संगीत में नई चुनौतियों का दौर

वाराणसी में हुआ वेबीनार

कोरोना काल संगीत जगत के लिए कई तरह की चुनौतियां लेकर आया है। इस दौर में जहां संगीत के माध्यम से जीविकोपार्जन करने वाले कलाकारों के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है वहीं संगीत शिक्षा के लिए भी नई परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं। संगीत शिक्षा का ऑनलाइन माध्यम को तात्कालिक व्यवस्था के तौर पर ही लिया जाना चाहिए। वाराणसी के कमच्छा स्थित वसन्त कन्या पी.जी. कालेज, कमच्छा, वाराणसी के वाद्य संगीत (सितार) विभाग द्वारा 26 जून से द्विदिवसीय अन्तरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था ‘‘वैश्विक क्षितिज में लोकप्रिय भारतीय संगीत के विविध आयामों में आज की चुनौतियां और समाधान’’। ये विचार वक्ताओं ने इसी वेबीनार के विभिन्न सत्रों में व्यक्त किए। 

उद्घाटन सत्र का प्रारम्भ कुलगीत से हुआ। पारम्परिक रूप से गाए जाने वाले इस कुलगीत को इस वेबिनार के लिए संयोजिका डाॅ. मीनू पाठक द्वारा सितार पर बजाया गया जिसकी प्राचार्या और प्रबन्धक ने बहुत सराहना की।  आभासीय मंच पर उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रचना श्रीवास्तव ने कहा किया कि इस पैंडेमिक परिवेश में जब परंपरागत रूप से गुरु द्वारा शिष्य को सामने बैठकर सिखा देना वर्तमान महामारी के परिवेश में सम्भव नहीं है। ऐसे चुनौती भरे समय में सितार जैसा वाद्ययंत्र को डिजिटल माध्यम से कैसे सिखाया जाए, इस प्रश्न का समाधान अनुभवी लोगों की सकारात्मक सोच से निकालना आवश्यक है। प्रबन्धक श्रीमती उमा भट्टाचार्या ने कहा कि यह वेबिनार इस महामारी के काल में औषधि जैसा कार्य करेगा। तत्पश्चात् इस वेबिनार की संयोजिका डाॅ. मीनू पाठक द्वारा सम्पादित द्वि-दिवसीय वेबिनार के संकलित शोध प्रपत्रों से युक्त ई-सोविनियर का विमोचन किया गया।

वेबिनार के विषय का प्रस्तावन करते हुए संयोजिका तथा संगीत वादन (सितार) विभागाध्यक्षा डाॅ. मीनू पाठक ने वाग्येकार भावरंग की पंक्तियों से प्रारम्भ करते हुए कहा किजगत स्वर-सप्तक बनेगा, षड्ज बन जाओ तुम्हीं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है, को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में डिजिटल शिक्षा बहुत मददगार हो रही है, जिसे 1993 में मिस्टर विलियम डी. ग्रेज़ियाडी ने प्रारम्भ किया था। तरह-तरह के तनावों के बीच समाधान के लिये अत्यन्त अमूर्त उपकरण वाले स्वर-लय के साथ संगीत बहुत प्रभावशाली माध्यम है। इस धरोहर को बचाने के लिये प्रतियोगी परीक्षाओं में संगीत के कुछ अंक रखे जाने का सुझाव दिया और संगीतजीवी वर्ग के आजीविका संकट को सम्हालने के लिए कोष बनाने की ओर ध्यान खींचा।
 

उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में अपना बीज वक्तव्य देते हुए ख्यातिलब्ध संगीतवेत्ता और सुश्रुत कलाकार प्रो. पंडित चित्तरंजन ज्योतिषी ‘‘चित्तरंग’’ (पूर्व कुलपति, राजा मानसिंह तोमर संगीत और कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्यप्रदेश) ने कहा कि विश्वभर में सुपरिचित भारतीय संगीत को भी कोरोना काल में चुनौतियों का सामना करने के लिए समाधान खोजना आवश्यक है। संगीत की उत्पत्ति के लिये उन्होंने नाट्यशास्त्र में ऋग्वेद से भाषा और संवाद, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रसभाव के ग्रहण की चर्चा की। कोरोना से प्रभावित स्थितियों में बन्द पड़ी शिक्षा व्यवस्था को ऑनलाइन तकनीक से फिर से प्रारम्भ करने का प्रयत्न हो रहा है लेकिन बिल्कुल प्रारम्भिक विद्यार्थी को प्रायोगिक शिक्षा ऑनलाइन देना ठीक नहीं है। कुछ संगीत सीख लेने के बाद ऑनलाइन सिखाना ठीक होगा। यह एक अस्थाई व्यवस्था है। दिल्ली के वैज्ञानिकों द्वारा नादब्रह्य के द्वारा कोरोना नियंत्रण के उपायों के खोज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें आशावादी होना चाहिए। हम भगवान और गुरू के प्रति श्रद्धा रखकर संगीत सीखें और संगीत से लाभान्वित हों। हिन्दी विभाग की असोसिएट प्रोफेसर डाॅ. आशा यादव ने सुललित साहित्यिक भाषा में धन्यवाद ज्ञापित कर सम-सामयिक चुनौतियों की चर्चा और भावी सम्भावनाओं की खोज का संकेत दिया। इस सत्र का संचालन गृहविज्ञान विज्ञान की असिस्टेन्ट प्रोफेसर डाॅ. अंशु शुक्ला ने बहुत सुबद्ध और सुगठित रूप से किया।

