महत्वपूर्ण प्रदर्शनियों को मीडिया नोटिस

प्रसिद्ध चित्रकार  जयकृष्ण अग्रवाल से बातचीत

अग्रणी छापा चित्रकारों में शुमार किए जाने वाले जयकृष्ण अग्रवाल लखनऊ स्थित कला एवं शिल्प महाविद्यालय से सन् 2001 में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए हैं लेकिन उनकी कला यात्रा में ठहराव नहीं आया है बल्कि वे ऊर्जा से लबरेज हैं और प्रयोगों का क्रम भी जारी है। स्टेन्सिल से होते हुए कुछ समय पूर्व गिस्ली प्रिण्ट्स तक पहुंचकर उनकी कला ने एक नया बदलाव ग्रहण किया है और इससे उनकी सृजनात्मकता को भी विस्तार मिला है। 75 वर्षीय अग्रवाल की कला साधना का अपना एकान्त भले ही हो लेकिन वे समारोहों में भी जाते हैं, प्रदर्शनियां देखते हैं,  युवा कलाकारों से मिलते और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। देश-दुनिया में होने वाली कला गतिविधिय़ों की भी उन्हें खूब जानकारी होती है और समय-समय पर उन पर टिप्पणी भी करते हैं। उनके जैसे सजग चित्रकार से बातचीत का अपना एक सुख है।                                                                                   
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आपकी इतनी लम्बी कला यात्रा है। आपको कला महाविद्यालय से सेवानिवृत्त हुए भी डेढ़ दशक होने को आए हैं। इस लम्बी यात्रा के दौरान भारतीय कला की प्रवृत्तियों में किस तरह के बदलाव को रेखांकित करना चाहेंगे ?
-60 के आसपास मैंने पढ़ाई पूरी की तो उस समय जो पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहे थे, वे पाश्चात्य संस्थानों की तर्ज पर थे जिसमें तकनीकी कौशल पर विशेष ध्यान दिया जाता था पर सौन्दर्य या अभिव्यक्ति की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था। बल्कि मुझे तो याद है कि जब हम पढ़ते थे तो हंसी-मजाक में कहा जाता था कि ज्यादा पढ़ो-लिखो मत, नहीं तो इससे दिमाग तो चलेगा लेकिन हाथ रुक जाएंगे। तो कहीं न कहीं हाथ की सफाई, रेखांकन की कार्य क्षमता, जो जैसा देख रहे हैं वैसा बनाने वाली बात पर अधिक ध्यान था। एक और बात थी शिल्प को ज्यादा महत्व दिया जाता था तो इस बात पर भी जोर था कि हम कितने प्रकार से काम कर सकते हैं, किन किन विभिन्न माध्यमों में कार्य कर सकते हैं।ये प्रशिक्षण के लिए तो ठीक था लेकिन बाद के लिए यह ठीक नहीं था क्योंकि हर कलाकार एक माध्यम को चुनता है अपनी अभिव्यक्ति की सुविधा के अनुसार और अभिव्यक्ति में भी वह अपना एक मुहावरा बनाता है, जिसमें वह काम करना चाहता है, जो उसकी वास्तविक पहचान बनती है।इस बात का बहुत ध्यान नहीं दिया गया। तो खासकर लखनऊ में यह समस्या हुई कि लोग अपनी पहचान नहीं बना पाए। काम तो किया उन्होंने लेकिन अपना मुहावरा, अपनी पहचान नहीं बन सकी। एक हद तक देखा जाय तो पूरे भारतवर्ष में 20 वीं सदी के आरम्भ में भारतीय कलाकारों के बीच अन्तरराष्ट्रीय पहचान को लेकर एक जागृति तो आयी तो उन्होंने एक नयी शुरूआत की जिसे कुछ लोगों ने भारतीय कला के पुनर्जागरण की संज्ञा दी, खासकर बंगाल स्कूल वालों ने पुनर्जागरण की बात की। पर