तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा-राज बिसारिया

तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा

राज बिसारिया से बातचीत

0 आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो कैसे लगता है? जिन ख्वाबों को लेकर चले थे, क्या वे पूरे हो गए?
-ख्वाब तो वह होता है जो पूरा नहीं होता है। कुछ बातें जरूर किसी कारण से मन में ठानी थी। जब विश्वविद्यालय में पढ़ता था 1953 की बात है। उस समय नाटकों के कितने निर्देशक थे जो बताते थे कि ये करो, ये न करो। उस जमाने के लड़के-लड़कियां जो काम कर रहे थे, उन्हें विधिवत तरीके से कोई तकनीक तो सिखाई नहीं गई थी। तकनीक तो होती है ना, भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में भी तकनीक है। हमारे यहां जो शास्त्रीय संगीत है जो नृत्य है उसका कैसा व्याकरण है, सभी को मालूम है। आप उसमें प्रयोग कर सकते हैं लेकिन उस जमीन से हट नहीं सकते हैं। जब पहली बार 1953 में अभिनय किया तो मैं शिकार हो गया क्योंकि न मेकअप करने वाले को मालूम था कि क्या मेकअप करना है, न जो कलाकार थे उन्हें मालूम था कि कैसे करना है। मेरे साथ एक सज्जन काम करते थे जो बाद में बंगाल के डीजीपी बने, जब 1956 में मैंने पहला नाटक किया अंग्रेजी में तो वह मुझसे कहने लगे कि ये तुम मुझे क्या बता रहे हो कि यहां से वहां जाना है, वहां से वहां जाना है, एक्टर तो स्टेज पर शेर होता है। मैंने कहा कि अगर एक्टर शेर होता है तो मुझे तुम खा लो। कहीं उन्होंने पढ़ा था कि पृथ्वीराज कपूर ने कभी कहा था या उनके बारे में कभी कहा गया था कि स्टेज का एक्टर तो शेर की तरह होता है।

0 क्या उस समय रंगमंच में कोई प्रशिक्षण नहीं था?
-बगैर अनुशासन के, बगैर ज्ञान के, बगैर व्याकरण के बस अटकलपच्चू वाला काम हो रहा था रंगमंच पर। क्योंकि न तो हिन्दुस्तान में यह बताने वाले स्कूल थे न ही विश्वविद्यालयों में कोई विभाग होते थे। बल्कि रंगमंच को तो हेय माना जाता था। या तो आप डाक्टर-इंजीनियर बनिए या आईएएस की तैयार कीजिए। तीन-चार साल तक मां-बाप कुछ नहीं कहते थे। कोई पूछता कि लड़का क्या कर रहा है तो बस कहते कम्प्टीशन की तैयारी कर रहा है। मेरा कला-साहित्य से लगाव था और मेरे सामने एक सवाल था कि मंच पर क्या किया जाय? तो एक खोज बड़ी लम्बी रही। मेरी तलाश शुरू हुई कि ये कला है तो क्या है? किताबें नहीं हैं, स्कूल नहीं है, टीचर नहीं है, समाज का वातावरण इसके अनुकूल नहीं है, इसे हेय माना जाता है, हमें भांड माना जाता है, तो अगर ये कला है और नाट्य शास्त्र में इसका उल्लेख है तो ये क्या है? इस तलाश से शुरूआत हुई। 1956 में मैं 21 साल का था तो मैंने अंग्रेजी का नाटक किया और 58 में मैंने हिन्दी का नाटक किया जिसके अनुवादक रघुवीर सहाय थे। नाटक इटली का था, इल्यूजन और रिएलटी के बीच का, सत्य और ब्रह्म के बीच का नाटक था।

0 हिन्दी नाटकों की क्या स्थिति थी? मेरा आशय पटकथा से है?
-अभी बड़े बड़े लोग स्टेज पर नहीं आए थे, मोहन राकेश नहीं आए थे, बादल सरकार नहीं आए। नाटक लिखे जा रहे थे लेकिन साहित्यिक नाटक लिखे जा रहे थे। आप उपन्यासकार हैं, कवि हैं तो आपने साहित्य की एक विधा के रूप में नाटक भी लिख दिया। रंगमंच की जो गंभीर कला है, 20 वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते विश्व के रंगमंच में क्या निखार हुआ है, वह एक सादा कहानी का रंगमंच नहीं था, विचारों का रंगमंच हो गया था लेकिन हम हिन्दी वाले बहुत पीछे रह गए थे।

0 क्या आपकी कोई संस्था भी थी?
-विश्वविद्यालय में 1962 में 11 लड़के हमारे साथ थे, हमने थिएटर ग्रुप की स्थापना की। लेकिन हमारे विद्यार्थी मेधावी थे, उनको विभागाध्यक्ष ने हतोत्साहित किया। मैं जूनियर लेक्चरर था। वह भी मैं इसलिए बना कि मैं आईएएस नहीं बनना चाहता था। वह भी स्वीकार इसलिए किया कि इसमें विचारों की स्वतंत्रता था लेकिन ये दो साल ही चला और बन्द करा दिया गया।

