कला की कसौटियों पर राजा रवि वर्मा

 
पंकज तिवारी 

लोगों को देवी-देवताओं के सम्मोहक चित्रों से परिचित करवाने वाले कलाकार थे राजा रवि वर्मा। इनके द्वारा ही मुंबई में लीथोग्राफ प्रेस की स्थापना (1894) की गई, फलत: अधिक और सस्ते चित्रों का निर्माण होने से देश के अधिकतर घरों में इनके चित्रों की पहुंच हुई। राजा रवि वर्मा के चित्रों में लोगों को अपने भगवान नजर आये और उनकी पूजा भी हुई। अपने चित्रों के विषय और सजीवता के बल पर ही रवि वर्मा भारतीय जनमानस के दिलों पर राज करने लगे थे। कहना गलत न होगा कि रवि वर्मा जन-जन के चित्रकार हो गए थे। हालांकि विरोध हुआ, बहुत विरोध हुआ। अच्छे कार्यों का विरोध होता भी है,उनका भी हुआ लेकिन वह हारे नहीं चलते रहे। कला समीक्षक फ्रॅक नोरिस के शब्द, ‘जो कला अंत में लोगों द्वारा स्वीकृत नहीं होती वह जीवित नहीं रहती’ सार्थक-सा हुआ जान पड़ता है क्योंकि समीक्षकों द्वारा नकारे गए चित्रकार रवि वर्मा लोगों द्वारा स्वीकृत हुए फलत: उनकी कला आज भी जीवित है और हमेशा ही जीवित रहेगी।

(राजा रवि वर्मा, चित्रः पूनम कन्नौजिया)


समय शायद 1862 का रहा होगा। बालक रवि वर्मा के चाचा राजा वर्मा राज भवन की दीवारों पर तंजौर शैली में चित्र बना रहे थे । अचानक उन्हें कुछ विशेष कारण से थोड़ी देर के लिए बाहर जाना पड़ा। एकांत पाकर अंतस के प्रबल भावों के बल पर बालक रवि वर्मा, जो मात्र 14 वर्ष का था, बेखौफ, निडर हो चित्र में रंग भरना शुरू कर दिया। साथ ही बचे हुए रेखा कार्यों को भी पूरा कर दिया, जो एक आश्चर्य जनक बात थी। वापस आने पर चित्र देखते ही राजा वर्मा आश्चर्य से भाव विभोर हो उठे। उनके मन में बालक रवि वर्मा को लेकर उम्मीदों का एक पहाड़ उभर आया और मन ही मन वे रवि वर्मा को भविष्य का महान चित्रकार मान बैठे, जो आगे चलकर शत-प्रतिशत खरा सिद्ध हुआ, जिसके लिए उनके चाचा हमेशा ही रवि वर्मा के साथ खड़े रहे। उनके प्रयासों के बल पर ही उनको त्रावनकोर के महाराजा से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रतिफल ये हुआ कि दरबारी चित्रकार रामास्वामी नायडू द्वारा इन्हें जलरंग की बारीकियां समझाने का मौका मिला। जल्द ही वे जलरंग में दक्षता हासिल करने में भी सफल रहे। कला के प्रति रवि वर्मा की ललक और तीव्र पकड़ को देखकर रामास्वामी नायडू तथा ब्रिटिश शबीह चित्रकार थियोडोर जाॅनसन दोनों ने रवि वर्मा को तैल रंग में प्रशिक्षण देनें से साफ मना कर दिया। हां, जाॅनसन की तरफ से बस इतनी अनुमति थी कि पूर्ण हुए चित्र को बालक निहार सकता है। उसका कथन था कि चित्र निर्माण प्रक्रिया के समय वे अपने आसपास किसी को भी नहीं रहने देता। ध्यान भंग की खाल ओढ़कर उसने खुद को इस प्रक्रिया से अलग कर लिया था। बावजूद इसके अधिकतर लोगों का मानना था कि रवि वर्मा को तैल रंग की शिक्षा थियोडोर जाॅनसन से ही मिली। मामला संशयग्रस्त है।
जाॅनसन ने खुद को बचाने का यह कदम ईर्ष्यावश उठाया या रवि वर्मा के आगे भविष्य में उसे अपनी जमीन खिसकती नजर आई यह कह पाना मुश्किल है पर एक बात तो साफ है कि मुश्किल हालात के बाद ही खुशनुमा प्रभात का आनंद है। अतः मुश्किल घड़ी में भी हाथ पैर मारना बंद नहीं करना चाहिए। युवा रवि वर्मा ने भी यही किया और मालाबार स्कूल ऑफ पेंटिंग में भी दाखिला के प्रयास में जा लगे लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी। अब तक अपने अथक प्रयासों और लगातार निराश होने के चलते मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगे थे रवि वर्मा, पर चित्रकला में नवीन सृजन में निरंतरता बनी रही। इस बीच भी इनके चित्र लगातार बनते रहे और एकाग्रचित मन के प्रयासों का फल तथा महाराजा के सहयोग से पाश्चात्य कला चित्रों पर प्राप्त कुछ चित्रकला संबंधित पुस्तकों के चित्रों को देखकर, गहन अध्ययन कर ये चित्रों की बारीकियों को पकड़ पाए और प्रयत्न के बल पर ही खुद एक संस्थान बन बैठे। देखते ही देखते इनके चित्र अंतरराष्ट्रीय कला प्रदर्शनियों में भी सराहे जाने लगे और स्वर्ण पदक हासिल करने में सफल रहे। स्थानीय शैलियों का भी उन्होंने अध्ययन किया, परिचित चेहरों में दिव्यता भर कर वही रूप देवी देवताओं के हेतु प्रयोग किया। उनके अधिकतर चित्रों में सुगंधा है जिसको लेकर रवि वर्मा के बारे में तरह-तरह की बातें हवा हुई थी और जिसकी वजह से वर्मा जी को कई जगह घेरा भी गया। चित्र सीता हरण में उन्होंने सीता के रुप में अपनी पोती की छवि को अंकित किया है।