हुआ क्या कि वह भारतीय कला का पुनर्जागरण तो नहीं हुआ, भारतीय कला में विदेशी कलाओं के तत्व का समावेश हो गया। बम्बई के प्रोग्रेसिव आर्ट  ग्रुप वाले जो कलाकार थे, जिन्हें काफी श्रेय मिलता है आधुनिक कला के क्षेत्र में, उन सबने यूरोपीय कलाकारों का अनुसरण करना शुरू कर दिया। काम तो किया उन्होंने और उनको प्रशंसा भी मिली लेकिन यह प्रशंसा भारतवर्ष तक ही सीमित रही, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें स्वीकृति नहीं मिल पायी  क्योंकि उनके काम में मौलिकता की कमी थी। यही एक विशेष कारण है कि आप किसी भी कला के शब्दकोश को, विश्वकोश को, विश्वकला की पुस्तक को उठाकर देखें तो मुगल काल के बाद आधुनिक भारतीय कला के प्रति सभी खामोश हैं। उन कलाकारों के प्रति भी जिन्हें हम बहुत महत्व देते हैं, जो हमारे शीर्षस्थ कलाकार हैं 20 वीं सदी के, उनका भी कोई उल्लेख इसमें नहीं मिलता है। 
एक प्रश्न मुझे हमेशा परेशान करता रहा है, मैं आज तक इसका उत्तर नहीं ढूंढ पाया कि 20 वीं सदी के आरम्भ में ही आनन्द कुमार स्वामी ने एक प्रयास किया था यूरोप में और उनके साथ ब्रिटेन के दो बहुत महत्वपूर्ण कलाकार थे जैकब एबस्टीन और एनेरिक गिल। वे मिले थे और उन्होंने भारतीय दर्शन के मूल तत्वों का समावेश कर एक प्रयोग किया और एक तरह से ब्रिटेन की आधुनिक कला का एक नया रूप सामने आया जिसका कई भारतीय कलाकारों ने भी अनुसरण किया। यह एक विचित्र बात है कि विदेशी लोग तो हमारी चीजों को लेते गये और वहां से आयात होकर हमारे पास आयी लेकिन हमने खुद से अपनी चीजों को महत्व नहीं दिया। पुरानी संस्कृति, कला को, धरोहरों को महत्व नहीं दिया गया। इन सबके पीछे मैं कहूंगा कि एक साजिश ही थी ब्रिटिश सरकार की। अगर हम लार्ड मैकाले के वक्तव्य को याद करें तो उन्होंने कहा था कि जब तक हम भारतवर्ष के लोगों को यह नहीं मनवा देंगे कि जो भी यूरोप या ब्रिटिश चीजें हैं वे उनसे बेहतर हैं तब तक उन पर राज करना मुश्किल होगा। उसके बाद लार्ड मैकाले को भारत की शिक्षा नीति तय करने का काम सौंपा गया। आज भी जो शिक्षा नीति है वह उन्हीं की बनायी हुई है जिस पर इस बात पर जोर दिया गया था कि यूरोपीय चीजों को हमारे ऊपर थोपा जाय। हमारे यहां के छात्र कालिदास को नहीं जानते, शेक्सपियर को जानते हैं। अपनी चीजों को वे हेय की दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी पहचान नहीं बन पायी। लेकिन एेसा भी नहीं है कि कुछ नहीं हो पा रहा है। मुझे एक बात से बहुत सुख मिलता है जब मैं आज के नये कलाकारों को देखता हूं जो इन सब चीजों से उबर चुके हैं। वे जो प्रयोग कर रहे हैं, उनमें से बहुत से कलाकार एेसे हैं जो मौलिक कार्य कर रहे हैं, वे जमीन से जुड़े हुए कलाकार हैं। कोई भी कला तब तक नहीं पनप सकती जब तक वह अपनी जमीन से न जुड़े। अब उन्हें पहचान भी मिल रही है। आप देख लीजिए जो आज चर्चित कलाकार हैं वे बहुत युवा है चाहे वह अनीश कपूर हों या फिर सुबोध गुप्ता हों। स्वतंत्रता के बाद की उपज हैं वे।
 
हाल के वर्षों की प्रवृत्तियों को आप सकारात्मक मानते हैं?