0 टॉ की स्थापना कैसे हुई?
– 1964 में टॉ (थिएटर आर्ट्स वर्कशाप) शुरू किया। लोगों ने मजाक उड़ाया कि मोटर की वर्कशाप होती है लेकिन राज बिसारिया तो थिएटर की ही वर्कशाप शुरू कर रहा है। मैंने कभी व्यावसायिक रंगमंच नहीं किया, पेशेवर रंगमंच किया। रामचरित मानस बाजार में खरीदना पड़ता है या नहीं? मैंने शौकिया नहीं किया। 1969 में मुझे लंदन से निमंत्रण आया और मैंने 5-6 महीने का प्रशिक्षण लिया। उस प्रशिक्षण ने मेरी तलाश को पुख्या किया। उस प्रशिक्षण से मुझे लाभ यह हुआ कि मुझे दुनिया भर के महान नाटक मुझे देखने को मिले। देखना बहुत जरूरी है। इसकी जो महत्वपूर्ण बात थी कि पहले आप सीखिए और फिर नाटक करिए। हमारे शौकिया रंगमंच में सीखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोग कहते कि मैंने फलां नया नाटक उठाया है तो मैं कहता कि अब ये बताओं गिराओगे कब? ये वह बूथ नहीं कि जहां बेवकूफों को देखा जाय, ये तो वह जगह है जहां से आपके परवाज को देखा जाता है। और यह ऐसी जगह भी है जहां समाज जुड़ता है। शास्त्रीय संगीत को तो कुछ ही लोग समझते हैं, कविता के भी कुछ ही पाठक होंगे लेकिन ये कहा जाता है कि एक समाज का एक देश का सामाजिक उत्थान क्या है यह देखना हो तो ये देखो कि वहां के रंगमंच की स्थिति कैसी है?

0 फिल्मों और टेलीविजन ने तब किस प्रकार प्रभाव डालना शुरू किया?
-पहले फिल्म आई, फिर टेलीविजन आया लेकिन मैं एक बात कहना चाहूंगा कि जो मंच पर होने वाली प्रस्तुति है चाहे वह संगीत की हो या रंगमंच की, वह खत्म नहीं हुई और न होगी। ये अलग बात है कि हमारे यहां वह परम्परा पनप ही नही पाई। गांवों में मैं गया तो मैंने पाया कि वहां जो लोक परम्पराएं हैं वे दूषित हो गईं। नौटंकी की क्या स्थिति है?रंगमंच वास्तव में समाज का आईना है। हमारी समस्याएं, हमारा व्यवहार सब कुछ उसमें नजर आता है और इस रंगमंच से बिल्कुल कटे हैं। जो राजनीतिक नाटक कर रहे हैं वे समाज के परिवेश में ही तो कर रहे हैं। गांवों में जाकर देखिए, जीन्स तो आ गया, लिपिस्टक, पाउडर तो आ गया लेकिन आधुनिक चेतना नहीं आई। आधुनिक चेतना क्या है, अपने इतिहास से जूझना है, उसकी पुनर्व्याख्या करना है। किसी को भाषण नहीं देना है लेकिन अगर आप द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का रंगमंच देखिए, पाश्चात्य रंगमंच का देखिए, पाश्चात्य इसलिए कि वहां का रंगमंच बहुत पुराना है। लंदन में पांच सौ साल से रंगमंच चल रहा है, बीच में 30-40 साल बंद हुआ है, पेशेवर रंगमंच है जो स्कूल हैं वे साल में 20-20, 22-22 शो करते हैं। हमारे यहां तो शायद ही किसी के शो ऐसे होते हों। क्यों, क्योंकि मुफ्तखोरी है। आप यह नहीं देख रहे हैं कि रंगमंच के माध्यम से क्या अभिव्यक्त हो रहा है और जब अभिव्यक्त होगा तभी हमारे व्यक्तित्व का विकास होगा। बाहर कितने आन्दोलन हो गए, सामाजिक दायित्व का थिएटर क्या है, राजनीतिक रंगमंच क्या है? विज्ञान और धर्म का जो टकराव हुआ तो क्या विचार आया?

0 आपके कार्यों की कैसी प्रतिक्रिया रही?
-मैं तो गुरुहीन था। तो मैंने ठाना कि अपने प्रदेश में नाटक की नाक कटी हुई है तो इसके लिए कुछ करूंगा। टॉ और फिर मेरे प्रयासों से स्थापित हुई भारतेन्दु नाट्य अकादमी के माध्यम से मैंने जब विश्व के रंगमंच के ऐसे नाटक किए तो कहा गया कि अगर इसी तरह रंगमंच होता रहा तो हमारा रंगमंच कुछ ही दिनों में विश्व स्तर का हो जाएगा। लेकिन मैं यहां यह भी कहना चाहूंगा कि शौकिया रंगमंच को हमेशा शिक्षित लोगों से कष्ट होता है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। मेरा काफी विरोध किया गया। मेरे खिलाफ न्यायालय में मुकदमे हुए। चिट्ठियां लिखी गईं,बाथरूम सिंगर को उससे आपत्ति होगी जो छह घंटे रियाज करता है। मुझे जब भारतेन्दु नाट्य अकादमी में पूर्णकालिक निदेशक बनना था तो न्यायालय में मुकदमा था। सारे विशेषज्ञों का कहना था, सत्यदेव दुबे, उत्पल दत्त, गोविन्द निहलानी कमेटी में थे और सबने कहा कि राज बिसारिया को निदेशक बनाना चाहिए लेकिन मुझे निर्देशक नहीं बनने दिया गया।

