कला देखने के दरमियान

अमित कल्ला

सारे द्वार /खोलकर /बाहर निकल /आया हूं /यह /मेरे भीतर /प्रवेश का /पहला कदम है

जैन मुनिश्री क्षमासागर की यह सरल-सी कविता मुझे भी अपने भीतर प्रवेश करने का अनुनय करती दीखती है और मैं अपने मन के बहुतेरे द्वार खोलकर किन्हीं चित्रों को देखने कि कोशिश करता हूं, जहां बहुत सारी मूर्त-अमूर्त आकृतियां नई रोशनी लिए भीतर उतरने को उभर आयी हैं।
गाहे-बगाहे हमारे द्वारा कुछ भी देखा जाना मौटे तौर पर किसी सहज वृति का ही नाम है, दरअसल जो एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे चाहे-अनचाहे हमें गुज़ारना ही होता है, अनादिकाल से जो निरंतर चलती आ रही, किसी लम्बी यात्रा के मुकम्मल मुकाम जैसी है। जहां आंखे हैं तो देखना बदस्तूर उसकी नियति मान लिया गया है। हमसे पहले भी लोगों ने इस संसार को बड़ी शिद्दत और सदाकत के साथ देखा होगा और हमारे बाद भी आने वाली पीढियां अपनी-अपनी नजरों से बहुत कुछ देखेंगी | मनुष्य की चेतना के क्रमतर विकास के साथ जिस प्रक्रियारूपी कुछ अनमना देखे जाने के स्वर ने लगातार नए आयाम भी पाए हैं, देश-दुनिया की नई पुरानी तमाम सभ्यताओं ने देखने के इन मायनों पर वैचारिकता के साथ बहुत गहरा अध्ययन किया है। शायद उन्होंने समय रहते उसकी असल संकल्पना को उनके भावार्थों के साथ जान लिया होगा, लिहाजा जिसका नेरेटिव अपने आप में एक भरीपूरी परंपरा और पुख्ता संस्कारों के रूप में हमारे सामने आता है | भारतीय उपमहाद्वीप में देखना सबसे महत्वपूर्ण अनुभवों में शुमार है जिसे गौतम के न्याय दर्शन में अनुमित की संज्ञा दी गई है, जो प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द के माध्यम से ज्ञान को पाने का एक सरल रास्ता है। लिहाजा जिसे देखने में समूची संधानात्मक प्रक्रिया निहित होती है, वास्तव में जो एक बड़ा मसौदा भी है, जिसका सीधा ताल्लुक और तादात्म्य हमारे अंत:करण से जुड़ता हुआ महसूस होता है, संभवत: जो बाहर से ज्यादा अपने ही मन के भीतर उतरने की ओर इशारा है |  वस्तुत: हमारे सारे उपनिषद देखने के इसी भाव पर आधारित हैं, जहां ऋषियों को दृष्टा कहा गया है जिसका पैमाना बहुत विस्तृत है। फिलोसोफी के लिए निर्धारित दर्शन शब्द अपने आप में उस वृहद् विचार को बतलाने वाला अंग है, जिसके अंतर्गत ज्ञान और विवेक दोनों ही तत्व रूप में तब्दील होकर दृश्यसंवाद रचते हैं | केन उपनिषद का प्रथम खंड भिन्नतर इन्द्रियों के संवृत स्वभाव और उनके बीच घटित होने वाले संभाव्य आवर्तन को बेहद खूबसूरती के साथ बयान करता है | शंकराचार्य भी दृग और दृश्य के बीच होने वाले उस गहन संवाद के सम्बन्ध में अपना मत रखते हैं जो दुनिया में इमेज के ट्रांसफॉर्म होते स्वरूप पर अपने तरीके की अनूठी टिप्पणी है। 