– हां लेकिन मैं यह भी कहना चाहूंगा कि हमारी कला का जो वातावरण है वह बहुत दूषित हो चुका है। शिक्षण संस्थान जितने हैं हमारे देश में , बडौदा और शान्तिनिकेतन को शामिल करते हुए कहना चाहूंगा, वे कोई पद्धति नहीं लागू कर पा रहे हैं। जो भी कलाकार हमारे देश में आगे जा पा रहे हैं वे स्वयं अपने प्रयास से कार्य कर रहे हैं। मैं कहना चाहूंगा कि जो छात्र मेरे लिए कहते हैं कि मैंने उनसे सीखा, मैं कहूंगा नहीं, उन्होंने अपने प्रयास से सीखा है। 
 
शिक्षा संस्थानों की बात चली है तो पूछना चाहूंगा कि लखनऊ के कला एवं शिल्प महाविद्यालय में आपने एक लम्बा समय अध्यापक और प्राचार्य के तौर पर बिताया, आपने महाविद्यालय में युवाओं को दिशा देने के लिए किस तरह के प्रयास किए?
-मेरा प्राचार्य का कार्यकाल थोड़े समय का रहा और उसमें बहुत सारे रुके हुए कार्य थे, अध्यापकों की समस्याएं थीं। मैंने सोचा कि अध्यापकों की समस्याएं जब तक दूर नहीं होंगी वे ठीक ढंग से कैसे कार्य कर सकेंगे? बहुत सारे प्रशिक्षक थे जो लम्बे समय से कार्य कर रहे थे लेकिन उन्हें अध्यापक नहीं माना जा रहा था। तो मैंने इन समस्याओं को दूर करने की कोशिश की। बहुत पुराना पाठ्यक्रम हमारे यहां चला आ रहा था मैंने उसे पुनर्निर्धारित कराया। वैसे भी मेरा मानना है कि कोई भी पाठ्यक्रम हो उसे पांच वर्षों में पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए। मैं समझता हूं कि 20-25 वर्षों बाद मैंने इसे पुनर्निर्धारित किया। अध्यापक कम थे, मैंने नियुक्तियां करायीं जिसके लिए उच्च न्यायालय में मुझे मुकदमे लड़ने पड़े। एक समय तो मुझे यह भी लगने लगा था कि कला महाविद्यालय छात्रों के लिए न होकर कर्मचारियों का होकर रह गया है। एक लड़ाई लड़नी पड़ी मुझे। यहां तक लड़ाई लड़नी पड़ी कि मुझे इस्तीफा तक देना पड़ा लेकिन मैंने समझौता नहीं किया। हमारे यहां की पूरी व्यवस्था ही एेसी है। एक बाबू अडंगा लगा देता है तो अफसर की भी हिम्मत नहीं होती वह काम करने की और एक अफसर अगर कुछ चाहता है तो वह किसी भी प्रकार हो ही जाता है। फिर भी मैंने कुछ प्रयास किए लेकिन एेसे काम एक आदमी के करने से नहीं होते हैं, सतत प्रक्रिया से होते हैं। हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब आप किसी को कार्यभार सौंपते हैं तो जो नया आने वाला होता है वह चाहता है कि उसे साफ-सुथरी स्लेट मिले। आप कुछ करके गये हैं तो वह उसे नहीं करना चाहेगा। इस प्रकार किसी अच्छे काम की सतत प्रक्रिया ही नहीं बन पाती है, निरन्तरता नहीं बन पाती है।
 
ये कहा जाता है कि कला का जो परिवेश है उसे आज बाजार बहुत हद तक निर्धारित करता है?
