आशाएं जीवन की जद्दोजहद में खो गईं

रवीन्द्र दास से पाण्डेय सुरेन्द

भारत विभाजन के कुछ दिनों बाद ही मुंबई के कलाकारों द्वारा 1948 में प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप की स्थापना हो गई थी l भारतीय कला में बंगाल स्कूल द्वारा स्थापित राष्ट्रीयता के विरोध में और अंतरराष्ट्रीय कला आंदोलनों को भारतीय कला से जोड़ने के उद्देश्य से प्रोग्रेसिव ग्रूप की स्थापना हुई थी l उन दिनों पुरे देश के कलाकारों के बीच बंगाल ग्रूप और प्रोग्रेसिव ग्रूप इन्हीं दोनों की चर्चा होती थी lबिहार के कला इतिहास पर अगर नजर दौड़ाएं तो 70 के दशक तक बिहार के कलाकार देश में चल रहे आधुनिकता की बयार से प्रभावित नहीं थे l संभवतः इसके पीछे दो वजहें थीं, पहला कि यहां के कलाकार आर्थिक रूप से कमजोर थे इसीलिए विदेश तो क्या दिल्ली  -मुंबई भी नहीं जा पाते थे l दूसरा उनके अधिकतर कला गुरु बंगाल स्कूल से आए थे या उन पर बंगाल स्कूल का प्रभाव था जो भारतीयता में ही कुछ नया तलाश रहे थे l बिहार के मूर्तिकार और चित्रकार दोनों ही अपनी आजीविका चलाने के लिए सिर्फ पोर्ट्रेट बनाते रहे जिनसे कलाकार होने की ख्याति भी मिल जाती थी और उनका आर्थिकोपार्जन भी हो जाता था l उनसे पहले के कलाकार या तो पटना कलम के चित्र बनाते थे या पारम्परिक भारतीय मिनिएचर शैली में पेंटिंग बनाकर बेचते थे l कहा जा सकता है कि पाण्डेय सुरेन्द्र बिहार के पहले मूर्तिकार रहे जिन्होंने आधुनिक मूर्तिकला को समझने की कोशिश की और पटना से लखनऊ आने के बाद लगातार सक्रिय रहे l वरिष्ठ मूर्तिकार और कला शिक्षक पाण्डेय सुरेन्द्र से हुई बातचीत के प्रमुख अंशः

0आप कला के क्षेत्र मे कैसे आए?
-हमारे यहां कला का कोई माहौल नहीं था । मेरे दादाजी बिहार के चर्चित कवियों में गिने जाते थे । मेरे यहां जो साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं, उनमें ईश्वरी प्रसाद वर्मा का चित्र छपा होता था । उन दिनों वेटनरी कालेज (पटना) में एक कलाकार होते थे रघुवंश भूषण, जो मेरे पिताजी के मित्र थे । वे कहीं से प्रशिक्षित नहीं थे, कुछ कलाकारों के साथ रहकर सीखे थे मगर बिहार में चर्चित थे । इनके अलावा रमेश बख्शी जी का एक प्रेस होता था, जिनके भाई थे दिनेश बख्शी । इन सबों की चर्चा मेरे घर में होती थी क्योंकि मेरे परिवार में साहित्यिक माहौल था । उन चर्चाओं से मैं इतना ही जान पाया कि चित्रकला भी कोई विषय होता है जो पढाया जाता है मगर उन दिनो मैं चित्रकला मतलब रेखांकन ही समझता था । स्कूलों मे पढाई जानेवाली पुस्तक भंडार की पुस्तकों में खूबसूरत रेखांकन देखकर प्रभावित होता था । स्कूल में मेरे एक मित्र थे नथुनी प्रसाद, जिनको चित्र बनाने में मैं मदद भी करता था मगर कला और कलाकारों से सम्पर्क मेरा बनारस जाने से हुआ । वहां के इन्जीनियरिंग कालेज में चित्र प्रदर्शनी आयोजित होती थी, वहीं मुझे शांतिनिकेतन के बारे में जानकारी मिली और मैंने पिता जी से कलाकार बनने की इच्छा जाहिर की । उन्होंने तीन संस्थान -शांतिनिकेतन, मद्रास और मुम्बई में पढ़ने के लिए अनुमति दे दी, जिसमे शांतिनिकेतन में मेरा प्रवेश हो गया जबकि मैं तो विज्ञान का विद्यार्थी था, डाक्टर बनना चाहता था ।          
0अपने शांतिनिकेतन के शिक्षण के दिनों की कुछ अच्छी यादें बताइए?
-शांतिनिकेतन में उन दिनों ज्यादा शिक्षक नहीं हुआ करते थे । कुल पांच-छह शिक्षक थे, जिनमें रामकिंकर दा मूर्तिकला पढाते थे । सभी शिक्षकों से हम अलग-अलग विषय पढते थे, पाठ्यक्रमों की कोई अनिवार्यता नहीं थी । व्यक्तिगत रुचि के आधार पर छात्र पढते थे ।कभी पेंटिग में ज्यादा समय दे दिया, तो कभी स्कल्पचर में ।हालांकि स्कल्पचर विभाग में सिर्फ क्ले माडलिंग ही होता था । वहां स्कल्पचर को स्थापित करनेवाले लोगों में से थे रामकिंकर दा और शंखो दा ।

