किस कोने लगेंगे अब ये कोने!

आलोक पराड़कर (अमर उजाला, 28 जून 2020)
… पप्पू की दुकान इन्हीं कलाकारों, चित्रकारों, पत्रकारों, नेताओं और नागरिकों की दैनिक (अर्थात् दिन की) छावनी है !…हाल यह है कि दो लम्बी मेजों और चार लम्बे बेंचोंवाले इस दड़बे में दस-बारह गाहकों के बजाय बीस-पच्चीस संस्कृतिकर्मी सुबह से शाम तक ठंसे रहते हैं! उधर गोलियों के डब्बे के साथ बलदेव, इधर चूल्हे और केतली के पास पप्पू-नाम पप्पू उम्र चालीस साल!…अक्तूबर के दिन। सुबह के नौ बज रहे थे। दुकान ग्राहकों से भरी थी। कुछ लोग खाली होने के इन्तजार में गिलास लिए खड़े थे। शोर-शराबा काफी था, मगर बातें एक मुद्दे पर नहीं टिकी थी। …कुछ लोग सुबह का अखबार देख रहे थे, कुछ पढ़ रहे थे, कुछ चाट रहे थे ! बीच-बीच में बच्चन की बेंच से हरिद्वार या रायसाहब इस दुकान में खड़े किसी पत्रकार को आवाज देते जो रात की ड्यूटी से लौटा था ! …तन्नी गुरु अस्सी के युनिफार्म में दड़बे के एक छोर पर बैठे थे और दूसरे छोर पर अपने चेले के साथ कोई तानसेन रियाज कर रहा था ! रियाज क्या, किसी राग का धीमे सुरों में आलाप ले रहा था और चेला अपने झबरे बालों वाले सिर से ठेका दे रहा था ! 

प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने ये वर्णन अपनी पुस्तक ‘काशी का अस्सी’ में किया है, जिसके केन्द्र में बनारस का अस्सी मोहल्ला और पप्पू की चाय की दुकान है। वह दुकान जो नगर की जीवन्तता का प्रतीक थी और जो नगर के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों के मिलने-जुलने का एक प्रमुख स्थल भी रहा है। बनारस के लोगों के लिए यह अड़ी रही है, जहां शिक्षक, संगीतकार, लेखक, पत्रकार, राजनेता सभी मिलते रहे हैं। सिंह की रचनाओं से होती हुई यह छोटी-सी दुकान, उषा गांगुली के नाटक और चन्दप्रकाश द्विवेदी की फिल्म में भी खूब जगह पाती है। 

बनारस ही क्यों, हर उस शहर के अपने ऐसे कोने रहे हैं जो महानगर की भागदौड़ से अपने लिए फुरसत निकाल पाते रहे हैंं।  कहने को तो ये चाय-काफी की दुकानें थीं लेकिन ये शहर के ऐसे कोने थे जहां ठहाके गूंजते रहते थे, चुटकियां ली जाती थीं, खबरों और अफवाहों पर बहसें होती, राजनीतिक माहौल की चर्चा होती थी, भला-बुरा भी कहा जाता था। ये शहर के वे कोने थे, जैसे मन का कोना हो। मन की बातें होतीं और रोजमर्रा के तनाव भी दूर होते। बीते दौर की अड्डेबाजी का थोड़ा आधुनिक रूप।    

बनारस में ऐसी जगहें खूब रही हैं। पान की दुकानों तक पर अड़ी जम जाती। घंटों लोग बातचीत में मशगूल हो जाते,  खूब मजमा लगता है।  पप्पू की दुकान ही क्यों, दशाश्वमेध पर राजा और गुड्डू की चाय की दुकानों पर देखिए तो लगता जैसे पक्का महाल उमड़ आया हो। चाय में नींबू का रस निचोड़ा जाता तो उसकी चुस्कियों में लोगों की तरह-तरह की बातचीत का रस भी घुलता जाता। कबीरचौरा में संगीतकारों की गलियों और नागरी नाटक मंडली का पड़ोस भी ऐसी अड़ी के लिए प्रसिद्ध है। चौक, दशाश्वमेध की गलियों से लेकर लंका-अस्सी तक बनारस में ऐसे चाय-पान के अड्डे बहुत रहे हैं। कवि केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहें तो ‘यह शहर इसी तरह खुलता है’। 