-लड़ाई लड़ना इंसान की फितरत रही है। सबसे बड़ी लड़ाई प्रथम विश्वयुद्ध की रही। इसके लिए जो तकनीकी विकास हुआ वह पहले कभी नहीं था। जब दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो ये सोचा गया कि यह जो इसके कारण उद्योग बढ़ गया है उसका क्या किया जाएगा, उसे तो अब बन्द नहीं किया जा सकता है। उसके पहले तक हमारी जरूरतें बहुत सीमित थीं लेकिन इन उद्योगों के हित में उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया गया। तो आज चारो ओर उपभोक्तावाद है। इसके साथ ही खुद की मार्केटिंग का महत्व भी बढ़ गया। इस प्रकार अब चाहे आप चित्रकार हों, साहित्यकार हों,संगीतकार, पत्रकार हों अगर आपने खुद की मार्केटिंग नहीं की है तो आप कहीं के नहीं हैं। हां ये जरूर है कि अगर शिक्षा संस्थान, अकादमियां ठीक ढंग से चलती रहें तो बाजार बहुत दबाव नहीं बना सकता है।हो क्या गया है कि ये सारे संस्थान, अकादमियां नष्ट हो चुके  हैं। आप देख रहे हैं कि ललित कला अकादमी की क्या स्थिति है, कला महाविद्यालय की क्या स्थिति है? मेरे लिए बहुत उचित नहीं है टिप्पणी करना क्योंकि मैं वहां का प्राचार्य रहा हूं लेकिन जो स्थितियां हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं। और कितनी उदासीनता है इन सारी चीजों के प्रति लोगों में, चाहे राज्य ललित कला अकादमी हो या कला महाविद्यालय के प्रति हो। आप राष्ट्रीय ललित कला केन्द्र देखिए। जितना पैसा खर्च करके यह संस्थान बना हुआ है क्या लोग उसका इस्तेमाल कर पा रहे हैं उस स्तर पर। जब ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थाएं बनी थीं तो उसका एक स्वायत्तशासी स्वरूप था। एक लम्बे समय तक इन संस्थानों ने अच्छा काम किया लेकिन अब राजनीति इन पर हावी है। नेताओं को पद देने के लिए उन्हें इनका अध्यक्ष बना दिया जाता है। 
 
किस तरह का बदलाव होना चाहिए?
-आज हम एक एेसे समाज में रह रहे हैं जहां कला को लेकर कोई संवाद नहीं है। एक समय था जब शुरू में अखबार कला समीक्षक नियुक्त किया करते थे, तमाम विद्वान कला समीक्षक अखबारों से जुड़े थे, अखबार में कालम लिखते थे। आज किसी भी अखबार के पास कला समीक्षक नहीं हैं। इससे लोगों के पास क्या संदेश क्या जाएगा, आज जो अखबार में छपता है उससे कोई भी पाठक यह सही जानकारी या अनुमान नहीं लगा सकता कि सही कला क्या है? कितनी विचित्र बात है कि एक से एक महत्वपूर्ण कला प्रदर्शनियों का कोई जिक्र ही नहीं होता है, उन्हें नोटिस ही नहीं लिया जाता है। एेसी चीजों को महत्व दिया जाता है जो महत्वपूर्ण नहीं है।
 
आपने अभी तकनीक की बात की, क्या आपको नहीं लगता कि कला में भी तकनीक की दखल बढ़ी है ?इसके प्रभाव को किस रूप में देखते हैं ?