प्रथम सत्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संगीत एवं प्रदर्शन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. पंडित साहित्य कुमार नाहर ने ‘‘कोविड-19 के परिवेश में तंत्रीवाद्यों की शिक्षण पद्धतियों का मूल्यांकन’’ विषय पर अपना विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने संगीत की पारम्परिक शिक्षा की विशेषतायें और संस्थागत शिक्षा की विशेषताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया और वर्तमान समय में स्काइप, वीडियो काॅल और गूगल मीट आदि के द्वारा दी जा रही शिक्षा की चर्चा करते यह भी उल्लिखित किया कि हर विद्यार्थी के इस प्रकार के सुविधा और साधन उपलब्ध हो या न हो, यह भी इसमें महत्व रखता है। फिर भी हमें विषमता से जूझते हुए कोई न कोई मार्ग निकालना आवश्यक है।
अगली वक्ता के रूप में काशी हिन्दू विश्ववि़द्यालय में गायन विभाग की प्रोफेसर डाॅ. रेवती साकलकर ने ‘‘संगीत की संजीवक शक्ति’’ विषय पर अपना विचार व्यक्त करते हुए अपने वक्तव्य का प्रारम्भ इसी महाविद्यालय में सीखे हुए शान्ति पाठ और कालिदास के पद्यों से किया। वे इसी महाविद्यालय की संगीत विभाग की पूर्व छात्रा हैं। उन्होंने अपने अनुभव बांटे। स्वयं के जीवन का और उसके बाद अपने शोध कार्य के प्रसंग में भी जब संगीत के माध्यम से एक वृद्ध महिला, जो संगीत नहीं सीखना चाह रही थी, उसने भी शास्त्रीय संगीत को देर तक सुनाने का आग्रह किया। हृदय संवेग और भावना प्रकट करने की कला संगीत है। यह संगीत समय तथा दुःख-दर्द भुला देता है। गहरी उदासी के समय में भी मन पसन्द संगीत शान्ति देता है।

पहले दिन की अन्तिम वक्ता के रूप में कैलीफोर्निया निवासी सितार वादिका रेशमा श्रीवास्तव ने कोरोना काल में सांगीतिक त्रिवेणी से जुड़े कलाकारों की आजीविका सम्बन्धी समस्याओं को रेखांकित किया और ये कहा कि न केवल भारत में बल्कि सारी दुनिया के पेशेवर कलाकारों के लिए यह समय गम्भीर त्रासदी वाला समय है। अपने सम्बोधन के अन्त में उन्होंने राग मधुवन्ती में सुरीले आलाप से राग की बढ़त दिखाकर उसके उपरान्त जोड़, झाला, द्रुतगति की तानों, छूट की तानों एवं फ़िरत की तानों की श्रुतिमधुर प्रस्तुति करते हुए अन्त में झाले से समाहार करके सभी सुधी श्रोताओं और दर्शकों को अपने कलात्मक सितार वादन से अभिभूत कर दिया। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संगीत वादन विभाग की असोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सुमन सिंह ने प्रथम सत्र के वक्ताओं को उनके चिन्तनपरक सारगर्भित व्याख्यान और श्रीमती रेशमा जी के सुरीले सितार वादन के लिए उन्हें धन्यवाद दिया।