•राज साहब, अंग्रेजी नाटकों को लेकर आपका विशेष आग्रह रहा है। आपके बारे में ये कहा जाता है कि आप हिंदी के नाटक भी हिंदी में नहीं करते?
-पहले तो ऐसा कहने वालों को मैं ये बताना चाहूंगा कि मैंने मोहन राकेश भी किया है, बादल सरकार, धर्मवीर भारती भी किया है और शरद जोशी, मोहित चटर्जी को भी किया है। ‘आधे अधूरे’, ‘अंधायुग’ जैसे प्रसिद्ध नाटक किए हैं तो मेरे बारे में यह कहना गलत है कि मैंने हिंदी नाटक नहीं किए हैं। हिंदी में आज नाटक लिखे जा रहे हैं या नहीं मुझे नहीं मालूम, लेकिन यहां मैं यह सवाल भी करना चाहूंगा कि अगर लिखे जा रहे हैं तो वे कहां मंचित हो रहे हैं? पिछले दस वर्षों में देश में हिंदी का कौन-सा महत्वपूर्ण नाटक मंचित हुआ है? आप बार-बार ‘अंधायुग’, ‘आधे-अधूरे’, ‘तुगलक’ की ओर ही क्यों लौटकर आते हैं? मैं तो लखनऊ में रहा हूं ‘जीना यहां मरना यहां’ है। हिंदी के जो निर्देशक हैं वे कौन-सा हिंदी का नाटक कर रहे हैं? सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ‘बालकन्स वूमेन’ क्यों करते हैं? उर्मिल कुमार थपलियाल ब्रेख्त को क्यों करते हैं? विनय पाठक अगर नाटक लेकर आते हैं तो वह शेक्सपियर का यों होता है? अगर आप लखनऊ में होने वाले ‘सेंचुरी बुड्ढा’ या ‘आदाब अर्ज’ को हिंदी का नाटक मानते हैं तो मानिए। मैं चूंकि अंग्रेजी का प्रोफेसर रहा हूं, विलायत में ट्रेनिंग ली है, अंग्रेजी के नाटक करता रहा हूं इसलिए मुझ पर यह थोप दिया जाता है कि राज बिसारिया तो बस अंग्रेजी के नाटक करते हैं या हिंदी के नाटक भी हिंदी में नहीं करते हैं। मेरे सामने सवाल अच्छे नाटक का होता है। क्या इतने वर्षों से यहां जो हिंदी का रंगमंच हो रहा है, उसमें कोई विकास नहीं होना चाहिए। कूप मंडूक बने रहना या ठीक है? या विश्व रंगमंच को लाना बुरा है? मैंने सिर्फ अंग्रेजी नाटक नहीं किए बल्कि फ्रेंच, रसियन, जर्मन नाटक भी किए हैं और आगे भी करूंगा। क्या ‘जूलियस सीजर’ जैसा कोई दूसरा पॉलिटिकल नाटक है? मुझे जहां अच्छे नाटक मिलेंगे करूंगा चाहे वह चाइनिज हो या जैपनिज। अगर हिंदी वालों को आपत्ति होगी तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा।

•आप पर यह भी आरोप लगता है कि आपने अभिजात्य रंगमंच को बढ़ावा दिया है और संघर्षशील लोगों की राजनीतिक, सामाजिक चिंताएं, जनसरोकार पर आधारित नाटक आपकी रंगयात्रा में कम ही शामिल हैं?
-अगर आदमी का अपना अकेलापन, उसकी समस्याएं, मानवीय विषयों को उठाना अभिजात्य हैं तो ठीक है, मैं अभिजात्य निर्देशक हूं। ‘अंधायुग’, ‘जूलियस सीजर’ क्या अभिजात्य है, ‘किंग लीयर’ क्या अभिजात्य है? क्या फिर मैं खुद अभिजात्य हूं? मैंने शांति के संघर्ष को अपने नाटकों में दिखाया है। ईसा से भी पहले सुकरात सत्य की खोज के लिए जहर खाकर मरे थे और एथेंस में लोकतंत्र था। हमारे यहां लोकतंत्र तो 1947 में आया। यहां तो राजाओं का राज था। यहां से पहले जिन देशों में लोकतंत्र था, उनके नाटक करना या अभिजात्य होना है? मेरा कौन-सा नाटक है जो मानवीय समस्याओं को नहीं उठाता है? हर नाटक राजनीतिक नहीं हो सकता है और मैं राजनीतिक निर्देशक हूं भी नहीं।

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2 Thoughts to “तो मैं हिंदी को छोड़ दूंगा और अंग्रेजी में फिर चला जाऊंगा-राज बिसारिया”

  1. Ash samrat

    Brod thot.

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