जहां तक नए माध्यमों की बात है या जो नए मैटिरियल्स आए हैं, नए औद्योगिक विकास के कारण जो चीजें आयी हैं, एक्रीलिक आ गया, फाइबर आ गया या और भी बहुत सी चीजें हैं अन्ततः वे कला में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ ही हैं और कलाकार उन्हें वैसे ही इस्तेमाल करता है जैसे मिट्टी को करता है, प्लास्टर आफ पेरिस को करता है।बस इन नयी चीजों में स्थायित्व अधिक है, उन्हें प्रयोग करना भी आसान है। उससे सुविधाएं भी मिलती हैं। प्रश्न इसका नहीं कि तकनीक की दखल कितनी बढ़ी है, सवाल इस बात का है कि कोई भी कलाकृति दृश्यात्मक रूप से क्या प्रभाव छोड़ती है? एक कलाकृति तो देखने की चीज है, आपको देखकर क्या लगता हैअगर आपको देखकर लगता है कि वह केवल तकनीक की धोखेबाजी है तो ये गलत है लेकिन अगर वह कुछ अभिव्यक्त करती है तो वह कलाकृति है। मुझे लगता है कि ये बहुत परेशानी वाली बात नहीं है। परेशानी की बात कुछ और है। परेशानी की बात मीडिया है।आज जब मैं अखबार को देखता हूं शुरू से आखिर तक तो ये रेप, क्राइम, किडनैपिंग, मर्डर इन्ही सारी चीजों से भरा रहता है। मार्शल डुचा ने जब डाडा मूवमेण्ट चलाया था, जब एण्टी सोशल, एण्टी कल्चरल माहौल बना था और जो प्रथम विश्वयुद्ध के लिए स्वाभाविक भी था, उन्होंने एक यूरेनल को उठाकर रख दिया, उसे फाउण्टेन का नाम दिया। आज भी वह 20 वीं सदी की महत्वपूर्ण कलाकृति के नाम पर सुरक्षित है क्योंकि मार्शल डुचा का नाम उससे जुड़ा था। अब उन्होंने किस आशय से वह काम किया, वह मजाक था या उन सारी चीजों की प्रतिक्रिया थी, जो भी हो लेकिन उसे बहुत हल्के में तो नहीं लिया गया, उस आन्दोलन को भी महत्व मिला लेकिन उस आन्दोलन का प्रभाव क्या हुआ, वैसी चीजें और बढ़ने लगीं।  प्रचार के लिए बहुत सारे काम किये जाते हैं, कला में भी और साहित्य में भी। उनका उद्देश्य कला नहीं है, उनका उद्देश्य लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है। एेसी चीजों को मैं बहुत तरजीह नहीं देता। मैं इसे गंभीर कला नहीं मानता हूं लेकिन क्या किया जाय इससे प्रचार मिलता है। अभी कुछ समय पहले बड़ौदा में दो छात्रों ने तमाशा किया, बहुत ही अभद्र और अश्लील चित्र उन्होंने बनाए जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते थे। अापके सामने इतनी सारी दुनिया पड़ी है, इतने सारे विषय पड़े हैं, क्या जरूरी है कि आप एेसा काम करें लेकिन एेसा करने से उन्हें प्रचार मिलता है।चर्चा में आ जाते हैं। मार्शल डुचा की ही तरह एक कलाकार ने कमोड को लेकर कार्य किया। जयपुर में दिखाया गया तो तीखी प्रतिक्रिया हुई। कला का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए। सनसनी पैदा करके केवल चर्चा बटोरी जा सकती है। 
 
आपने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की बात की। चाहे राजा रवि वर्मा हों या एम.एफ. हुसैन, उन्हें एेसे मुद्दों को लेकर कट्टरवादियों के विरोध का सामना करना पड़ा है। इस पर आप क्या कहेंगे?
-जो सनसनी पैदा करने के लिए काम होता है वह सीधा सीधा सामने आ जाता है। सवाल यह भी है एेसी चीजों को मीडिया से प्रोत्साहन क्यों मिलता है क्योंकि मीडिया को मसालेेदार चीजें चाहिए। इस तरह की चीजों को नोटिस न लें तो इन्हें बढ़ावा नहीं मिलेगा। हुसैन साहब को बहुत नजदीक से जाना है मैंने, बहुत सम्पर्क में भी रहा हूं।आदर भी करता हूं उनका क्योंकि वे बहुत गंभीर कलाकार थे। लगातार काम किया, बहुत अच्छा काम किया और बेइंतहा काम किया। कला उनकी प्राथमिकता थी और आखिरी समय तक बनी रही लेकिन चर्चा में बने रहना उनकी कमजोरी थी। अक्सर वे एेसा काम किया करते थे जैसे नंगे पैर चलना। कभी अपनी गाड़ी को पेण्ट कर देते थे। मैं उनका एक कलाकार के रूप में आदर तो करता हूं लेकिन इन सारी चीजों को लेकर मैं उनके पक्ष में नहीं रहा। 
 
लेकिन भारतीय परम्परा में तो एेसे चित्रण के अनेक उदाहरण हैं?
