी रोम, येरुशेलम और मक्का से भी प्राचीन तथा पवित्र है। सिस्टर निवेदिता ने इसे वैटिकन सिटी से हजार गुना पवित्र लिखा है। संगीतेश्वर महादेव का क्रीड़ांगन होने के कारण यह स्वाभाविक भी है और अनिवार्य भी कि बनारस और संगीत का संबंध अनन्य, अभिन्न और अटूट है। तभी तो इसे न केवल भारत की सांस्कृतिक और सांगीतिक राजधानी, बल्कि इसे संगीत की जननी भी कहा गया है। बौद्ध ग्रंथों में बनारस के सांगीतिक महत्व का उल्लेख बार-बार हुआ है। गुत्तिल जातक कथा के अनुसार भी संगीत विद्या का एक प्रमुख केंद्र बनारस था। यहां वीणा वादन की प्रतियोगिताएं होती थीं।  …..

बनारस के कलाकार नगर से ज्यादा बाहर नहीं निकले

विजय राघव पंत (संगीतप्रेमी, लेखक, सेवानिवृत्त आईपीएस )

ये सच है कि बनारसी गायक और वादक बनारस छोड़कर तो कहीं ज्यादा निकले नहीं। अधिक से अधिक नेपालराज या बिहार, बंगाल और मध्यप्रदेश की निकटवर्ती रियासतों और ज़मींदारियों में प्रश्रय प्राप्त किया ।फिर हिंदू और मुस्लिम संगीतकारों का उन्नीसवींं सदी के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अलग-अलग भौगोलिक प्रभाव क्षेत्रों में सीमित रहना भी कदाचित संगीत के इतिहास के एकतरफा होने का कारण रहा हो। पूजापद्धति तथा खानपान के कठोर नियमों में बंधे होने के परिणामस्वरूप बनारस के इन कथक ब्राह्मणों का अपनी काशी नगरी के पश्चिम या दक्षिण की ओर बहुत कम आना जाना रहता था, जबकि इन्हीं नियमों में मुसलमान संगीतकारों द्वारा उपभोग की जाने वाली नम्यता उन्हें पूरे मध्यभारत, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में गतिशील रखती थी और वहां संगीत में उनके योगदान को अधिक लोक-प्रसिद्धि मिली।

अच्छे कलाकार होने पर भी नौकरियां नहीं दी गईं

मीता पंडित (प्रसिद्ध शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायिका)

मैंने अपनी किताब ‘India’s heritage of Gharana music : Pandit’s of gwalior’ में इस विषय पर पूरा chapter केंद्रित किया है। वचरात्मक मतभेद…।  पिता जी की किताब पर भी इसका अध्याय है। also given proof, of how much Bhatkhande and his group made it difficult for even survival of Pandit jis disciples, by not even giving them jobs !! Even when they were v good performers ..


एकमत से सच जाना जाए

रविचन्द्र गोस्वामी ( सेवानिवृत्त संगीत सर्वेक्षक -उप्र संगीत नाटक अकादमी) 


समय की मांग है, विभिन्न सीनियर कलाकारों द्वारा एकमत से सच को जाना जाए।

मुख्यधारा के रंगमंच का असली चेहरा

राजेश कुमार

रंगमंच के विभिन्न प्रकारों की चर्चा होती है तो संस्कृत रंगमंच, ग्रीक रंगमंच, पाश्चात्य रंगमंच, पारसी रंगमंच, मनोशारीरिक रंगमंच, यथार्थवादी रंगमंच, तीसरा रंगमंच जैसे  नाम तत्काल स्मरण में आते हैं। लेकिन इनदिनों रंगमंच के गलियारों से एक नया नाम दबे – फुसफुसे रूप में सुनने को मिल रहा है जो न रंगमंच के किसी ग्रंथों, किताबों के पन्नों में दिखाई देता है, न रंग आलोचना – समालोचना के किसी कोने या सरकारी नाट्य संस्थानों के किसी गलियारे – चबूतरों के इर्द – गिर्द। संभव है कि आप इस रंगमंच से इतेफाक न रखे। लेकिन यह जो रंगमंच है, उसका अपना एक तर्क, आधार है। … 

स्थिर पानी में कंकड़ फेंकने जैसा लेख

राधेश्याम सोनी(सचिव-दर्पण)

ये लेख स्थिर पानी में कंकड़ फेंक कर तूफ़ान जैसा उत्पन्न करने प्रयास है। ब्राह्मणवाद की अवधारणा को रंगमंच पर भी थोपने जैसा है। हम जो कर रहे हैं वहीं श्रेष्ठ है, वही मानक है। हम जो बोल रहे हैं वही सच है- ऐसा सोचने वाले स्वप्नजीवी होते है. रंगमंच वही श्रेष्ठ है जिसे दर्शक पसंद करें। वरना अपना श्रेष्ठ रंगकर्म, बिना दर्शकों के प्रेक्षागृह में करके, अनुदान लेने हेतु अख़बारों की कतरने इकट्ठा करते रहिए। रंगकर्म को अगर खानों में बांटना ही है तो तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है। पहला जो रंगकर्म रोजी रोटी के लिए किया जा रहा है वह लोकप्रिय विषयों पर होगा, दूसरा जो शौकिया रंगमंच कर रहे है वे भी चाहते है कि उनके रंगकर्म को सराहा जाय इसके लिए वे प्रयोगात्मक नाटक भी करते हैं और जोखिम भी उठाते हैं।तीसरी तरह का रंगकर्म वह है जो किसी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है और उनके मास्टर्स ही उसे वित्त पोषित करते है। इस तरह का रंगकर्म उनके लिये एक साधन है साध्य नहीं. रंगकर्म के उत्थान, कला और संस्कृति के विकास से, रंगकर्म में अपना भविष्य देखने वाले कलाकारों से उसका दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं।-

लाजवाब आलेख

पद्मा गिडवानी(वरिष्ठ गायिका)

नादरंग के रंगमंच पर आधारित आलेख आज पूरे किए। थोड़ा थोड़ा करके पढ़ पाती हूं। इनमें से कुछ नाटककारों द्वारा निर्देशित किए हुए रोचक एवं सामयिक नाटक देखे हैं। लाजवाब आलेख हैं। जानकारियों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

एक तरफ दलित रंगमंच तो दूसरी ओर ब्राह्मण रंगमंच

(राकेश जेटली,सेवानिवृत्त जनसम्पर्क अधिकारी-एनटीपीसी)

एक तरफ दलित रंगमंच दूसरी और ब्राह्मण रंगमंच। आजकल चर्चित होने के लिए कोई कुछ भी लिख सकता है, बोल सकता है।

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