संगीत का संकटमोचन

आलोक पराड़कर

(राष्ट्रीय सहारा, 26 अप्रैल 2020)

इन पंक्तियों को लिखने में तो अब कोई नई बात नहीं है कि कोरोना संकट से पूरे विश्व में जिस प्रकार उथल-पुथल मच गई है, उसमें हम बहुत सारे नए परिवर्तनों को देख ही रहे हैं। बहुत कुछ बदल रहा है, बदल चुका है। लोग घरों में हैं, रोजगार-व्यापार बंद हैं, सड़कें वीरान पड़ी हैं और उन सारे अवसरों, आयोजनों का निषेध किया जा रहा है, जहां लोगों का जमावड़ा होता रहा है या हो सकता है। लेकिन यह जरूर हुआ है कि ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वाराणसी के संकट मोचन संगीत समारोह की निरन्तरता को उसकी निर्धारित तिथियों पर ही एक नए ढंग से हासिल किया गया है। हम सब जब वास्तविक जीवन में परेशान, भय और अवसाद से ग्रस्त हैं यह विश्वप्रसिद्ध उत्सव आभासी माध्यम का सहारा लेकर ही सही हमें ढांढस और सुकून दे गया है।


जब देश में पिछले कुछ वर्षों से शास्त्रीय संगीत को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं, खासकर यह कहा जाने लगा है कि शास्त्रीय संगीत की लोकप्रियता कम हो रही है, नई पीढ़ी में इसे सीखने और समझने वाले कम हो गए हैं, पाश्चात्य और फिल्म संगीत का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है, संकटमोचन संगीत समारोह लगातार इन सबका प्रत्युत्तर रहा है, कलाकारों और संगीतप्रेमियों की संख्या में लगातार इजाफा करता, अपनी लोकप्रियता और भव्यता को विस्तार देता हुआ। यह क्रम इस बार 97 वर्षों की कड़ी बना चुका है अर्थात शताब्दी के बिल्कुल करीब। लेकिन इस बार जब सबकुछ अपने अपूर्व और संकटग्रस्त स्थिति में था, उसमें इस कड़ी के टूट जाने की चिन्ता भी शामिल थी। इसका समाधान डिजीटल माध्यम में मिला लेकिन इसके डिजीटल संगीत समारोह में बदल जाने को लेकर भी लोग प्रश्नाकुल थे। मगर संगीतकारों और संगीतप्रेमियों का उत्साह कुछ इस तरह जुड़ा कि 12 से 17 अप्रैल तक निर्धारित समारोह की तिथि एक दिन और बढ़ानी पड़ गई और छह दिनों का यह वार्षिक उत्सव इस वर्ष डिजीटल होने के साथ ही सप्ताहव्यापी भी हो गया। आयोजन समिति के अनुसार, करीब पांच लाख लोग इस डिजीटल संगीत समारोह से जुड़े, फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मंचों से इसका अवलोकन किया गया जिनमें भारत ही नहीं अमरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, टर्की, जापान, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस, इजराइल, ब्राजील, श्रीलंका आदि देशों के संगीतप्रेमी भी शामिल थे। 
समारोह में पं.जसराज, एल.सुब्रह्मण्यम, देबू चौधरी, राजन-साजन मिश्र, उल्हास कसालकर, सुरेश तलवरकर, भजन सोपोरी, राशिद खान, सतीश व्यास, कंकणा बनर्जी, सुजात खान, विश्वजीत राय चौधरी, रोनू मजुमदार, आशीष खान, तेजेन्द्र नारायण मजुमदार, कुमार बोस, आनिंदो चटर्जी, कृष्णमोहन महाराज-राममोहन महाराज, रतिकांत महापात्र, जयतीर्थ मेवुंडी अकरम खान, अनुराधा पाल, यू. राजेश, देवाशीष डे, विकास महाराज, गणेश प्रसाद मिश्र, सौरव-गौरव मिश्र के साथ ही शिवमणि, अनूप जलोटा, मालिनी अवस्थी जैसे ढेरों कलाकारों ने संगीत की प्रस्तुतियां दीं। समारोह मुख्यतः शास्त्रीय संगीत पर आधारित होता है लेकिन कई बार इसमें उपशास्त्रीय, सुगम और लोकप्रिय संगीत की प्रस्तुतियां भी जुड़ जाती हैं। पं.जसराज जब अमरिका से आनलाइन हुए तो भावविह्वल थे और आंसुओं की धारा बह निकली। 90 वर्षीय इस प्रख्यात कलाकार के मंदिर में आने का क्रम 1972 से ही शुरू हो गया था और ज्यादातर वर्षों में वे अपने शिष्य-शिष्याओं के साथ पूरे-पूरे समय रहते थे। बोल पड़े- जब तक रहेगी जान, आता रहूंगा।


मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी मंच सजाया गया। कलाकार अपने वीडियो क्लिप या लाइव के जरिए आनलाइन होते थे। युवा संचालक मंच पर कलाकार का नाम और परिचय सुनाता जिसके बाद प्रस्तुति शुरू कर दी जाती। सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के साथ ही मंदिर परिसर में लगे एलईडी स्क्रीन पर भी इन्हें देखा जा रहा था। मंदिर परिसर में महन्त विश्वंभरनाथ मिश्र और कुछ चुनींदा लोग तो होते थे लेकिन नहीं था तो संगीतप्रेमियों का वह नजारा जो इस उत्सव को इतना महत्वपूर्ण बनाता था। जो मंदिर में हर साल दूर-दूर तक नजर आता था और चबूतरेनुमा मंच के आसपास बैठने के लिए होड़ लिया करता था। यह इन संगीतप्रेमियों का ही प्रेम और उत्साह है जो दूर-दराज से कलाकार वर्ष भर यहां आने के लिए प्रतीक्षा करते हैं। और कलाकारों की संख्या अक्सर इतनी ज्यादा हो जाती है कि कई बार प्रस्तुतियों के लिए उन्हें पर्याप्त समय भी नहीं मिल पाता। संगीत कार्यक्रम हर साल रात्रि आठ बजे से शुरू होते हैं। वाराणसी के आसपास के नगरों तक में  रात्रि के 10-11 बजते-बजते शास्त्रीय संगीत के समारोह समाप्त होने लगते हैं लेकिन संकटमोचन संगीत समारोह में अगले दिन सुबह के छह बजे तक फरमाइश होती रहती है।    
जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह संगीत समारोह संकटमोचन मंदिर में संकटमोचन हनुमान के समक्ष आयोजित होने वाला उत्सव है लेकिन यह संगीत की उस भावना को भी पुष्ट करता है कि कलाएं धर्म-सम्प्रदाय की संकीर्णताओं से ऊपर होती हैं। शास्त्रीय गायक पं.जसराज इसी संगीत समारोह में श्रोताओं की मांग पर मेरो अल्लाह मेहरबान.. सुनाते रहे हैं। संगीत समारोह के संगीत प्रेमियों ने सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान और तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन को घंटों सुना है। पाकिस्तान से आए गुलाम अली की गजलें भी इसी मंच पर खूब गूंजी हैं और शायर एवं पटकथा-संवाद लेखक जावेद अख्तर को इसी उत्सव में शान्तिदूत सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। संगीत और सद्भावना के सारे संकटों में यह उत्सव निश्चय ही संकटमोचन की तरह नजर आता है।

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4 Thoughts to “संगीत का संकटमोचन”

  1. Shalini Mathur

    आलोक जी,
    आप लेखन से शास्त्रीय संगीत और ललित कलाओं की अमूल्य सेवा कर रहे हैं।
    मेरी माँ हम बच्चों को सभी बड़े बड़े उस्तादों के समारोहों में ले जाती थीं।उनके बार बार कहने पर ही मैंने भी गाना सीखा, विशारद किया। आज एकांतवास के समय दिल और दिमाग़ के भीतर बसे वे राग बहुत साथ दे रहे हैं, कि अपने आरोह अवरोह के साथ वे मन में घूमते रहते हैं और हमारे दिन और हमारे दिल को भरा भरा रखते हैं।

    संकट मोचन समारोह की निरन्तरता की रक्षा हो गई, पर जो बात सामने बैठ कर सुनने गुनने में है वह डिजिटल में कहां!

    मुझे विश्वास है, सब दिनों की तरह ये दिन भी बीत जाएंगे, और हम सब उसी तरह एक दूसरे से मिल सकेंगे, कला का आस्वाद ले सकेंगे, जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जी सकेंगे।
    बीमारियां कितनी भी बड़ी क्यों न हो, मनुष्य के मनोबल से बड़ी नहीं हो सकती।
    सादर
    शालिनी माथुर

    1. rang raag

      बहुत बहुत धन्यवाद।

  2. Rang Raag

    बहुत अच्छा लिखा है आलोक जी आपने। अभी वही पढ रहा था|सब हनुमान जी महाराज और आपलोग़ो के प्रेम से हुआ।
    -विश्वंभरनाथ मिश्र,महन्त, संकट मोचन मंदिर

    1. rang raag

      बहुत बहुत आभार।

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