मैं एक बात कहना चाहूंगा चाहे वात्स्यायन ने काम सूत्र लिखा या खजुराहों के मूर्तिशिल्प हों इनके पीछे विचार की एक पूरी प्रक्रिया है, इन्हें आप अश्लील नहीं कह सकते हैं। क्या बात है कि आप खजुराहो अपने परिवार के साथ भी चले जाते हैं?  मैंने हुसैन साहब के वे चित्र भी देखे हैं जिनको लेकर विवाद हुए। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उन चित्रों को देखकर कुछ एेसा नहीं लगा कि इन्हें विवाद का विषय बना दिया जाय लेकिन कुछ लोगों ने बनाया। मुझे लगता है कि अगर कुछ लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है तो उन्हें छोड़ देना चाहिए। इस्लाम में बहुत सारी चीजों पर रोक है तो हम नहीं करते हैं। आपके लिए क्या अपने समाज में, अपने आसपास की शान्ति जरूरी नहीं हैमेरे लिए तो जरूरी है।
 
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर समकालीन भारतीय कला को आज आप कहां पाते हैं?
-आज जो कुछ भी भारतीय कला के प्रोत्साहन के लिए हो रहा है वे व्यावसायिक दीर्घाएं कर रही हैं।आपकी ललित कला अकादमी नहीं कर पा रही है, पिछले 15 वर्षों में अकादमी ने क्या किया? भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद है, नेशनल गैलरी आफ मार्डन आर्ट है, संस्कृति मंत्रालय है ये क्या कर रही हैं, ये देखने की जरूरत है। जिस तरह अमरिका से कोई प्रदर्शनी आती थी, एक कला समीक्षक उनके साथ आता था। पूरे देश में जगह-जगह वह प्रदर्शनी लगायी जाती थी। जब तक अमरिकन कला का प्रचार नहीं हो गया, भारतवर्ष में खूब प्रदर्शनियां लगायी जाती रहीं। भारत एेसा नहीं करता है और जब करता है तो बड़े विचित्र तरीके से करता है। वेनिस में ललित कला अकादमी ने चार कलाकारों की प्रदर्शनी लगायी जिनमें से दो वहीं के कलाकार थे। इस पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च किये गये। प्रदर्शनी के लिए अकादमी का करीब 20 लोगों का काफिला गया और अध्यक्ष ने तीन बार यात्रा की। व्यावसायिक दीर्घाएं अपने ढंग से काम कर रही हैं। वे उन्हीं कलाकारों में रुचि लेती हैं जिन्हें बेंच पाती हैं। इसका दुष्परिणाम ये हो रहा है कि टाइप्ड आर्ट हो रहा है। अगर दस दीर्घाओं में आप चक्कर लगाएं तो आपको पता चल जाएगा कि ये टाइप्ड आर्ट क्या हैआम आदमी की पहुंच में वे कलाकृतियां होती हैं जिन्हें वह खरीदता है।बहुत सारे कलाकार वैसा काम कर रहे हैं। 
 
आपने अपनी कला में हाल के कुछ बदलाव किया है और आप एचिंग की जगह डिजीटल माध्यम में कार्य कर रहे हैं। इसकी वजह क्या रही?
