कैनवास पर भी चौंकाता है असगर वजाहत का रचना संसार

दिल्ली में लगी चित्र प्रदर्शनी

ये चित्र एक लेखक के बनाए हैं ऐसा नहीं लगता क्योंकि इनमे निहित विशेष ताज़गी बताती हैं कि इन्हें किसी सिद्धहस्त चित्रकार ने बनाया है। विख्यात कला समीक्षक और लेखक प्रयाग शुक्ल ने उक्त विचार सुप्रसिद्ध कथाकार – नाटककार असग़र वजाहत के चित्रों की प्रदर्शनी में व्यक्त किए। शुक्ल ने कहा कि असग़र विनम्रता से कहते हैं कि मैं चित्रकार नहीं लेखक हूँ लेकिन उन्होंने रंगों के प्रयोग और प्रस्तुतिकरण की विविधता से चौंका दिया है। ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसायटी की कला वीथी में आयोजित इस प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में हिंदी के चार कवियों ने काव्य पाठ किया।  पंखुरी सिन्हा, सीरज सक्सेना, विष्णु नागर और मंगलेश डबराल के काव्य पाठ को कला वीथी में चित्रों के बीच सुनना दर्शकों के लिए नया और आह्लादकारी अनुभव था। प्रदर्शनी के क्यूरेटर तथा काव्य पाठ का संयोजन  कर रहे प्रयाग शुक्ल ने दिल्ली के सांस्कृतिक परिदृश्य में इसे यादगार अनुभव बताया।
काव्य पाठ में मंगलेश डबराल ने ‘रात और दिन’, ‘मेरा दिल’, ‘सुनो शब्दार्थ’ तथा ‘भूत’ कविताओं का पाठ किया वहीं विष्णु नागर ने अपने संग्रह ‘घर के बाहर घर’ से कुछ मर्मस्पर्शी कविताओं का पाठ किया। उदघाटन समारोह में असग़र वजाहत ने  प्रयाग शुक्ल को इस प्रदर्शनी का श्रेय देते हुए कहा कि उनके उत्साहवर्धन से ही यह सम्भव हुई है। ज्ञातव्य है कि भारत में असग़र वजाहत के चित्रों की प्रदर्शनी पहली बार लगी है यद्यपि पिछले माह ही  हंगरी के शहर बुदापेश्त में उनके चित्रों का प्रदर्शन हुआ था।
आयोजन में नया पथ के सम्पादक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, आलोचना के सम्पादक संजीव कुमार, आलोचक रेखा अवस्थी, कथाकार वंदना राग , कवि लीलाधर मंडलोई, कथाकार मधुसूदन आनंद, बनास जन के सम्पादक पल्लव, समीक्षक श्याम सुशील, लेखक मधुकर उपाध्याय, प्रकाशक मीरा जौहरी सहित बड़ी संख्या में साहित्य और कला प्रेमी उपस्थित थे।
 कविता और कला में अमूर्तन
असगर वजाहत रंगों के साथ प्रयोग करते हैं और अपने अमूर्त चित्रों में रंगों तथा परतों से विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को प्रकट करते हैं। सुप्रसिद्ध कला समीक्षक और कवि प्रयाग शुक्ल ने ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसायटी की कला वीथी में चित्र प्रदर्शनी में कहा कि उनके चित्रों में हमें गहरी मानवीय उष्मा मिलती है।  ‘कविता और कला में अमूर्तन’ विषयक परिसंवाद में शुक्ल ने प्रख्यात कवि नवीन सागर की एक कविता का पाठ भी किया। परिसंवाद में  असग़र वजाहत ने कहा कि रंग बोलते हैं। उनकी आवाज़ सुनाई देती है। रंग हँसते हैं। उनकी हँसी सुनाई देती है। रंगों का संसार हमारे संसार की तरह विचित्र संसार है। बस एक शब्द है जो स्थिर को गति देता है और गति को तीव्रता देता है। उन्होंने निराला के प्रसिद्ध प्रगीत ‘बांधो न नाव इस ठाँव बंधु!’ को कविता में अमूर्तन का सुन्दर उदाहरण बताया। परिसंवाद में चित्रकार सीरज सक्सेना, कवि पंखुरी सिन्हा, फिल्म विशेषज्ञ शरद दत्त, फोटोग्राफर सर्वेश, युवा आलोचक पल्लव सहित अनेक चित्रकार और लेखक उपस्थित थे। प्रदर्शनी का आयोजन 29 सितंबर से चार अक्तूबर तक किया गया।
फोटो एवं रिपोर्ट  – हैदर अली, ठाकुर सिंह परिहार, सर्वेश

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