0अभिव्यक्ति के लिये स्कल्पचर माध्यम ही आपने क्यों चुना ?
-मैं तो मूर्तिकला के लिए आया नहीं था। मैं 1956 में शांतिनिकेतन से पटना आया था, इलस्ट्रेटर की नौकरी करने । अजंता प्रेस में आवरण और रेखांकन बनाने की नौकरी मिली मगर वहां का माहौल मुझे नहीं पसंद आया । उसके बाद पटना आर्ट कालेज में प्राचार्य के पद पर नियुक्ति हुई और  सेवानिवृत्त हुआ । पर कालेज के दिनों में ज्यादातर कार्यालय के कामों में ही उलझा रहा । शुरुआत मे लंबे समय तक मेरी पेंटिंग में रुचि थी और मैंने टेंपरा स्टाइल में काम भी किया था मगर  सारी पेंटिंग पटना से आने के बाद नष्ट हो गई । धीरे धीरे उम्र बढ़ती गई। मैंने अपने आप को समझना शुरु किया, तब समझ में आया कि मैं स्कल्पचर में ही कुछ बेहतर कर सकता हूं क्योंकि मेरी रुचि त्रिआयामी में ज्यादा थी । कुछ इस तरह मैं स्कल्पचर में आया । मूर्तिकला एक विषय के रुप में पढ रखा था और उस दौर में मूर्तिकला का मतलब था हेड स्टडी यानी मात्र पोर्ट्रेचर मगर शांतिनिकेतन में ही थोडा क्रिेएटिव ढंग से पढाया गया था इसलिए आधुनिकता को समझने मे आसानी हुई ।

0आपसे पहले बिहार में कौन लोग मूर्तिकार के रूप में चर्चित थे और उनका काम कैसा था ?
-उन दिनों एक ही मूर्तिकार थे विजय कुमार मण्डल, जो सही मायने मे सही ढंग से काम कर रहे थे और वे ही चर्चित हुआ करते थे । वे लगातार काम करते थे मगर उनकी प्रवृत्ति ऐसी थी कि वे पतले रिलीफ में ज्यादा अच्छा काम कर पाते थे, जो पेंटिंग के ज्यादा करीब हुआ करता था । सचमुच अद्वितीय था उनका काम मगर मुझे उनके काम में रचनात्मकता की कमी महसूस होती थी । जैसे काम्पोजिशन को, उन्होंने समझने की कोशिश ही नहीं की हालांकि जिस परम्परा से वे आए थे, वहां उसकी गुंजाइश ही नहीं थी । उन्होंने न पश्चिमी कला को समझा और न ही भारतीय कला को। हां, अजंता को उन्होंने जरूर समझा था ।दूसरे व्यक्ति थे सत्येन चटर्जी, जिन्होंने आधुनिकता को समझने की कोशिश जरूर की मगर वे नियमित काम नहीं करते थे। बस यही दो मूर्तिकार उन दिनों हुआ करते थे ।

