ईमानदारी से नहीं लिखा गया संगीत का इतिहास

विजयशंकर मिश्र से राजन एवं साजन मिश्र  काशी, वाराणसी, अविमुक्त, आनन्द कानन एवं महाश्मशान- आधुनिक बनारस के ये 5 प्राचीन नाम- इसकी 5 भिन्न विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। डा. काणे ने हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में लिखा है कि काशी रोम, येरुशेलम और मक्का से भी प्राचीन तथा पवित्र है। सिस्टर निवेदिता ने इसे वैटिकन सिटी से हजार गुना पवित्र लिखा है। संगीतेश्वर महादेव का क्रीड़ांगन होने के कारण यह स्वाभाविक भी है और अनिवार्य भी कि बनारस और संगीत का संबंध अनन्य, अभिन्न और अटूट है। तभी तो इसे…

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अक्ल से आगे है कला की मंजिल

रेखा के.राणा से चित्रकार सैय्यद हैदर रजा भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व व पश्चात के दशकों में आधुनिकता के नाम पर कला में अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे थे। तत्कालीन समय के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी कलाकारों में सैय्यद हैदर रजा का नाम आता है। रजा का जन्म 1922 में मध्य प्रदेश के बावरिया में हुआ था। रजा के चित्रों पर उनके जन्म स्थान की संस्कृति एवं कला अपने गहरे रूपों में विराजमान थी। रजा ने कई दशकों तक कला जगत में कार्यशील होकर अपनी उपस्थिति दर्शाई । 1947 में भारत…

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कभी मुड़कर कल के मकबूल को देखा है ?

नवीन जोशी सन् 2003 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘एम एफ हुसेन की कहानी, अपनी जुबानी’ को रिलीज करने हुसेन कई शहरों में गए थे। उसी क्रम में वे पटना भी आए। मैं उन दिनों पटना में था। हुसेन के साथ एक कप कॉफी पीने का मौका ‘हिन्दुस्तान’ के स्थानीय संपादक की हैसियत से मुझे भी मिला। हुसेन प्रशंसकों से घिरे थे, अलग से कुछ बातें करने का अवसर नहीं था। फिर भी हुसेन से मिलना रोमांचक अनुभव रहा। उन्होंने मुझे भी अपनी आत्मकथा की एक प्रति दी और हमारे एक…

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गायक अनूप जलोटा को बेगम अख्तर अवार्ड

हिंदी उर्दू हिंदी साहित्य अवार्ड कमेटी के तत्वाधान में आगामी 21 से  23 मार्च तक लखनऊ के कला मंडपम प्रेक्षागृह- कैसरबाग में 28 वां साहित्य महोत्सव का आयोजन किया जाएगा जिसमें प्रदेश के पूर्व राज्यपाल राम नायक को साहित्य शिरोमणि और अनूप जलोटा को बेगम अख्तर अवार्ड प्रदान किया जाएगा। यह जानकारी हिंदी उर्दू साहित्य व साहित्य अवार्ड कमेटी के प्रमुख अतहर नबी   ने बताया कि 21 मार्च को 28 वां अंतर्राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का उद्घाटन मुख्य अतिथि हृदय नारायण दीक्षित विधान विधान सभा अध्यक्ष करेंगे इस अवसर पर प्रदेश…

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जड़ों से जुड़ी रहे कलाएं

अवध आर्ट फेस्टिवल का दूसरा दिन लखनऊ। कलाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। जड़ों से जुड़कर ही उनकी पहचान बनती है। कला, संगीत या रंगमंच में जड़ों से जुड़े रहना महत्वपूर्ण है। ये विचार वक्ताओं ने ललित कला अकादमी के अलीगंज स्थित परिसर में चल रहे अवध आर्ट फेस्टिवल के दूसरे दिन बृहस्पतिवार को व्यक्त किए। दूसरे दिन ‘सृजनात्मकता एक देशी जुबान है’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। तीन मार्च तक चलने वाले इस फेस्टिवल में 40 से अधिक कलाकारों की 150 कलाकृतियां प्रदर्शित की गई…

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विजय सिंह- सादगी और रहस्य की तलाश

