कहे में जो है अनकहा

नादरंग-4 (संपादकीय)

शब्दों की अपनी सीमाएं हैं। कई अनुभूतियां ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्त करते हुए लगता है कि शब्द कम पड़ रहे हैं या उनके अर्थों में इतनी सामर्थ्य नहीं है जो सटीक वर्णन कर सकें। एक अधूरेपन का बोध होता है, लगता है जैसे ये अनुभूतियां शब्दों के कोश की पकड़ से परे हैं। मराठी कवि मंगेश पाडगांवकर ने ‘शब्दावाचुन कड़ले सारे शब्दांच्या पलिकडले..’ में शब्दों से परे की बात क्या इसीलिए की थी या हिन्दी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने अपनी बेटी की हंसी का वर्णन करते हुए शायद इसीलिए लिखा था-‘आह, तू न समझेगी, तेरी उस हंसी और मेरे इन शब्दों में युगों का अन्तर है!’

अक्सर जब संगीत के बारे में लिखता हूं, किसी संगीत कार्यक्रम का वर्णन या व्याख्या करता हूं तो इस असमर्थता की हीनता परेशान करती है। किसी राग से गुजरते हुए कई बार ऐसा भी लगता है, जैसे थोड़ी देर के लिए आप सबकुछ भूल बैठे हों, स्वरलहरियों के पंखों पर आप न जाने कहां निकल पड़ते हैं और जब लौटते हैं, उसे कागज पर उतारना चाहते हैं, दूसरों को बताना चाहते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कहे में बहुत कुछ अनकहा रह गया हो। अपनी चर्चित पुस्तक संगीत कक्ष (म्यूजिक रूम) में नमिता देवीदयाल लिखती हैं, ‘मुझे यह बोध होने लगा था, बहुत हल्के-हल्के ढंग से, कि इस संगीत की जड़ें आकाश में थीं और यह कि जो लोग उसके दायरे में दाखिल होते और उसकी सुरा का पान करते, वे आम तौर पर इस मर्त्यलोक से कुछ इंच ऊपर तैरते रहते।’

अक्सर शास्त्रीय संगीत के सुरों का श्रवण करते हुए मैंने अनुभव किया है कि कहीं कुछ ऐसा होता है कि हम अचानक चेतन से अवचेतन की ओर चले जाते हैं। और यह सिद्धि बड़ी और सच्ची साधना से आती होगी कि सुरों को साधते हुए न सिर्फ आप, बल्कि श्रोता को भी अपने साथ उस एक अलग दुनिया में ले जा सकें। उस्ताद अमीर खान हों, मल्लिकार्जुन मंसूर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान या किशोरी अमोनकर या तमाम दूसरे कलाकार अपने सुरों में ऐसी तासीर ला सके। संगीत जगत में कलाकार इसे दैवीय वरदान ही मानते हैं।  तानसेन और अकबर का एक किस्सा मशहूर है, जब अकबर के तानसेन से ये पूछने पर कि आपसे भी बड़ा गायक कौन है, तानसेन अकबर को अपने गुरु स्वामी हरिदास के पास ले गए थे। अकबर स्वामी हरिदास का संगीत सुनकर मुग्ध रह गए थे और जब उन्होंने इसकी वजह पूछी थी तो तानसेन ने कहा था कि मैं आपके लिए गाता हूं और मेरे गुरु ईश्वर के लिए गाते हैं।

प्रसिद्ध किशन महाराज अपने घर में अक्सर संगीत की बैठकें किया करते और जब किसी कलाकार से खुश होते तो कहते, ‘इसके संगीत में रूह है।’ संगीत का तकनीकी रूप से श्रेष्ठ होना या नियमित अभ्यास से उसमें कौशल प्राप्त कर लेना एक अलग बात है लेकिन उसमें रूह होना एक अलग बात है। संगीत की आत्मा, सुरों की आत्मा का साक्षात्कार करना और कराना, यह हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता, कलाकार तो बहुत सारे लोग हो जाते हैं। और हम इसकी अनुभूति तो कर लेते हैं लेकिन वर्णन कैसे कर सकते हैं?

शास्त्रीय संगीत का एक व्याकरण हैं, चलन है, तकनीक है लेकिन सुरों की आत्मा के लिए यह अनिवार्यता भी नहीं। बेगम अख्तर या मेहंदी हसन की गजलें हमें संगीत की इस रूह का साक्षात्कार कराती हैं और इसकी वजह शास्त्रीय संगीत से उसकी निकटता में तलाशी जा सकती है। दोनो ही कलाकारों की शास्त्रीय संगीत में गहरी दखल थी और मेहंदी हसन तो अक्सर रागों और उसकी खूबियों का वर्णन करते चलते थे। लेकिन अक्सर ऐसा भी होता है कि हम लोकसंगीत में भी कुछ इसी तरह डूब जाते हैं। पहाड़ का लोकसंगीत, भोजपुरी या अवधी का कोई लोकगीत, राजस्थान का कोई मांड भी हमें कई बार संगीत की उन्हीं ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम हो जाता है और उसके लिए शास्त्रीय संगीत के व्याकरण या तकनीक की आवश्यकता नहीं होती। हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जब शास्त्रीय संगीत के किसी प्रयोगशील कलाकार ने लोकसंगीत का उपयोग कर अपनी कला को बेहतर बनाया है लेकिन अगर इसके उलट हो तो? वास्तव में शास्त्रीय संगीत या दूसरी कलाएं जब लोकतत्वों का इस्तेमाल करती हैं तो वे उसे जज्ब कर लेती हैं, अपने भीतर समाहित करती चलती हैं लेकिन जब कोई शास्त्रीय संगीत सीखा हुआ कलाकार लोकसंगीत की दुनिया में आता है तो उसे लोकसंगीत की भाषा में ही रमना पड़ता है, तभी वह उसमें बेहतर प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। वह शास्त्रीय संगीत की बैसाखियों से लोकसंगीत की यात्रा नहीं कर सकता। लोकसंगीत की खूबसरती शास्त्रीयता से खुद को बचा ले जाने में हैं। यह तो उसके खुरदुरेपन, उसके अनगढ़ स्वरुप और शास्त्र से उसकी दूरी में है। उसकी जड़ें अपनी जमीन में अधिक गहराई से जुड़ी होती हैं, उसे उधार के पंख की जरूरत नहीं होती बल्कि जब ऐसा होता है तो वह अपनी उड़ान भूल जाता है!

-आलोक पराड़कर

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