उपेक्षा का शिकार एक महान कलाकार की कलाकृति

 कला संस्कृति, संरक्षण,स्वच्छता के नाम पर लगातार बजट पास होते जा रहे है। लेकिन उसका असर उसका परिणाम हम सभी को ज्ञात है। तमाम कला कृतियाँ उपेक्षा का शिकार हुए जा रही हैं। रवींद्रालय चारबाग लखनऊ उत्तर प्रदेश के भवन पर बने इस महान कलाकार की कृति को देखिए।किस प्रकार स्थिति है। घास फूस उग रहे हैं। काई जैसी चीजें पनप रही हैं। इस स्थिति को देखकर यही लगता है कि कुछ दिनों में हम इस कृति को खो देंगे यदि जल्दी ही ध्यान नही दिया गया तो। यह बहुत ही दुःखद स्थिति है।
     81 फीट लंबी 9 फ़ीट चौड़ी ग्लेज़्ड टेराकोटा म्यूरल भारत के सुप्रसिद्ध कलाकार पद्मविभूषण सम्मान प्राप्त स्वर्गीय श्री के.जी.सुब्रह्मण्यम ने वर्ष 1963 में रचना की थी।
   ज्ञातव्य हो कि इस स्थिति पर वरिष्ठ कलाकार श्री जय कृष्ण अग्रवाल जी ने 17 अप्रैल 2018 को एक पोस्ट से इस पर ध्यान आकृष्ट किया था। उनका पोस्ट को नीचे प्रस्तुत किया गया है।
   हम विकास विकास का नाम चिल्लाते हैं। कैसा विकास ?  कुछ नया बनाया जाए तभी विकास होगा ? बिल्कुल नहीं। पहले जो है उसे सुरक्षा, संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है। फिर कुछ नया बनाया जाए। खास तौर पर जो हमारी कला है , संस्कृति हैं जो पहचान दिलाई हैं उन धरोहरों को बचाया जाए। जिनपर हमे गर्व है। यह म्यूरल केवल प्रदेश ही नहीं पूरे देश की पहचान है।
वरिष्ठ कलाकार श्री जय कृष्ण अग्रवाल ने बताया कि -हमारी उपेक्षा झेलती एक महान कलाकार की अतुल्य कृति …
चारबाग रेलवे स्टेशन जाते समय कम ही लोगों का ध्यान सामने रवीन्द्रालय पर बनी कलाकृति पर जाता होगा। 81फीट लम्बी और 9 फीट चौड़ी इस ग्लेज़्ड टैराकोटा म्यूरल की सुप्रसिद्ध कलाकार स्व.के.जी. सुब्रह्मण्यम ने सन 1963 में रचना की थी।
पद्म विभूषण सम्मान प्राप्त कलाकार श्री सुब्रह्मण्यम द्वारा रचित गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के कथानक पर आधारित इस म्यूरल को वैश्विक स्तरपर पहचान मिली है किन्तु  इसे लखनऊ का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इसके महत्व से अधिकतर स्थानीय लोग अनभिज्ञ है। तहजीब का शहर कहे जाने वाले शहर की तहजीब शायद  इतिहास की चंद तारीखों में ही सीमित होकर रह गई है। बीसवीं सदी में बनी यह कलाकृति भारतीय कला के इतिहास में अपना स्थान सुनिश्चित कर चुकी है और आधुनिक भारतीय कला का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करती है और आगे भी करती रहेगी भले ही इसका वजूद न रहे।
अपने आप में अनूठी और बेमिसाल इस कलाकृति की वर्तमान स्थिति को देख कर अब वह समय दूर नहीं लगता जब यह सिर्फ किताबों में ही नज़र आयेगी। उत्तर प्रदेश को गर्व होना चाहिए कि उसके क्षेत्र में आधुनिक भारतीय कला का प्रतिनिधित्व करने वाली यह कलाकृति स्थिति है।इसके संरक्षण के लिऐ अतिशीघ्र आवश्यक प्रयास किये जाने कीआवश्यकता है साथ ही ए.एस.आई.की नियमावली में भी प्राविधान किया जाना चाहिये  जिससे महत्वपूर्ण आधुनिक कलाकृतियों को भी संरक्षित धरोहरों की श्रेणी में रक्खा जा सके।
अखिलेश निगम कहते है कि – कला-जगत सहित लखनऊ के लिए यह म्यूरल एक महत्वपूर्ण धरोहर है। उस महान कलाकार ( के० जी० सुब्रमण्यम ) का लखनऊ को दिया एक शानदार तोहफा, जिसे बनते हमने देखा है। रवीन्द्रालय ने अपने गोल्डन डेज में इसे संवारा भी है पर अब यह जिम्मेदारी प्रदेश के संस्कृति विभाग / मंत्रालय की बनती है कि इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके। गौरतलब है कि इसकी गणना देश के प्रसिद्ध म्यूरल में की जाती है। मैं प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी जी से प्रार्थना और अपील करता हूँ कि वे प्रदेश की इसका सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की स्थायी व्यवस्था कराने का कष्ट करें। लखनऊ को सुंदर बनाने में इसकी बड़ी भूमिका है।
भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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4 Thoughts to “उपेक्षा का शिकार एक महान कलाकार की कलाकृति”

  1. त्रिवेणी प्रसाद तिवारी

    बहुत ही संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान दिलाया। साधुवाद !

  2. Raka Agrawal

    ऐसी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत ( भित्तिचित्राकृति ) का संरक्षण आवश्यक है ।

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