चित्रों में प्रकृति और स्त्रियां

– भूपेंद्र कुमार अस्थाना
 प्रकृति में ऐसे दृश्य देखने को मिलते है जिसे एकटक देखते ही बनता है। उससे प्राप्त सौंदर्य और आनंद से मन पुलकित हो जाता है।देखते सभी है प्राकृतिक दृश्य को लेकिन कुछ अभिव्यक्ति करते है अपने विशेष माध्यम से। उसी आनंद को लोगो को भी देना चाहते है।
एक चित्रकार अपने चित्राभिव्यक्ति से वही आनंद देने का प्रयास करता है। हालांकि कुछ अपने मानवीय कल्पना और भावना के आधार पर चित्र का निर्माण करते है, उनका सौंदर्य, आनंद या प्रभाव भी कुछ कम नही होता प्राकृतिक सौंदर्य से। कहीं न कहीं वही  प्राकृतिक सौंदर्य उनके मन मस्तिष्क में बसा हुआ होता है जिसे अपनी कल्पनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास करते हैं।
   इन्ही विचारों और कल्पनाओं को साकार करते इन दिनों चार चित्रकारों के चित्रों की सामूहिक प्रदर्शनी  चेंज ऑफ वॉइस नई दिल्ली स्थित ललित कला अकादमी के गैलरी आठ में प्रदर्शनी लगाई गई है। प्रदर्शनी में पुणे से विवेक निम्बोलकर , राजेश शाह, सुधीर पवार, दिल्ली से शुभ्रा कौशिक की कलाकृतियां प्रदर्शित हैं।
विवेक निम्बोलकर अपने चित्रों के बारे में बताते है कि मेरे चित्रों में जो ज्यामितीय आकृतियाँ है इनके पीछे मेरी पहले की कलायात्रा की महत्वपूर्ण भूमिका है। पहले यथार्थवादी प्राकृतिक चित्रों के बाद आज अमूर्तन और ज्यामितीय आकृतियां आई हैं। विवेक प्रकृति से काफी प्रभावित है। बल्कि अपने को उसके बहुत करीब बताते है। बताते है कि मैं प्रकृति को करीब से महसूस करता हूँ तब जाकर अपने कृतियों में उसके टेक्सचर को बनाते है। विवेक प्रकृति को ज्यामितीय आकारों में देखते है। विवेक के चित्रों में महत्त्वपूर्ण पहलू व आकर्षण के केंद्र वृत्त, त्रिकोण, आयताकार के साथ रंग, टेक्सचर विशेष है। रेखाएं हमे एक बिंदु पर जोड़ती है। बिंदु जो हमे प्रेरणा देती है प्रकृति से जुड़ने के लिए।
  इस समूह के दूसरे चित्रकार सुधीर पवार हैं। सुधीर ने प्राकृतिक चित्रों को प्रदर्शित किया है। सुधीर भी अपने शुरुआती दौर में यथार्थवादी परिदृश्य से आज अमूर्तन की तरफ अग्रसर है। सुधीर कहते है हम प्रकृति से जुड़े है तो प्रकृति के बदलाव का प्रभाव हमारे मन पर भी पड़ता है यही बदलाव हमारे विचारों में तथा चित्रों की नई शैली में बदलाव करता है। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है।
   इसी कड़ी में राजेश शाह बताते है कि मेरी कला तपस्या की तरह है। एक आध्यात्मिक विकास की यात्रा है। एक कलाकार के रूप में हर प्रयासों के साथ सुधार करता हूँ । राजेश ने समाज के कई विषयों को पेंट किया है। समाज मे रिश्तों माता- बच्चे, प्रेमी,और संगीत आदि  इनके चित्रों में दृढ़ता लाती है। वह कहते हैं कि मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है । हम प्रकृति से लाभ लेते है उसके बदले में हम प्रकृति का अपमान और शोषण करते है जिसका परिणाम विनाशकारी होता है। प्रकृति के करीब होना , ईश्वर के करीब होना है।
प्रदर्शनी में राजेश के चित्र एक्रेलिक माध्यम में बने है। चित्र देखने पर अपूर्ण लगता है लेकिन यही इनकी शैली है। राजेश बताते है हम आज अपने आदर्श को ही गलत चुनते है और नकारात्मक भाव को जन्म देते है। वास्तव में हमारे आदर्श राम कृष्ण है जिन्होंने हमेशा हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का भाव पैदा किया है। इनके कुछ चित्र अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर रहने की बात करते है।
  इसी समूह में नई दिल्ली से शुभ्रा कौशिक है जो प्राकृतिक सुंदरता को ही मन की सुंदरता मानती है। संघर्ष से जूझती और दायरों में बंधी महिला समुदाय को भी अपने चित्रों में प्रकट करने की कोशिश की है। उन्होंने महिलाओं को परिवार को जोड़ने वाली और सबको साथ रखने वाली के रूप में भी चित्रित किया है। मिलाकर इन चित्रकारों की कलाकृतियों मेें प्रकृति के सौंदर्य की अनुभूति की जा सकती है।

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