अब तक उनके काम का सिलसिला जोर पकड़ चुका था पर भटकन भी कम न थी,विषय को लेकर ऊहापोह जैसा वातावरण विद्यमान था। उनका मॉडल उनके आसपास से ही होता था।वह एक ऐसे कलाकार थे, जो कैनवास पर आयल कलर में काम करने वाले पहले भारतीय कलाकार बनें। भारतीय कला जगत में, तैल रंगीय यथार्थता को लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। यूरोपीय यथार्थवादी शैली को भारतीय रुप में प्रस्तुत कर देना धीरे-धीरे उनके लिए आसान होता गया। इनके चित्रों में शबीह चित्र, सामाजिक संदर्भों युक्त चित्र और जग जाहिर धार्मिक चित्र प्रमुख थे। राष्ट्रीयता सम्बन्धी इनके चित्रों से अंग्रेज भी खार खाए हुए थे। बाल गंगाधर तिलक, रानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे जननायकों के चित्र बनाकर वर्मा जी लोगों मे देशप्रेम की भावना को भी उजागर करने में सफल हुए और आंदोलनकारी लोगों के बीच भी सम्मानीय बन गए। साथ ही महंगे कलाकार भी। शबीह चित्र बनवाने के लिए लोग इनकी हामी का इंतजार किया करते थे। आगे चलकर उन्हें एशिया का रेम्ब्रा भी कहा जानें लगा।रेखांकन और अपने चित्रों को महान बनाने के लिए, चित्रों में जीवंतता लाने के लिए, चित्रों में सजीवता लाने के लिए रवि वर्मा ने अनेक शास्त्रीय ग्रंथों का अध्ययन किया। वेद-पुराण, उपनिषद, चित्रसूत्र, नाटक, साहित्य तथा अपने छोटे भाई के साथ विभिन्न स्थानों पर जाकर रहन-सहन, वेशभूषा, समाज पर नाटक मंडलियों के प्रभाव का गहन अध्ययन करने के बाद अपने चित्रों का रूप, अपने चित्रों का रंग, अपने चित्रों की पृष्ठभूमि, अपने चित्रों के भाव-भंगिमा-यह सारे गुण वे अपने अध्ययन से ही सम्भव कर पाए और यही सारा अध्ययन उनकी अपनी विशेषता बन कर उभरी, जिसके फलस्वरूप उनके मस्तिष्क पर चरित्र को लेकर शास्त्रीयतापरक भावनाएं पनप सकीं। कहा जाता है कि यात्रा के बाद उनके चित्रों में पृष्ठभूमि के भी दर्शन होने लगे। हालांकि पृष्ठभूमि बनाने का कार्य उनके भाई का होता था।आम भारतीयों की निगाहों में अपने कला के जरिए रच-बस जाने वाले राजा रवि वर्मा गाहे-बगाहे समीक्षकों के अच्छे बुरे दौर से गुजरे हैं। ई.वी. हैवेल ने, जिनका योगदान भारतीय कला को अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त कराने के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण रहा, बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में, जब भारतीय युवा कलाकार विदेशी शैली, विषयवस्तु की तरफ आसानी से फिसलते जा रहे थे, उन कलाकारों को भारतीय कला थाती के प्रति प्रेम जगाकर, उन्हें भारतीय थाती के बल पर आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया और भारतीय कला जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा किये थे। उनकी गिनती उस समय के महत्त्वपूर्ण कार्यों में होती है लेकिन रवि वर्मा पर उनकी भी नजर कुछ टेढ़ी ही थी। वर्मा जी पर भारतीय काव्य की मूल भावना से हटने का आरोप लगाया है हैवेल साहब ने। हो सकता है उनके निगाह में उनको अपनी बातें सहीं प्रतीत लगती हो पर इस बात पर बहस के पहले उनके कुछ चित्रों पर गौर करने की जरूरत सी महसूस हो रही है।चित्र शकुन्तला का अपने प्रिय को देखना, देश में तैल रंग के शुरुआत का दौर, शुरुआत में ही बिना प्रशिक्षण के ही इतना मनभावन संयोजन, केश, वस्त्र, रंग, एनाटाॅमी और भावों का आपसी संतुलित सामंजस्य। बहाना पैर से कांटा निकालने का और निगाह पीछे तनिक दूर पर किसी के ऊपर एकटक आंखें उम्मीद की सागर सी जान पड़ती हैं, क्या विवाह के पूर्व राम और सीता के एक दूसरे को निहारने को लेकर जो काव्य रचे गये हैं, से कम काव्य आंका जा सकता है इस चित्र में, पृष्ठभूमि में सहयोगी जल, जमीन, जंगल खुद ही कविता कहने में सक्षम है। ऐसा प्रतीत होता है कि हैवेल के इस कथन के पीछे उनके बंगाल स्कूल और वाश पद्धति के प्रति प्रेम का असर है। हरिश्चंद्र और तारामती नामक चित्र में तारामति की व्यथित आंखों को देखकर करुण रस से युक्त पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। दुःखी शकुन्तला चित्र में भी मुख पर वेदना जैसे सब कुछ खो जाने का भान अनायास ही दीख पड़ता है।क्या हम मान सकते हैं कि मौलिकता को दिखाना कला नहीं है?  तमाम प्रश्न उठाए गए थे राजा रवि वर्मा को लेकर कि उनकी कृतियां धार्मिक है। उनकी कृतियों में किस्सा हुआ करता था, उनकी कृतियों में संस्कार हुआ करता था, उनके कृतियों में संस्कृति हुआ करती थी, उनके कृतियों में समाज हुआ करता था, उनके कृतियों के दर्शक हुआ करते थे, उनकी कृतियां लोगों के जेहन में उतर गई थी। बस समस्या यह थी कि उनकी कृतियां यथार्थ के धरातल पर थीं फलत: कला में उनके कद को लेकर विवाद हमेशा व्याप्त रहा। जीते जी भी उन्हें कई विवादों से गुजरना पड़ा। कोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़े और अपना वकील भी खुद ही बनना पड़ा। हालांकि तार्किक क्षमता के बल पर जीत भी हासिल हुई। विवाद तब भी था, विवाद आज भी है। प्रशंंसक तब भी थे,  प्रशंंसक आज भी हैं। तब रवीन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे बालेंद्र नाथ टैगोर के जैसे उनके कृतियों के प्रशंसक हुआ करते थे और आज….