जब मेरा प्रशिक्षण हुआ तो मैं पेंसिंल से काम करता था। एचिंग तो मैंने बहुत बाद में शुरू किया। किसी सृजनात्मक आवश्यकता के तहत मैंने एचिंग का चुनाव किया। वही सृजनात्मक आवश्यकता आज भी मेरे सामने है।मैं एक अपना मुहावरा लेकर काम करता रहा हूं। टाइम एण्ड स्पेस को लेकर मैं लम्बे समय से काम करता रहा हूं। उसी को लेकर स्ट्रक्चर फार्म मुझे आकर्षित करते रहे हैं। मैंने एचिंग में भी उन्हीं रूपों को चित्रित किया है और अब डिजीटल माध्यम में भी मेरा विषय वही है। इसका अर्थ यह नहीं कि एचिंग का महत्व मेरे लिए खत्म हो गया है, मैं तो एक लम्बे समय से छायाकार रहा हूं। पहले जब चित्र खींचता था तो डार्करूम में जाकर प्रिण्ट निकालता था, इस बार कम्प्यूटर पर डाउनलोड किया। ये समझिए कि ये अचानक ही हो गया। मैं जयपुर से लौटकर आया था और मैंने जंतर मंतर के चित्र लिए थे। मैं उनका कलर करेक्शन कर रहा था, क्रापिंग और बैलेसिंग कर रहा था। जब मैंने इसके लिए चित्रों से खेलना शुरू किया, मुझे इसके कुछ प्रभाव दिखे और मुझे अच्छे लगे। मैंने उस माध्यम को अपना लिया। जब जयपुर में और नेपाल में उन्हें प्रदर्शित किया तो उन्हें पसन्द किया गया । मैंने फोटोशाप पर जो काम किया उसमें बहुत ज्यादा एेसी तकनीक नहीं कि कोई मुझसे पूछे कि आपने यह कैसे किया, जो भी यह काम करते हैं वे इसे जानते हैं। हां यह जरूर है कि मैं अपनी आकृतियों के चयन को लेकर सतर्क रहा हूं। जो इमेज मैंने अपने कैमरे से खीचीं हैं वे वैसा कलाकृतियों में नहीं हैं। बहुत कुछ क्लोन किया गया है, बहुत सारी चीजें हटायी गयी हैं, बहुत सारी चीजें कम हुई हैं, बहुत सारी चीजें जोड़ी गयी हैं। तो मैं कह सकता हूं कि मैंने एक विजुअल इमेज क्रिएट की है। वे उसी प्रकार हैं जैसे मैं एचिंग में करता था। अगर मैं जतंर मतंर के अपने पुराने छापा चित्रों को देखूं और आज के इन चित्रों को देखूं तो लगता है कि बहुत बेहतर हुआ है। पहले उंगलियों से रंग लगाए जाते होंगे, फिर लकड़ी के डण्डियों से लगाए होंगे , फिर ब्रश बनाया गया होगा। कम्प्यूटर भी अधुनातन तकनीक है जिसका हम लाभ उठा रहे हैं। इसमें बहुत कठोर होने की जरूरत नहीं है। जब मैंने एचिंग शुरू की थी तो उसका बहुत विरोध हुआ था। कला महाविद्यालय में एचिंग प्रेस नहीं लगता अगर श्रीलाल शुक्ल संस्कृति विभाग के निदेशक बनकर नहीं आते।मैं कुंवरनारायण के घर में रहता था उन दिनों उनके साथ। उन्होंने श्रीलाल जी से प्रेस लगाने की बात कही। मैं एचिंग करने के कारण बहुत विवादों में रहा हूं लेकिन लखनऊ के बाहर उसकी वजह से बहुत पहचान भी मिली है। मेरे कुछ छायाकार मित्रों ने मेरे नये काम को देखकर कहा कि हम उसमें इतना परिवर्तन नहीं करना चाहते। छायाचित्रों में अभिलेखीकरण की बहुत बड़ी ताकत है लेकिन मैं वह काम नहीं कर रहा हूं। मैं छायाचित्रों का अपनी कलाकृति में प्रयोग कर रहा हूं और ये काम मैं पहले भी करता रहा हूं। ( कलास्रोत से साभार)

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