मंजुला चतुर्वेदी बनारस के समकालीन कला परिदृश्य में विजय सिंह एक प्रमुख नाम है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में व्यावहारिक कला के शिक्षक होने के बावजूद वे चित्रकला के एक प्रयोगधर्मी कलाकार हैं। उन्होंने प्रचुर चित्रों का निर्माण किया एवं कर रहे हैं तथा कई सुन्दर मूर्तिशिल्प उकेरे हैं। श्वेत श्याम रेखांकन-चित्रों के लिए उन्हें विशेष ख्याति प्राप्त हुई। श्वेत श्याम छवियों में उन्होंने पैन एवं इंक की सहायता से विभिन्न प्राकृतिक दृश्य एवं अन्य संयोजन निर्मित किए है जो अपने त्रिआयामी प्रभाव और रूपाकारों की विशेषता के कारण ध्यान…

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इस रंगमंच पर भी तुम अनूठे हो पापा!

ग्रूशा कपूर सिंह प्रसिद्ध रंगकर्मी रंजीत कपूर को हिन्दी रंगमंच का राजकपूर कहा जाता रहा है। उनके प्रशंसकों का दायरा कई पीढ़ियों तक फैला है। अगर ऐसा न होता तो उनसे उनके 1977 के नाटक ‘बेगम का तकिया’ को तीन दशकों से अधिक समय बाद पुनर्जीवित करने का अनुरोध आखिर क्यों होता है? रंगमंच का उनका अपना मुहावरा है लेकिन कम ही लोग जाते हैं कि उनका जीवन कितना संघर्षों भरा, उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरा है। ये संघर्ष उनके पेशे के भी रहे हैं और पारिवारिक भी। उन्हें आज…

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समकालीन कला की अवधारणा

रेखा के. राणा किसी भी रचना में समय अनिवार्य तत्व है। रचना के विषय प्रथमतः समय के झरोखे से होकर आते हैं। वस्तुतः विषय तो हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, उन्हें ग्रहण करने में रचनाकार की संवेदनशीलता विशेष रूप से माध्यम के रूप में काम करती है। कला के सभी रूप अपने परिवेश के साथ लगातार टकराव से उपजते हैं किन्तु भारतीय संदर्भ में शाश्वत और चिरंतन मूल्यों की अजस्र धारा संवेदना की अभिव्यक्तियों को इस प्रकार प्रभावित करती रही कि कला के यथार्थ रूप या तो सामने आए ही…

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श्याम शर्मा-मगध में मथुरा के उत्सवी रंग

कुमार दिनेश लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की भूमि मथुरा (यूपी) के गोवर्धन कस्बा में जन्में छापा-कलाकार श्याम शर्मा ने 1966 में प्राचीन मगध की भूमि पाटलिपुत्र को अपनी कला साधना का केंद्र बनाया और आधी सदी से भी अधिक लंबी कला यात्रा के बाद आज 77 साल की उम्र में वे देश के शीर्षस्थ कलाकारों की पंक्ति में खड़े हैं। लखनऊ कला महाविद्यालय से डिप्लोमा करने के बाद वे पटना आए और यहां पटना कला महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुए। उन दिनों पूरे देश में शिक्षक बनने की न्यूनतम योग्यता डिप्लोमा…

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स्मृतियों के कई रंग

जयकृष्ण अग्रवाल कभी कभी बड़े अहम लोग हाशिए पर चले जाते है। ऐसे ही थे लखनऊ कला महाविद्यालय के लीथो प्रोसेस फोटो मेकैनिल विभाग के प्रवक्ता हीरा सिंह बिष्ट। फोटोग्राफिक डार्करूम आदि की सुविधा भी इसी विभाग में उपलब्ध थी। फोटो फिल्म का जमाना था और कैमरे के बाद सारा काम तो डार्करूम में ही होता था। हीरा सिंह जी को सारे कैमिकल्स और उनके प्रयोग के बारे में विस्तृत जानकारी थी। किन्तु वह समय था जब फोटोग्राफी से अधिक लोगों की रुचि कैमरों तक ही सीमित थी। आमतौर से…

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