और कभी कोई संगीत समारोह हो रहा है तो ऐसी अड्डों के रंग कुछ और बदल जाते। संकटमोचन या दुर्गामंदिर का संगीत समारोह हो, शिवरात्रि पर होने वाला ध्रुपद मेला  या दूसरे संगीत समारोह हों, गंगा महोत्सव या फिर सुबह-ए-बनारस हो, इसके बाद कलाकारों, संगीतप्रेमियों और बनारस में रह रहे विदेशियों का जमावड़ा भी ऐसे अड्डों पर देखते ही बनता। मंडली के सभागार में कोई आयोजन हो तो उसके पड़ोस की अड्डेबाजी देखते ही बनती। बनारस तो वैसे भी आयोजनों, मेलों और उत्सवों का नगर ही रहा है।  

लखनऊ की अड्डेबाजी में बनारस जैसा खुलापन तो कम रहा लेकिन गर्मजोशी कम नहीं थी। बीते दौर के कॉफी हॉउस का जमावड़ा खत्म हुआ तो हाल के वर्षों में बातचीत के नए-नए केन्द्र विकसित होने लगे जहां संस्कृतिकर्मी, राजनेता या सामाजिक कार्यकर्ताओं की अड्डेबाजियां होती रहीं। एसिड पीड़िताओं का शीरोज इस दृष्टि से काफी लोकप्रिय रहा है जहां रोज के जमावड़े से अलग गोष्ठियां या सांस्कृतिक आयोजन तक हो जाते थे। यहां संस्कृतिकर्मियों जिनमें मुख्यतः रंगकर्मी और साहित्यकार होते हैं, से लेकर राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार भी खूब जुटते रहे हैं। वहीं, सनतकदा, अनुराग ट्रस्ट या कैफे रेपर्टवा ने भी अपने-अपने ढंग से कॉफी हॉउस की खाली जगहों को भरने की कोशिश की है। चौक, अमीनाबाद की गलियों के ऐसे कोने आम नागरिकों से आबाद होते रहे हैंँ।बनारस, लखनऊ से लेकर इलाहाबाद, कानपुर, जयपुर, भोपाल सभी अपनी इन्हीं अड़ी में सुस्ताते और खुलते रहे हैं।

कभी इस संदर्भ में प्रसिद्ध साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने बड़ी अच्छी बात लिखी थी। बंगाल का जिक्र करते हुए वह ‘प्रजा का अमूर्तन’ में लिखते हैं, ”शाम होने पर बंगाली भला घर में कैसे बैठे? वैसे भी उसके पांव घर में कहां टिकते हैं, तभी शायद घर की सजावट के प्रति वह संवेदनशील नहीं है। जरा-सी कोई छुट्टी हो, पूरा घर यात्रा पर निकल पड़ता है। बंगाल का लोक नाट्य ‘जात्रा’ शायद इसी बंगाली वृत्ति से जन्मा है और जहां तक साहित्यकार, कलाकार नाम के जीव का सवाल है, वह जन्म से ही ‘आवारा’ होता है-आवारा मसीहा! पहले वह अड्डाबाजी के लिए निकल पड़ता था, अब वैसी अड्डेबाजी संभव नहीं रही, न वैसे लोग, न समय, न शहर का वह रूप! फिर भी मिलन-जुलन, सभा-समारोह, गप्प-गोष्ठी, नाट्य-नृत्य-संगीत की शामों को वह छोड़ता नहीं।”

लेकिन यह सारा कुछ अब ‘है’ से ‘था’ होता जा रहा, वर्तमान से इतिहास में बदलता जा रहा क्योंकि अब छह से 13 फीट की दूरी बरतने की कोशिशों के बीच ये अड़ी या अड्डेबाजी रह भी कहां पाएगी ? अव्वल तो अब ऐसी भीड़भाड़ से बचने की जरूरत है और अगर कभी कहीं मिलना हुआ तो कल्पना कीजिए, मुंह पर मास्क लगाकर, हाथों में सेनेटाइजर पोत कर और बचाव के लिए यह दूरी निभाते हुए क्या इन अड़ी पर जुटा जा सकता है?  आपस में मिलना जुलना, बहस मुबाहिसा कहां हो पाएगा?  नतीजा है कि देश के ज्यादातर इलाकों में  लॉकडाउन भले ही खत्म हो गए हों लेकिन अब अड़ी और अड्डेबाजी के ये दृश्य बदल चुके हैं। बदल चुके क्या कहें, खत्म ही हो चुके हैं।