12 वीं शताब्दी के मध्य भारती तीर्थ दृग दृश्य विवेक में जहां दृश्य के चित्त में रूपांतरण होने की अद्भुत व्याख्या करते हैं वहीं पतंजलि के योगसूत्र में वर्णित धारणा में उसके अंग-प्रत्यंग आभासित होते हैं, जो समाधि की तरफ लेकर जाने वाला मार्ग है, अवधान जिसकी अंतिम उपलब्धि है, नाथ और सिद्ध परंपरा में भी जिसकी आमूलचूल सिफारिश की गई है | समय के साथ अप्पार, सूर ज्ञानेश्वर जैसे भक्तिकाल के संत कवि, नानक और बाबा फरीद सरीखे सूफी फकीर से लेकर कबीर तक इन नैनों कि प्रासंगिकता को बतलाते हुए उनमें उभरती छवि के मार्फत उस परम तत्व का अपनी अरदास में दीदार करते नहीं थकते, जहां निराकार शब्द से मूर्त साकार स्वरूप को देखने का आशय हमेशा गहराता है |
आज के समय में जब भी किसी पेंटिंग को अकादमिक रूप से देखने की बात होती है तब हमें जॉन बर्जर याद आते हैं, जो 70 के दशक में लिखी गयी अपनी किताब ‘वेज ऑफ सीइंग’ के लिए खासे चर्चा में रहे, बीबीसी ने कभी जिसे एक शृंखला के रूप में प्रसारित भी किया था। उनके अनुसार देखना, शब्दों से पहले आता है, शिशु बोलना प्रारंभ करने से पहले देखता और पहचानता है। बर्जर ने जिसमें कला के इतिहास को आधार बना कर परत दर परत विश्व की प्रसिद्ध पेंटिंग्स को सामने रखकर उनके सामाजिक और मनोविज्ञानिक पक्षों को बेहद आलिम अंदाज में खोला है | वहीं भोपाल में रहने वाले अमूर्तन चित्रकार अखिलेश के लिए किसी भी चित्र को देखा जाना एक वृहद् अनुभव से गुजरने जैसा है, जहां उनकी अपनी किताब ‘देखना’ जो अपने आप में इस विषय पर कई सवाल खड़े करती है और पेंटिंग्स की इस रूप और अरूपमयी दुनिया के बारे में पाठक को गहरे तक सोचने को मजबूर करती है। उनके लिए चित्र को देखना हमेशा एक महत्वपूर्ण और रचनात्मक कर्म के साथ एक किस्म के अनुशासन का हिस्सा रहा है | वहीं हमारे समय के प्रबुद्ध कवि और चिन्तक  उदयन वाजपेयी किसी भी पेंटिंग को देखने के दरमियान कुछ देर ठहरना बेहद जरूरी मानते है जो आज की इस दौड़ती-भागती दुनिया में आम तौर पर बमुश्किल ही दिखता है। वे विदेशी लेखकों का उद्धरण देते हुए अक्सर बताया करते हैं कि किसी भी कलाकृति से मुखातिब होने से पूर्व हमें अपने पूर्वाग्रह और अविश्वासों को स्थगित करना चाहिए। तभी शायद किसी आर्ट फॉर्म के साथ एक सार्थक संवाद संभव हो सकता है | इस स्थगन के कई पक्ष हैं जो किसी विशेष अवस्था की और हमें धकेलते हैं जहां समय से बहुत कुछ पीछे छूटता है और नया अनुभव हमें आगे को खींचता भी है |
देश के नामी अमूर्तन चित्रकार प्रभाकर कोलते से जब एक अच्छे चित्र की परिभाषा के बारे पूछा जाता है, तब इस सन्दर्भ में वे पेंटिंग को देखने का मर्म भी बतलाते हैं। वे कहते हैं कि पेंटिंग खुद-ब-खुद आपसे बात करने लगती है बशर्त है कि आप भार मुक्त होकर उसके पास जाएं। उनके लिए किसी भी चित्र को देखना एक ईश्वरीय दर्शन-सी प्रक्रिया है जिसके कई आयाम हैं जो वैविध्यता से भरे रूपाकारों से गुजारती हुई आपको सहज अवस्था तक ले जाए, जिसे देखने पर स्वयं को प्रकृति का अन्तरंग हिस्सा होने का बोध हो। उनके लिए तन्मय होकर चित्र को देखना आत्मस्वरूप की प्रतीति होने जैसा अनुभव है |