दूसरे दिन 27 जून को द्वितीय सत्र के प्रारम्भ में वक्ताओं का स्वागत करते हुए प्राचार्या प्रो. रचना श्रीवास्तव ने कहा कि वाद्य संगीत द्वारा कोविड काल में उत्पन्न समस्याओं का समाधान खोजने के लिए महामारी से भय की अवस्था में संगीत चिकित्सा से कैसे सहायता प्राप्त हो, यह विचार करने के लिए आज हम एकत्रित हुए हैं।  प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डाॅ. सी. तुलसी दास ने अपने व्याख्यान का प्रारम्भ कृष्ण यजुर्वेद के संगीतमय पाठ से किया और कहा कि कोविड महाकाल की चुनौती में भारत अपनी संगीत रूपी ब्रह्यास्त्र का उपयोग करने को तत्पर है। उन्होंने बताया कि उनके प्रयोगाधारित प्रमाणों के आधार पर वे कह पा रहे हैं कि बच्चों में एकाग्रता, आई.क्यू. में वृद्धि और गुस्से में कमी आ सकती है, यदि उनको धीमा और शान्तिदायक संगीत सुनाया जाय। प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाॅकिंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ब्रह्याण्ड की उत्पत्ति बिग बैंग से नहीं अनहद नाद से हुई है और अनहद नाद चेतना के रूप में सभी जीवों में है और मनुष्य उस अनहद नाद को सुन सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि विश्व में पश्चिमी देशों में वाद्य ध्वनि और शब्द ध्वनि पर बहुत शोध कार्य हो रहा है और वहाँ मेडिटेशन को मेडिकेशन में बदलने सम्बन्धी प्रयोग भी हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि वसन्त कन्या महाविद्यालय के दो अर्थ हैं – एक वसन्त ऋतु, जहां नई कोपलें फूटती हैं और बस अन्त अर्थात् तनाव और कष्ट का अन्त। यदि इस प्रकार का कोई सहयोग वसन्त कन्या महाविद्यालय में हुआ तो वह इस विषय में सहयोग करने के लिए वे सदैव तत्पर हैं।

यूनाइटेड किंगडम में रहने वाली अनुराधा चतुर्वेदी ने नृत्य की ऑनलाइन प्रस्तुति तथा ऑनलाइन शिक्षा सम्बन्धी अपने विचार प्रस्तुत करते हुए बताया कि शास्त्रीय नृत्य केवल शरीर से ही नहीं बल्कि आत्मा से भी जुड़ा हुआ है। ऑनलाइन मीडियम, ऑनलाइन टीचिंग के प्रकार समझाते हुए उन्होंने बताया कि एक लाइव अर्थात् छोटे समूह के साथ फेस-टू-फेस शिक्षा देने का प्रकार है तथा दूसरा प्री-रिकार्डेड काॅन्टेन्ट जो यू ट्यूब के माध्यम से दिया जाता है। इस विषय में विद्यार्थियों की सुविधा-असुविधा और शिक्षकों के लिए सकारात्मक तथा नकारात्मक पक्षों की विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने यह बताया कि ये तात्कालिक उपाय ही है। तात्कालिक कोरोना काल में विशेष रूप से यह एक सप्लीमेन्ट है जो हम ऑनलाइन शिक्षा दे रहे हैं। पूरा संगीत सीखना इस माध्यम से सम्भव नहीं हो पायेगा। फिर भी हमें आशा रखनी चाहिए कि हम किसी न किसी रूप में आगे सहज तथा सामान्य स्थितियों में संगीत सीख सकेंगे।

समापन सत्र के अध्यक्ष रूप में प्रो. ऋत्विक सान्याल जी ने अपना शुभकामना सन्देश भेजा था जिसमें ये कहा गया कि वायु और अग्नि से उत्पन्न नाद की परिशोधक क्षमता शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करती है। आज का समय संगीत शिक्षक और संगीत प्रयोगता कलाकारों के लिये चुनौती भरा है। यह साधना का समय है। ऑनलाइन शिक्षा के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों पर विस्तार से विचार करके अपने अनुकूल मार्ग ढूंढ़ना चाहिए।

मुख्य अतिथि के रूप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंचकला संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. राजेश शाह ने यह बताया कि स्वर सुनने के लिए और ताल बांधने के लिए अर्थात् स्वर और ताल को भलीभांति समझने के लिए एकाग्रता की बहुत आवश्यकता है और आज के समय में संगीतजीवी परिवारों के लिए बड़ी चिन्ता का समय है और हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संगीतकार के साथ माइक, साउण्ड सिस्टम वाले तथा स्टेज व्यवस्था वाले लोग भी जुड़े होते हैं। इन सबकी जीवनचर्या बाधित हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी के परिवार में संगीत की परम्परा न हो तब भी साधना की ललक उन्हें संगीतकार अवश्य बनाएगी। इसके लिए दृढ़ संकल्प और साधना अत्यन्त आवश्यक है। अपने वक्तव्य का समापन उन्होंने पावस ऋतु के अनुकूल राग मियां मल्हार के वादन से किया जिसमें आलाप के साथ मसीतखानी और रज़ाखानी को पूरी सुन्दरता के साथ प्रस्तुत किया। उनके साथ तबला वादन सिद्धान्त मिश्र ने किया। कार्यक्रम की रिपोर्ट डाॅ. स्वरवन्दना शर्मा ने पढ़ी। इस सत्र का संचालन मनोविज्ञान विभाग की असिस्टेन्ट प्रोफेसर डाॅ. शुभ्रा सिन्हा ने बहुत ही सकुशल रूप में सम्पन्न किया। कार्यक्रम का समापन वेबिनार की संयोजिका डाॅ. मीनू पाठक के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।  (प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)  

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