बनारस के संगीतप्रेमी छायाकार अनिल नारायण शर्मा कहते हैं कि दशाश्वमेध घाट पर राजा की दुकान की अड़ी मेरी दिनचर्या का हिस्सा रही है। मैं रोज शाम को निकलता, राजा की दुकान पर नींबू की चाय पीता और घंटे-डेढ़ घंटे तक बातचीत करता। बहुत सारे परिचित लोग मिलते, कई ऐसे भी थे जिनसे वहीं परिचय हुआ और यह परिचय गहरा होता चला गया। अक्सर राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होती तो कभी यह चर्चा शहर और गंगा पर भी होने लगती। इस अड़ी में शामिल होने के बाद लगता जैसे मेरे दिन भर का तनाव दूर हो गया और यही अनुभव ऐसे बहुत सारे लोगों का था। सच पूछिए तो ये वह जगह थी जहां हम अपनी भड़ास निकाल कर मन को हल्का कर लेते थे। शायद बनारस और बनारसियों के मस्तमौला होने की वजहें ऐसी जगहें ही हों जहां हम अपनी भड़ास निकालकर खुश हो लेते और अवसाद से दूर रहते थे। लॉकडाउन खुलने के बाद से रोज शाम को निकलता हूं लेकिन अब वह दुकान बंद मिलती है और लोग भी नहीं होते। एक खालीपन-सा आ गया है। ऐसा लगता है जैसे जीवन में कोई बहुत बड़ी कमी आ गई हो।

संस्कृतिकर्मियों का संकट तो और भी बड़ा है। कलाकारों-लेखकों के लिए तो ये कोने उनकी कला के लिए भी जरूरी बन चुके थे। वे यहां अपनी रचनाएं सुनाते। यह अक्सर कला के लिए पूर्वाभ्यास या रचना के प्रकाशन के पूर्व का पाठ होता। अक्सर ऐसी बैठकों में नाटकों या कविताओं के पाठ होते। नाटककार राजेश कुमार कहते हैं कि ऐसी अड्डेबाजी का लाभ मेरे नाट्य लेखन को मिलता था। मैं जब कोई नाटक लिख रहा होता या पूरा कर लेता तो उसे यहां अपने खास मित्रों के बीच सुनाता और इस प्रकार उनकी प्रतिक्रियाएं भी मुझे मिलतीं। ऐसी अड्डेबाजी के बंद हो जाने का हमें नुकसान हुआ है।

अब जो कैफे या चाय-काफी की दुकानें खुलनी शुरू हुई हैं, वहां दो-दो लोगों के बैठने की ही व्यवस्था की जाती है। ऐसे में अड्डेबाजी का वह लुत्फ चला गया है। यही वजह है कि पिछले दिनों जब फिल्मों के संवाद-पटकथा लेखक अतुल तिवारी ने एक नाटक लिखा और उसे अपने मित्रों को सुनाने के लिए बेचैन हुए तो उन्होंने लखनऊ लिटरेचर फेस्टिवल की संयोजिका कनक रेखा चौहान का घर चुना। सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ, राकेश, मृदुला भारद्वाज, राजेश कुमार जैसे कुछ रंगकर्मी मित्रों की उपस्थिति में उन्होंने इसका पाठ किया। राजेश कुमार बताते हैं कि मैंने हाल में ‘निर्वासन’ नाटक लिखा है और मैंने अब इसे मित्रों को सुनाने के लिए नया रास्ता तलाशा है। मैंने तय किया है कि मैंने अपने मित्रों के घर जाऊंगा और दो-तीन लोगों की उपस्थिति में इसका पाठ करूंगा। वह कहते हैं कि नाटक के मंचन की संभावना भले न हो, पाठ की तो है। ये भी एक प्रकार का रंगकर्म है। खास बात यह भी है कि यह नाटक भी कोरोना के असर की बात करता है, व्यक्ति से लेकर समाज तक जो असर पड़ा है कोरोना का। कोरोना ने व्यक्ति को किस तरह समाज से विलग किया, नाटक में यह चिन्ता प्रमुख है।  

वैसे तो साहित्यिक गोष्ठियां, समारोह, नाटक, संगीत, कला प्रदर्शनियां, पुस्तकों के लोकार्पण जैसे सभी आयोजन बंद हैं और इनके जल्द शुरू होने की संभावना भी फिलहाल नहीं दिखती है। लेकिन इनके विकल्प लॉकडाउन के दौरान ही तलाशे जाने लगे थे। सोशल मीडिया पर ‘लाइव’ होने लगे, वेबिनार किए जाने लगे। रचना पाठ, साक्षात्कार तक लिए जाने लगे, नाटकों के मंचन का विकल्प एकल अभिनय में ढूंढा गया। ये सब अभी तक चल रहा है। लेकिन हमारी इस अड्डेबाजी, अड़ी का क्या विकल्प हो सकता है? इसके लिए तो हमें इस संकट के गुजर जाने का ही इंतजार करना होगा, तभी हम अपने मन के करीब हो सकेंगे!

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