25 वर्षीय युवक बिना किसी प्रशिक्षण के बियना के चित्र प्रदर्शनी में स्वर्ण पदक प्राप्त करता है, लोगों की निगाह यहीं से इनकी तरफ को मुड़ती है। इसे एक संयोग ही कहा जा सकता है कि 1873 में चेन्नई में पहली प्रदर्शनी करने वाले वर्मा जी ठीक 20 साल बाद 1893 में शिकागो में आयोजित वर्ल्ड कोलंबियन एग्जीबिशन में स्वामी विवेकानंद के आग्रह पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और लगभग 10 चित्र प्रदर्शित करते हैं। इस प्रदर्शनी की गिनती 19वीं शताब्दी की भव्यतम अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में होती है। रवि वर्मा को पुरस्कृत भी किया गया। 20 वर्षीय संयोग के बाद शतकीय संयोग भी बना और 1993 में उनके चित्रों की एक भव्य प्रदर्शनी राष्ट्रीय संग्रहालय-दिल्ली में हुई। प्रदर्शनी के बाद विरोध भी हुआ, खुले तौर पर विरोध हुआ। आधुनिक भारतीय कलाकार जो उस समय सक्रिय थे, में कुछ खुद को प्रमुख मानने वाले कलाकार राजा रवि वर्मा की इस प्रदर्शनी को लेकर कुछ ज्यादा ही विचलित थे। ऐसे कलाकार जिनका कोई योगदान ही ना हो कला में, कला को इस तरह प्रमोट करने से भारतीय कला को भला क्या फायदा पहुंच सकता है जैसे सवाल उठाने लगे। बावजूद इसके प्रदर्शनी हुई, सराही भी गई। राजा रवि वर्मा के चित्र लोगों के जेहन में आज भी जस के तस बरकरार है। प्रसिद्ध कला समीक्षक शेरमान ली की बात-‘कोई भी महान कला या धर्म जनसाधारण की समझ के परे नहीं होती और वह यदि ऐसी नहीं है तो वह असफल है’।मतलब वर्मा की कला महान भी है और सफल भी कारण, जनसाधारण के समझ में है। उनकी एक कृति 2007 में करीब सवा आठ करोड़ में बिकी, यही महानता उनकी सदा बनी रहे।
उनके प्रमुख चित्रों में लक्ष्मी, सरस्वती, भीष्म प्रतिज्ञा, राधा माधव, कृष्ण को सजाती यसोदा, द्रौपदी, गंगावतरण ,शकुंतला, श्रीकृष्ण और बलराम, सत्य हरिश्चन्द्र, दूत के रुप में कृष्ण, रावण और जटायु, कुलीन महिलाएं, भिक्षादान, दादाभाई नौरोजी, विराटा का दरबार, मां एवं बच्चा, विचारमग्न युवती, संगीत सभा, अर्जुन एवं सुभद्रा, कण्व ऋषि के आश्रम की ऋषि कन्या, हंस दमयंती, महारानी लक्ष्मी बाई, मानिनी राधा, फल लिए हुए स्त्री, वीणा बजाती हुई स्त्री, चांदनी में बैठी स्त्री, मराठी युवती, प्रेम पत्र आदि हैं। आंकर यल्लो, सीपिया तथा सैप ग्रीन का अधिक प्रयोग उनके चित्रों में दिखाई पड़ता है। उनके चित्र मद्रास तथा गुजरात जैसे जगहों पर सुरक्षित हैं।