वैसे पेंटिंग को देखने का दुनिया में कोई एक सूत्र, फार्मूला या उसकी शब्दावली नहीं है, अमूमन उसका आस्वादन तो व्यैक्तिक अनुभव और विभिन्न भावों की निष्पत्ति के आधार पर किया जाता है। उसे कैसे देखा समझा जाए इस मुद्दे पर समकालीन कला के परिदृश्य में काफी बहस भी होती है, अलग-अलग जानकारों ने अपनी-अपनी समझ से उसे अभिव्यक्त किया है जो प्रचुर संभावनाओं के सौन्दर्य से भरा विमर्श है | मुझे लगता है कि किसी भी पेंटिंग को देखने के लिए निश्चित तौर पर मन को एक लम्बी तैयारी की जरूरत तो होती है, अभ्यास के जहां उसके अपने अर्थ हैं, जो लाजमी-सी बात भी है। जहां कलाओं के अन्य आयामों का जीवन में उपस्थित होना भी किसी उजाले जैसा है, जिसके साक्षी हुए बगैर उसके मर्म को हुबहू पा लेना बहुत कठिन मालूम पड़ता है, क्योंकि कलाओं के विभिन्न रूपक बड़ी ही सघनता से एक दूसरे से जुड़े होते है। उनके बीच परोक्ष-अपरोक्ष नैसर्गिक अंतर्संबंध व्याप्त है | वहीं उनके मूल में उपस्थित चिर संगीत से निपजी सनातन लय तत्व का स्वभाव भी एक सरीखा है। कलाओं का अपना रहस्यवाद और उनकी अपनी सामाजिकी भी होती है। लिहाजा समस्त पूर्वाग्रहों से उभरकर ही जिसका विश्लेषण किया जाना, किसी चित्र को समझने की आवश्यक शर्त है | वास्तव में इस पूरे क्रम को एकीकृत रूप में समझा जाना चाहिए, इस नजर से देखने पर मुझे रायनर मारिया रिल्के द्वारा युवा कवि को लिखे पत्र और विन्सेंट वैन गो और उनके भाई थियो के बीच हुए उत्कट संवाद भी याद आते हैं जहां भीतर के एकांत को शांत और स्थिर होकर विस्तार में तब्दील करने की आधारभूत प्रेरणा छिपी है, जहां हडबडी-भरे मन को एकाग्र करने का अद्भुत आग्रह है और भौतिक समय से निजात पाकर किसी समदर्शी भाव के उस साथ सह-अस्तित्व को यथासंभव तलाशने की जुम्बिश है |सही अर्थों में चित्र को देखना सीखने के इस कर्म में, कई-कई स्तरों पर बहुत सूक्ष्म रूप में बेहद धीमी गति से अपने ही भीतर उतरना होता है, जिसका किसी विषय को जानने से बड़ा सरोकार है। सिलसिलेवार जहां सचेतन अनुभव, प्रयोग और परोक्ष रूप से उनमें व्याप्त असंख्य संभावनाओं को तलाशा जा सके, मनोविज्ञान से सम्बंधित अभिज्ञान जहां एक अहम् भूमिका निभाता है, जिसके वाबस्ता सिलसिलेवार कोई इमेज अपनी लय के साथ चित्त में आत्मवत्ता बरतती है। लिहाजा चित्र एक दृश्यमान चित्त ही तो है !

( नादरंग-4 से)

आवरण चित्र-प्रसिद्ध चित्रकार विन्सेंट वैन गो का चित्र, साभार-इंटरनेट

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2 Thoughts to “कला देखने के दरमियान”

  1. मृदुला भारद्वाज

    अमित कल्ला के लेख ने कला को समझने की एक नई समझ दी बहुत ही सुंदर लेख है, अमित जी को और आलोकजी आप दोनों लोगों को बहुत बहुत बधाई, इस संकट के समय मे ऐसा साहित्य बहुत भीतर तक जाता है।

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