उत्तर प्रदेश का रंग परिदृश्य

-आलोक पराड़कर

रात के करीब डेढ बजे थे। अमूमन इस वक्त व्हाट्स एप पर समूहों के ही यदा-कदा संदेश आते हैं लेकिन जब संदेश की ध्वनि कई बार आती गई तो मोबाइल देखना पड़ा। कई छोटे-छोटे संदेश थे। सर, आप मेरा एक काम कर दो, आप मेरे मम्मी-पापा का भी एक इंटरव्यू ले लो। लेकिन उन्हें यह नहीं पता चलना चाहिए कि मैंने आपसे कहा है। आप इंटरव्यू लेंगे तो शायद उन्हें अहसास होगा कि मैंने कोई बड़ा काम किया है।

यह सुगंधा थी। दो दिन पहले ही उससे बातचीत हुई थी। नाटककार राजेश कुमार ने उसके बारे में बताया था।लखनऊ की रहने वाली इस युवा रंगकर्मी का चयन इस वर्ष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए हुआ है लेकिन बातचीत में जब मैंने सुगंधा से ये पूछा था कि तुम क्या इधर दिल्ली से लखनऊ आ रही हो तो उसने धीमे से कहा था कि अभी मुश्किल है। अगर लखनऊ गई तो फिर एनएसडी आना नहीं हो पाएगा। फिर उसने बताया था कि कैसे वह परिवार को बिना बताए दिल्ली आई और प्रवेश प्रक्रिया में शामिल हुई। वास्तव में परिवारवालों को यह पसंद नहीं कि सुगंधा इस प्रकार नाटक करे और वह भी दिल्ली जाकर। लखनऊ में भी वह चोरी-छिपे ही अपना यह शौक पूरा कर पाती थी। सुगंधा के पिता यहां बिजली विभाग के राज्य मुख्यालय में सुरक्षा गार्ड हैं ।
उधर, सुगंधा से बातचीत से लगा कि वह कितने उत्साह से भरी हुई है। जब भी मैंने उससे बात की तो पाया कि उसके जवाब मेरी आशा से बिल्कुल भिन्न होते। उसकी बातें मौलिक हैं और कई बार उसकी बातों पर मुझे हंसी भी आ जाती। मसलन उसने बताया कि प्रवेश के दौरान उससे पुस्तकों के बारे में पूछा गया। लेकिन उसने कहा कि मैं ज्यादा पढ़ नहीं पाती हूं क्योंकि मुझे पढ़ते हुए नींद आ जाती है। उसने बताया कि पहले जब मुझे कम नींद आती थी तो किसी ने मुझे सलाह दी कि पुस्तकें पढ़ा करूं। इसके बाद से ऐसी आदत हो गई कि पढ़ना शुरू करती हूं तो नींद आनी शुरू हो जाती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकों से मेरा कोई वास्ता ही नहीं, सुगंधा ने हंसते हुए उनसे कहा था। आखिर पढ़ कर ही तो यहां तक पहुंची हूं।
मुझे विश्वास नहीं हुआ कि लखनऊ जैसे नगर में भी एेसे परिवार हो सकते हैं जो अपनी बेटी को रंगमंच करने से रोक सकते हैं। आखिर हम अपने आसपास लड़कियों को हर क्षेत्र में इतना आगे बढ़ते हुए देख रहे हैं। सुगंधा यह भी बताती भी है कि वह लखनऊ में भी चोरी- छिपे ही नाटक किया करती थी। लेकिन ऐसे मामलों में क्या केवल परिवारों के पिछड़ेपन को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। क्या इसका दूसरा पहलू भी नहीं है ?क्या रंगमंच का जो स्वप्न देखा गया था वह यही था? क्या रंगमंच और खासकर हिन्दी रंगमंच ने समाज में अपनी एेसी स्थिति बनाई है कि एक सामान्य परिवार अपनी लड़की का भविष्य उसमें देखकर सन्तुष्ट हो सके? क्या रंगमंच ने अपनी जो पहचान बनाई है वह आश्वस्तिपरक है? क्या उसकी लोगों के बीच सम्मान और प्रतिष्ठा बन सकी है? क्या समाज में नाटकों को लेकर कोई रुचि और संस्कार विकसित हो सका है?
एक ओर हम देखते हैं कि रंगमंच को सरकार से सुविधाएं बढ़ी हैं। प्रशिक्षण के बड़े-बड़े संस्थान हैं तो केन्द्र और राज्य सरकार की अकादमियां कई तरह के अनुदान भी देती हैं। रंगमंडल चलाने के लिए वेतन अनुदान मिलते हैं, नाटकों की प्रस्तुतियों के लिए अनुदान मिलते हैं। तो आखिर कमी कहां हैं? और यह भी कहा जा रहा है कि अनुदानों से रंगमंच का चेहरा भी बदल रहा है। ज्यादातर नाटकों से उनका प्रतिरोध, संघर्ष, आक्रोश, प्रतिबद्धता गायब हो रहा है।  कम ही नाटक हमें उद्वेलित कर पा रहे हैं, विचार और संवेदनशीलता कम हो रही है। लेकिन इन सबके बीच एक अच्छी बात यह भी है कि एेसी स्थितियों में भी युवाओं में इसे लेकर एक आकर्षण है। वे कई बार अपने परिवारों के विरोध के बावजूद इससे जुड़ना चाहते हैं। लखनऊ के भारतेन्दु नाट्य अकादमी में इस बार प्रवेश लेने वाले युवाओं में 20 में से 10 लड़कियां हैं।
इन्हीं सारी बातों की चर्चा में हिन्दी रंगमंच के परिदृश्य पर यह अंक निकालने की योजना बनी, खासकर उत्तर प्रदेश के रंगमंच का हालचाल लेने के लिए। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद जैसे नगरों में ही नहीं बरेली, शाहजहांपुर, आजमगढ़, मथुरा जैसे नगरों में भी अच्छा काम हो रहा है। हालांकि किसी विचार को मूर्त रूप देने में कई बार सीमाएं भी होती हैं तो इस अंक को तैयार करने में हमसे भी बहुत कुछ छूट गया है।  कोशिश यही थी कि एेसे लोग अपने नगर के रंगमंच पर आलेख तैयार करें जो रंग संस्थाओं से तटस्थ हों लेकिन बहुत सारे नगर छूट रहे हैं। शायद इस पर कभी विस्तार से सामग्री संभव हो।
मूल्यांकन के एक निकष की तलाश में तथा संगीत और रंगमंच के विभिन्न पक्षों पर लेखन को एक मंच उपलब्ध कराने के लिए ढाई वर्ष पूर्व लखनऊ के कलास्रोत फाउंडेशन के साथ कलास्रोत का आरंभ हुआ था तो उसे काफी सराहना भी मिली। अधिक स्वतंत्र होकर कार्य करने की इच्छा के साथ अब नाद रंग का प्रवेशांक आपके हाथों में है। हालांकि इस स्वतंत्रता की अपनी मुश्किलें भी हैं। लघु पत्रिकाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटा पाना हमेशा से कठिन रहा है और छोटे-बड़े नगरों के पाठकों तक पहुंच पाना भी लेकिन हमारा परिश्रम और उत्साह हमारे साथ है। कोशिश है कि हम चिन्तनपरक, समीक्षापूर्ण, गंभीर और विश्लेषणात्मक लेखन पत्रिका के माध्यम से आप तक पहुंचा सकें। अपने छोटे कलेवर में भी यह उपयोगी, सार्थक और भिन्न पत्रिका बन सके।
नादरंग-प्रवेशांक (जुलाई 2017) संपादकीय
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