0आपके काम पर विदेश से लौटने के बाद क्या प्रभाव पडा ?
-मैं पूरा यूरोप घुमते हुए आया पर मेरे शिक्षक थे क्लेभ उनसे मैने मात्र तकनीक ही सीखा क्योंकि उन दिनों मेरा ध्यान उनकी कलादृष्टि पर नहीं गया । अपनी भारतीयता को मैंने बचाए रखा । कुछ लोग फार्म को स्प्रेड करके काम करते है पर वह मैंने नहीं किया, काम्पैक्ट ही रखा । मेरे काम में जो काम्पोजिशन सेंस है वह हमारी परंपरा है, भारतीयता है मगर उसके प्रकटीकरण का प्रोसस बदला । जैसे काम्पोजिशन का काम्पैक्टनेस ,लाइट वेट लिपिंग क्वालिटी- ये सब हम शांतिनिकेतन से लेकर आए थे मगर फार्म को कैसे सिम्पलीफाई और डिस्टार्ट किया जाता है ये हमने विदेश में सीखा। काम को कैसे तुरन्त निकाल दिया जाता है, टेक्सचर कैसे छोड दिया जाता है, ये सब भी सीखने का मौका मिला । हालांकि जब हमलोग शांतिनिकेतन में क्ले में काम करते थे, तब भी टेक्सचर छूटता था मगर जब वैक्स में करते थे तो उसका अलग ढंग था । मगर कहां टेक्सचर छोडना चाहिए, कहां स्मूथ करना चाहिए, ये जरूर मैंने सीखा । सिर्फ तकनीक लेकर आए, बाकी सब तो यहीं का रहा ।

0एक शिक्षक या प्रिंसिपल के रुप में आपके अनुभव क्या रहे?
-मैं जब प्रिंसिपल बना उस समय पूरे कालेज में कुल 30-35 ही छात्र होते थे । प्रथम वर्ष में 15-20 विद्यार्थी ही नामांकन करवाते थे पर अन्तिम वर्ष तक जाते जाते किसी में 4, किसी में 5 ही बचते थे । आज भी बिहार और उत्तर प्रदेश के अधिकतर कला छात्र पढने-लिखने में कमजोर और आर्थिक रूप से गरीब होते हैं। यही वजह है कि उन्हें पैर जमाने में मुश्किल होती है । विद्यार्थी तो बहुत अच्छे- अच्छे निकले, जिनसे बहुत आशा थी, वे जरूर कुछ करेंगे मगर जीवन की जद्दोजहद में उलझ कर रह गए l मैं चाहता था छात्रों मे अपनी दृष्टि विकसित हो सिर्फ अकादमिक स्टील लाइफ या लाइफ स्टडी तक ही वे सीमित न रहें । टेक्निकली जरूर मजबूत हों इसीलिए मैथड और मैटेरियल पर जोड डालता था ताकि जीवन में मौका मिलने पर कभी भी अपने को एक्सप्लोर कर सकें। मुझे पत्थर काटने का मौका बहुत बाद में मिला मगर पहले मैंने खुद पत्थर काटना चुनार जाकर सीखा फिर अपने छात्रों को सिखाया। पहले मूर्तिकला के नाम पर सिर्फ हेड स्टडी करवाया जाता था, पूरे विभाग में हेड ही हेड दिखता है। रजत घोष और विनोद सिंह हमारे समय के दो प्रतिभाशाली मूर्तिकार निकले, जिन्होंने भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में खूब नाम कमाया l छात्र जीवन में भी इन दोनों के काम करने का स्टाइल अलग ही होता था l

पूरी बातचीत ‘नादरंग-4’ में

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2 Thoughts to “आशाएं जीवन की जद्दोजहद में खो गईं”

  1. Jyotsana singh

    ज्ञान परक लेख,,,,पढ़ कर खूब आनंद आया,,

    1. rang raag

      बहुत बहुत धन्यवाद

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