कहते हैं कि फिल्मों के निर्माण प्रक्रिया के पीछे भी रवि वर्मा का हाथ है। दादा साहब फाल्के जो फिल्म राजा हरिश्चंद्र के निर्माता हैं, पहले वर्मा जी के साथ उनके लिथोग्राफ प्रेस में इन्ग्रेविंग का काम करते थे। वर्मा जी ने ही उनकी प्रतिभा को निखारने में मदद की। धीरे-धीरे घाटा होने लगा और अंत में प्रेस बंद हो गया। रवि वर्मा टूटने की बजाय फिर से उठ खड़े हुए। बड़े-बड़े कैनवास पर कई-कई घण्टे लगे रहते थे। कभी-कभी सन्तुष्टि की सीमा तक पहुंचने में सालों लग जाते थे, रमें रहते थे। आगे चलकर यात्राएं भी कम हो गई। लोगों के विरोध ने भी इनकी दिनचर्या को काफी प्रभावित किया। उन्होंने अन्तिम समय में अपने आपको अपनी कृतियों तक ही सीमित कर लिया था।  जब हर ओर सन्नाटा पसरा हुआ होता था, तब इनके कैनवास पर शोर-शराबा हो रहा होता था, एक नई दुनिया रची जा रही होती थी। और इसी शोर-शराबे के बीच एक दिन कलाकार रवि वर्मा हमेशा के लिए शांत हो गए। कुछ कोरे कैनवास उनके ब्रश और रंगों के साथ को तड़पते ही रह गए। रवि वर्मा, जिनको तत्कालीन वायसराय ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए राजा की उपाधि से नवाजा था, राजा की भांति ही जीवन जीते रहे और राजा की भांति ही चित्रप्रेमियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

(नादरंग 4 से)

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